हुती विद्रोहियों से जारी भीषण जंग के बीच सऊदी अरब बना रहा बेहद घातक मिसाइलें

हुती विद्रोहियों से जारी भीषण जंग के बीच सऊदी अरब बना रहा बेहद घातक मिसाइलें

फारस की खाड़ी और मध्य पूर्व के युद्धग्रस्त इलाके में रणनीतिक शक्ति संतुलन को बदलने वाली एक बेहद चौंकाने वाली और बड़ी खबर सामने आई है। यमन के ईरान समर्थित हुती विद्रोहियों के साथ जारी भीषण मिसाइल और ड्रोन युद्ध के बीच सऊदी अरब ने अपनी सैन्य आत्मनिर्भरता को कई गुना बढ़ाने की दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं। अमेरिका के शीर्ष वाणिज्यिक सैटेलाइट प्रदाताओं और स्वतंत्र रक्षा विश्लेषकों द्वारा जारी की गई नवीनतम हाई-रिज़ॉल्यूशन सैटेलाइट तस्वीरों ने इस बात की पुष्टि कर दी है कि सऊदी अरब अपने अल-वताह (Al-Watah) सैन्य परिसर में एक उच्च क्षमता वाली बैलिस्टिक मिसाइल निर्माण और परीक्षण सुविधा का तेजी से विस्तार कर रहा है। तस्वीरों में मिसाइल इंजनों के परीक्षण के लिए निर्मित टेस्ट बेंच, नए सॉलिड-फ्यूल प्रोपेलेंट प्रोडक्शन प्लांट और भारी बंकर जैसी अत्याधुनिक संरचनाएं साफ तौर पर दिखाई दे रही हैं। इस बड़े खुलासे ने न केवल मध्य पूर्व में जारी हथियारों की होड़ को एक नए मोड़ पर खड़ा कर दिया है, बल्कि वाशिंगटन से लेकर तेहरान तक के सुरक्षा गलियारों में नई हलचल पैदा कर दी है।

अल-वताह की सैटेलाइट तस्वीरों में क्या दिखा और सऊदी अरब की नई मिसाइल फैक्ट्री क्यों है बेहद खास

वाशिंगटन स्थित प्रमुख थिंक-टैंक और रक्षा विशेषज्ञों द्वारा प्लेनेट लैब्स और मैक्सार टेक्नोलॉजीज की सैटेलाइट तस्वीरों का गहन विश्लेषण करने पर पता चला है कि रियाद से लगभग 200 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में स्थित अल-वताह बेस पर बीते कुछ महीनों में व्यापक निर्माण कार्य हुआ है। तस्वीरों में देखा जा सकता है कि परिसर में एक नया और बड़ा प्रशासनिक ब्लॉक, मिसाइल इंजनों के स्थैतिक परीक्षण (Static Testing) के लिए एक भारी-भरकम टेस्ट स्टैंड और ठोस ईंधन (Solid Fuel) के मिश्रण व प्रसंस्करण के लिए विशेष सुरक्षात्मक इमारतों का निर्माण किया गया है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ठोस ईंधन से चलने वाली मिसाइलों का सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि उन्हें बेहद कम समय में लॉन्च किया जा सकता है और उन्हें लंबे समय तक बिना किसी ईंधन रिसाव के युद्ध के लिए तैनात रखा जा सकता है। ऐतिहासिक रूप से चीन की मदद से निर्मित इस गुप्त ठिकाने पर अब खुद सऊदी अरब द्वारा उन्नत तकनीक और घरेलू विनिर्माण क्षमता विकसित करने का काम पूरा किया जा रहा है।

हुती विद्रोहियों के लगातार हमलों और ईरान के बढ़ते प्रभाव का जवाब देने की सऊदी रणनीति

