मक्का की मस्जिद में 'अनैतिक कृत्य' के लिए सजा-ए-मौत
दुनियाभर में अपनी सख्त इस्लामिक कानून व्यवस्था और अदालती फैसलों के लिए मशहूर सऊदी अरब से एक बेहद सनसनीखेज और चौंकाने वाली खबर सामने आई है। खाड़ी देश के पवित्र शहर मक्का की एक मस्जिद के अंदर कथित तौर पर 'अनैतिक और आपत्तिजनक कृत्य' करने के जुर्म में सऊदी प्रशासन ने दो बांग्लादेशी नागरिकों को मौत की सजा दे दी है। इस सख्त और कठोर कार्रवाई के बाद से अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों के साथ-साथ कूटनीतिक गलियारों में भी हड़कंप मच गया है। आइए एक स्वतंत्र ग्राउंड रिपोर्टर की नजर से जानते हैं कि आखिर इस पूरी घटना के पीछे की सच्चाई क्या है और सऊदी कानून इसके बारे में क्या कहता है।
सऊदी गृह मंत्रालय का आधिकारिक बयान और तजीर कानून के तहत सजा
सऊदी अरब के आधिकारिक गृह मंत्रालय द्वारा जारी किए गए बयान के अनुसार, जिन दो लोगों को मौत की सजा दी गई है, उनकी पहचान नजरुल इस्लाम बशीर और सितारा या सिटी अख्तर के रूप में हुई है, जो मूल रूप से बांग्लादेश के नागरिक थे। हालांकि स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स में इन्हें एक कपल यानी जोड़ा बताया जा रहा है, लेकिन आधिकारिक तौर पर उनके वैवाहिक रिश्तों या पारिवारिक संबंधों की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।
सऊदी प्रशासन का कहना है कि इन दोनों ने मक्का क्षेत्र की एक मस्जिद के अंदर बेहद गंभीर और पवित्रता को ठेस पहुंचाने वाला 'अनैतिक कृत्य' किया था। इस मामले में पूरी कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए आरोपियों को एक सक्षम अदालत के समक्ष पेश किया गया। अदालत ने अपराध की गंभीरता और पवित्र स्थान की मर्यादा के उल्लंघन को आधार बनाते हुए दोनों को दोषी करार दिया। इसके बाद 'तजीर' (Ta'zir) यानी इस्लामिक न्यायशास्त्र के तहत मिलने वाली विवेकाधीन सजा के प्रावधान के अंतर्गत मौत की सजा सुनाई गई। न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने और रॉयल ऑर्डर यानी शाही आदेश मिलने के बाद इस सजा को मक्का क्षेत्र में पूरी सख्ती के साथ अमल में लाया गया।
बांग्लादेश सरकार और जिद्दा स्थित वाणिज्य दूतावास को नहीं दी गई थी कोई पूर्व सूचना
इस खौफनाक और सख्त कार्रवाई के सामने आने के बाद एक दूसरा बड़ा कूटनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, सऊदी अरब में स्थित बांग्लादेश के जिद्दा कंसल जनरल कार्यालय ने यह दावा किया है कि इस पूरी सजा-ए-मौत और फांसी की कार्रवाई से पहले उन्हें किसी भी प्रकार की आधिकारिक पूर्व सूचना नहीं दी गई थी।
बांग्लादेशी अधिकारियों का कहना है कि जब मीडिया के माध्यम से उन्हें इस घटना की जानकारी मिली, तब उन्होंने सऊदी अरब के विदेश मंत्रालय को एक कूटनीतिक नोट (Note Verbale) सौंपकर इस पूरी प्रक्रिया और निष्पादन के बारे में आधिकारिक पुष्टि की मांग की है। अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत जब किसी दूसरे देश के नागरिकों को इस तरह की गंभीर सजा दी जाती है, तो उसके दूतावास को सूचना देना कूटनीतिक शिष्टाचार माना जाता है। इस मामले में पारदर्शिता की कमी को लेकर मानवाधिकार संगठनों ने भी चिंता जताई है।
मस्जिद की पवित्रता और सऊदी कानून की जीरो टॉलरेंस नीति
सऊदी अरब सरकार ने इस पूरे मामले पर कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि देश के धार्मिक स्थलों, विशेष तौर पर मक्का और मदीना जैसी पवित्र जगहों की पवित्रता, सुरक्षा और गरिमा के साथ खिलवाड़ करने वाले किसी भी शख्स को बख्शा नहीं जाएगा। चाहे वे स्थानीय नागरिक हों या फिर विदेशों से रोजी-रोटी कमाने आए कोई प्रवासी मजदूर, कानून सबके लिए पूरी तरह से एक समान है।
सऊदी गृह मंत्रालय ने अपने बयान में कड़े शब्दों में चेतावनी दी है कि जो भी व्यक्ति देश के कानूनों, धार्मिक मान्यताओं और मस्जिदों की मर्यादा का उल्लंघन करेगा, उसे राज्य के सख्त कानूनों के तहत बिना किसी नरमी के सजा भुगतनी होगी। इस घटना के बाद से खाड़ी देशों में काम करने वाले लाखों विदेशी प्रवासियों के बीच भी एक अलग तरह का डर और सतर्कता का माहौल देखने को मिल रहा है।
अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार और कैपिटल पनिशमेंट पर उठते सवाल
इस सनसनीखेज घटना ने एक बार फिर मध्य पूर्व के देशों में दी जाने वाली मौत की सजा (Capital Punishment) और न्यायिक पारदर्शिता की बहस को पूरी दुनिया के सामने लाकर खड़ा कर दिया है। एमनेस्टी इंटरनेशनल और अन्य वैश्विक मानवाधिकार संगठन लंबे समय से सऊदी अरब में दी जाने वाली फांसी की सजाओं और मुकदमों की गोपनीयता पर सवाल उठाते रहे हैं।
बहरहाल, इस ताजा मामले ने यह साबित कर दिया है कि सऊदी अरब अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं के मामलों में किसी भी प्रकार के बाहरी दबाव या समझौते के लिए तैयार नहीं है। मक्का की मस्जिद में घटी इस अजीबोगरीब और गंभीर घटना ने पूरी दुनिया की मीडिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है, जहां एक तरफ धार्मिक पवित्रता की रक्षा की बात हो रही है, तो दूसरी तरफ कूटनीतिक मोर्चे पर पारदर्शिता और मानवाधिकारों को लेकर नए सवाल भी खड़े हो रहे हैं।