अमेरिका से मिला 'धोखा' तो सऊदी के आगे गिड़गिड़ाया पाकिस्तान

अमेरिका से मिला 'धोखा' तो सऊदी के आगे गिड़गिड़ाया पाकिस्तान

गंभीर आर्थिक तंगी और डिफ़ॉल्ट के मुहाने पर खड़े पाकिस्तान के कूटनीतिक और आर्थिक हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों और महाशक्तियों से झटके मिलने के बाद इस्लामाबाद को एक बार फिर अपने पुराने मददगारों का दरवाजा खटखटाना पड़ा है। वाशिंगटन से वित्तीय मदद और बैकस्टॉप फंडिंग की आस टूटने के बाद पाकिस्तानी हुक्मरानों ने रियाद का रुख किया, जहां रियायतों के लिए काफी मिन्नतें की गईं। इस बीच, सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) ने राहत देते हुए 3 अरब डॉलर के जमा राशि (Deposit Roll-over) के भुगतान की अवधि को बढ़ाने का फैसला लिया है। रियाद से मिली इस बड़ी राहत के कारण पाकिस्तान को फिलहाल तात्कालिक डिफ़ॉल्ट से कुछ समय के लिए जीवनदान मिल गया है, हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि कर्ज पर टिकी यह राहत पाकिस्तान के दीर्घकालिक संकट का स्थायी समाधान नहीं है।

अमेरिका से वित्तीय सहयोग का टूटना और इस्लामाबाद की बढ़ती कूटनीतिक बेबसी

अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकारों के अनुसार, पाकिस्तान की शाहबाज़ शरीफ़ सरकार को वाशिंगटन से बड़ी आर्थिक सहायता और रणनीतिक बेलआउट की उम्मीद थी। पाकिस्तान ने अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के समीक्षा कार्यक्रमों और अपनी बाहरी देनदारियों को चुकाने के लिए अमेरिकी प्रशासन से वित्तीय मदद और मध्यस्थता की मांग की थी। हालांकि, अमेरिकी नीति निर्माताओं की ओर से इस संदर्भ में कोई सकारात्मक रुख न दिखाए जाने के बाद इस्लामाबाद के लिए कूटनीतिक और आर्थिक संकट गहरा गया। अमेरिका की इस बेरुखी ने पाकिस्तान को यह अहसास करा दिया कि पश्चिमी देशों से बिना किसी सख्त शर्त के अब वित्तीय मदद मिलना नामुमकिन है। वाशिंगटन के इस रुख के बाद पाकिस्तानी वित्त मंत्रालय के पास मध्य पूर्व के देशों के समक्ष आर्थिक गुहार लगाने के अलावा कोई अन्य रास्ता नहीं बचा था।

क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का फैसला और 3 अरब डॉलर का रोलओवर

अमेरिकी मदद के दरवाजे बंद होने के तुरंत बाद पाकिस्तानी वित्त मंत्री मुहम्मद औरंगज़ेब और उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने सऊदी अरब प्रशासन के साथ संपर्क साधा और स्टेट बैंक ऑफ़ पाकिस्तान में जमा सऊदी फंड की पुनर्भुगतान अवधि बढ़ाने की गुहार लगाई। रियाद में बैठकों के दौर के बाद क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने सकारात्मक रुख अपनाते हुए 3 अरब डॉलर की इस अतिरिक्त जमा राशि की परिपक्वता अवधि को आगे बढ़ाने की मंजूरी दी। सऊदी अरब की ओर से दिए गए इस विस्तार से पाकिस्तान को अपनी तत्काल विदेशी मुद्रा आवश्यकताओं को पूरा करने में थोड़ी सांस लेने की जगह मिली है। रियाद से मिली यह आर्थिक छूट पाकिस्तान के केंद्रीय बैंक को अपने घटते विदेशी मुद्रा भंडार को स्थिर बनाए रखने में तात्कालिक मदद प्रदान करेगी।

आईएमएफ (IMF) समीक्षा और विदेशी कर्ज देनदारियों का भारी दबाव

सऊदी अरब से मिली यह राहत ऐसे समय में आई है जब अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का कार्यकारी बोर्ड पाकिस्तान के 7 अरब डॉलर के बेलआउट कार्यक्रम की आगामी समीक्षा करने जा रहा है। आईएमएफ ने पाकिस्तान के समक्ष शर्त रखी थी कि वह अपने बाहरी कर्ज को चुकाने के लिए मित्र देशों से वित्तीय गारंटी और डिपॉजिट रोलओवर हासिल करे। यदि सऊदी अरब इस जमा राशि की अवधि नहीं बढ़ाता, तो पाकिस्तान के लिए आगामी वित्त वर्ष में लगभग 3.5 अरब डॉलर के बाहरी ऋण की सर्विसिंग (External Debt Servicing) कर पाना लगभग असंभव हो जाता। यद्यपि सऊदी अरब के इस कदम से आईएमएफ की तात्कालिक शर्तों का पालन करने में पाकिस्तान को सहायता मिली है, लेकिन कर्ज के इस जाल से देश को बाहर निकालने के लिए बेहद कड़े संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता बनी हुई है।

तेल आपूर्ति और खाड़ी देशों पर पाकिस्तान की लगातार बढ़ती निर्भरता

पाकिस्तान न केवल वित्तीय जमा राशि के लिए बल्कि अपनी दैनिक ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए भी पूरी तरह से सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देशों पर निर्भर है। पाकिस्तान को अपनी ईंधन खपत बनाए रखने के लिए लगातार डिफर्ड पेमेंट (विलंबित भुगतान) पर तेल आपूर्ति की जरूरत होती है। इस्लामाबाद द्वारा रियाद से बार-बार मांगी जाने वाली वित्तीय मदद और छूट यह स्पष्ट करती है कि पाकिस्तान की घरेलू अर्थव्यवस्था बिना विदेशी अनुदान और कर्ज रोलओवर के सुचारू रूप से चलने में असमर्थ है। कूटनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सऊदी अरब की इस समय-सीमा विस्तार की नीति ने पाकिस्तान को तात्कालिक आर्थिक तबाही से तो बचा लिया है, परंतु विदेशी कर्ज का यह भारी बोझ आने वाले समय में देश की राष्ट्रीय और विदेश नीति की स्वतंत्रता को और अधिक सीमित कर सकता है।