सऊदी अरब द्वारा इस तरह के घातक मिसाइल कार्यक्रम को गति देने के पीछे की सबसे प्राथमिक वजह यमन की सीमा पार से होने वाले हुती विद्रोहियों के मिसाइल और आत्मघाती ड्रोन हमले हैं। पिछले कुछ वर्षों में हुती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के अरामको तेल संयंत्रों, अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों और नागरिक बुनियादी ढांचों को निशाना बनाकर बैलिस्टिक मिसाइलें दागी हैं। यद्यपि सऊदी अरब के पास अमेरिका से खरीदी गई अत्यधिक महंगी 'पैट्रियट' (Patriot) और 'थाड' (THAAD) मिसाइल रक्षा प्रणालियां मौजूद हैं, लेकिन हर हुती ड्रोन या सस्ती मिसाइल को नष्ट करने के लिए लाखों डॉलर की इंटरसेप्टर मिसाइल छोड़ना आर्थिक और सैन्य रूप से व्यावहारिक नहीं है। इसके अलावा, ईरान के विशाल और विविध बैलिस्टिक व क्रूज मिसाइल जखीरे के सामने सऊदी अरब अब केवल पश्चिमी देशों से रक्षा प्रणालियां खरीदने के बजाय खुद एक मजबूत निवारक (Deterrence) क्षमता खड़ी करना चाहता है, ताकि किसी भी संभावित बड़े युद्ध की स्थिति में वह दुश्मन के ठिकानों पर तुरंत और करारा प्रहार कर सके।

अमेरिकी निर्भरता को कम करने और क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का विजन 2030

सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) के नेतृत्व में देश अपनी सुरक्षा प्राथमिकताओं को पूरी तरह पुनर्गठित कर रहा है। प्रिंस सलमान का स्पष्ट मानना है कि सऊदी अरब को अपनी रक्षा जरूरतों का कम से कम 50 प्रतिशत हिस्सा घरेलू स्तर पर निर्मित करना होगा। अतीत में जब भी अमेरिका या यूरोपीय देशों में राजनीतिक परिस्थितियां बदली हैं, तब सऊदी अरब को हथियारों के पुर्जों और नई मिसाइलों की आपूर्ति में अनिश्चितता और प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा है। अमेरिकी कांग्रेस द्वारा हथियार बिक्री पर लगाए जाने वाले कड़े नियमों और मानवाधिकार संबंधी शर्तों से परेशान होकर सऊदी अरब ने अब एक स्वतंत्र और बहुआयामी विदेश व रक्षा नीति चुनी है। अल-वताह में बन रही यह मिसाइल फैक्ट्री सऊदी अरब के 'विजन 2030' के उस रणनीतिक लक्ष्य का ही हिस्सा है, जिसके तहत देश अपनी रक्षा तकनीकों का स्वदेशीकरण कर रहा है।

मध्य पूर्व में नया मिसाइल हथियारों का दौर और आने वाले समय में वैश्विक सुरक्षा पर प्रभाव

सऊदी अरब के इस स्वदेशी बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम से मध्य पूर्व में शक्ति का एक नया ढांचा तैयार हो रहा है। इज़राइल, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और अब सऊदी अरब के पास अपनी-अपनी बैलिस्टिक व हाइपरसोनिक मिसाइल क्षमताएं होने से पूरे क्षेत्र में 'म्युचुअली एश्योर्ड डिस्ट्रक्शन' (एक-दूसरे को नष्ट करने की क्षमता) जैसी स्थिति बन रही है। वैश्विक विश्लेषकों का मानना है कि यदि सऊदी अरब सफलतापूर्वक अपनी लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों का बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू कर देता है, तो यह ईरान को बातचीत की मेज पर लाने और हुती विद्रोहियों की दुस्साहसिक गतिविधियों पर लगाम लगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। हालांकि, इस घटनाक्रम ने परमाणु अप्रसार (Non-Proliferation) के पैरोकारों की चिंता भी बढ़ा दी है, क्योंकि उन्नत बैलिस्टिक मिसाइलें भविष्य में किसी भी प्रकार के पेलोड को ले जाने में सक्षम होती हैं। जब तक यमन और पूरे खाड़ी क्षेत्र में कोई स्थायी शांति समझौता नहीं हो जाता, तब तक सऊदी अरब का यह नया और आक्रामक रक्षा रुख कायम रहने वाला है।