सऊदी अरब और सीरिया के बीच ऐतिहासिक रक्षा समझौते का ऐलान

सऊदी अरब और सीरिया के बीच ऐतिहासिक रक्षा समझौते का ऐलान

पश्चिम एशिया की कूटनीति और सैन्य समीकरणों में एक बेहद ऐतिहासिक और चौंकाने वाला फेरबदल देखने को मिला है। रियाद में हुई उच्चस्तरीय बैठकों के बाद सऊदी अरब और सीरिया ने आधिकारिक तौर पर एक व्यापक रक्षा सहयोग समझौते (Defense Cooperation Agreement) पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। यह द्विपक्षीय समझौता न केवल दोनों देशों के बीच दशकों पुरानी भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और कड़वाहट के खत्म होने का सबसे बड़ा प्रमाण है, बल्कि इसने अरब जगत के सुरक्षा ढांचे को भी पूरी तरह से बदल कर रख दिया है। मध्य पूर्व के रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस रक्षा सौदे के बाद अब यमन में जारी युद्ध में हूती विद्रोहियों के खिलाफ सीरियाई सेना (Syrian Armed Forces) की संभावित तैनाती का रास्ता काफी हद तक साफ हो गया है।

रक्षा समझौते का ऐलान और क्षेत्रीय सुरक्षा में बड़ा बदलाव

सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और सीरियाई नेतृत्व के बीच हुई सीधी बातचीत के बाद इस रक्षा समझौते की पुष्टि की गई है। इस ऐतिहासिक रक्षा संधि के तहत दोनों देश सैन्य खुफिया जानकारी साझा करने, संयुक्त सैन्य अभ्यास करने, रक्षा प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण और आतंकवाद-विरोधी अभियानों में एक-दूसरे का सहयोग करने पर सहमत हुए हैं। इसके अलावा, रियाद ने सीरिया के पुनर्निर्माण और संस्थागत विकास के लिए 400 मिलियन डॉलर से अधिक के रियायती विकास ऋण देने की भी घोषणा की है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह रक्षा समझौता पश्चिम एशिया में ईरान के प्रभाव को सीमित करने और अरब सीमाओं की सामूहिक सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में रियाद की एक मास्टरस्ट्रोक रणनीति का हिस्सा है।

हूतियों के खिलाफ सीरियाई सेना की संभावित तैनाती और रणनीतिक मायने

अंतर्राष्ट्रीय मीडिया और रक्षा रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि इस समझौते का सबसे तात्कालिक असर यमन सीमा और लाल सागर में देखने को मिल सकता है। पिछले काफी समय से यमन के हूती विद्रोही न केवल लाल सागर में अंतरराष्ट्रीय जहाजों पर हमले कर रहे हैं, बल्कि सऊदी अरब की दक्षिणी सीमाओं और सीमावर्ती चौकियों को भी निशाना बना रहे हैं। हालांकि सऊदी अरब ने पाकिस्तान और तुर्की जैसे देशों के साथ गठबंधन बनाकर अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने की कोशिश की थी, लेकिन हूतियों के गुरिल्ला युद्ध कौशल के सामने जमीनी चुनौतियां बनी हुई हैं। सीरियाई सेना, जिसे पिछले एक दशक से अधिक समय से उग्रवादियों और गुरिल्ला गुटों से लड़ने का व्यापक और व्यावहारिक अनुभव है, हूतियों के खिलाफ जमीनी मोर्चे पर एक अत्यंत कारगर भूमिका निभा सकती है।

अरब एकजुटता का नया दौर और तेहरान के लिए बड़ा रणनीतिक झटका

सऊदी-सीरिया रक्षा सौदे को पश्चिम एशिया के शक्ति संतुलन में एक बहुत बड़े मोड़ के रूप में देखा जा रहा है। अब तक सीरिया को ईरान का सबसे भरोसेमंद सहयोगी माना जाता था और तेहरान के "रेजिस्टेंस एक्सेस" (Access of Resistance) में दमिश्क की अहम भूमिका थी। हालांकि, सीरिया द्वारा सऊदी अरब के साथ सीधे सैन्य समझौते पर हस्ताक्षर करना और रियाद के आर्थिक ब्लॉक से जुड़ना यह दर्शाता है कि दमिश्क अब अपने अरब पड़ोसियों के साथ संबंधों को बहाल करने को प्राथमिकता दे रहा है। इस कदम से ईरान के क्षेत्रीय प्रभाव पर सीधा असर पड़ना तय माना जा रहा है, क्योंकि हूती विद्रोहियों को भी मुख्य रूप से ईरान समर्थित गुट माना जाता है।

कूटनीतिक विश्लेषण: क्या यमन युद्ध का मोड़ साबित होगा यह रक्षा समझौता?

सामरिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि सीरियाई बल या सैन्य सलाहकार सीधे यमन मोर्चे पर सऊदी नीत गठबंधन का सहयोग करते हैं, तो इससे हूती विद्रोहियों पर चौतरफा सैन्य दबाव बन जाएगा। जहां एक तरफ अमेरिका और पश्चिमी देश लाल सागर में हूतियों के हवाई और समुद्री ठिकानों को निशाना बना रहे हैं, वहीं सीरियाई सेना का अनुभव जमीनी सीमा सुरक्षा को मजबूत करने में निर्णायक साबित हो सकता है। यह समझौता इस बात का भी साफ संदेश देता है कि मध्य पूर्व के देश अब अपनी क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए बाहरी ताकतों के बजाय आपस में ही मजबूत कूटनीतिक और सैन्य धड़ेबंदी तैयार करने में जुटे हैं।