संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से वीटो पावर खत्म करने की उठी मांग
वैश्विक कूटनीति के सबसे बड़े मंच संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के सत्र से एक ऐसा ऐतिहासिक और धमाकेदार बयान सामने आया है जिसने दुनिया भर के महाशक्तियों की नींद उड़ा दी है। मलेशिया के विदेश मंत्री ने यूएनजीए के मंच से सीधे तौर पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के पांच स्थायी सदस्यों (P5) को खुली चुनौती देते हुए वीटो पावर (Veto Power) को पूरी तरह से समाप्त करने या इसमें आमूल-चूल सुधार करने की पुरजोर मांग उठाई है। उनके इस बेबाक और कड़े रुख ने वैश्विक मंच पर एक नया भूचाल ला दिया है, क्योंकि लंबे समय से विकासशील और छोटे देश संयुक्त राष्ट्र की निर्णय लेने की प्रक्रिया में सुधार और पारदर्शिता की मांग करते रहे हैं। इस साहसिक भाषण के बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति के गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या आने वाले समय में दुनिया की सबसे बड़ी वैश्विक संस्था के ढांचे में कोई क्रांतिकारी बदलाव देखने को मिलेगा।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मौजूदा व्यवस्था और वीटो पावर का विवाद
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद यानी UNSC में वर्तमान में अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस जैसे पांच स्थायी सदस्य देश शामिल हैं, जिनके पास किसी भी महत्वपूर्ण प्रस्ताव को अकेले अपने दम पर खारिज करने की ताकत यानी वीटो पावर मौजूद है। इस व्यवस्था की आलोचना करते हुए दुनिया भर के विशेषज्ञ और राजनेता लंबे समय से यह कहते आ रहे हैं कि यह प्रणाली आधुनिक दौर की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को नहीं दर्शाती है और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के पुराने दौर के समीकरणों पर टिकी हुई है। जब भी वैश्विक शांति, आतंकवाद या मानवीय संकट जैसे गंभीर मुद्दों पर कोई सर्वसम्मति से प्रस्ताव लाने की कोशिश की जाती है, तो इनमें से कोई एक देश अपने कूटनीतिक स्वार्थों के चलते वीटो का इस्तेमाल करके पूरी प्रक्रिया को रोक देता है। मलेशियाई विदेश मंत्री ने इसी दोहरे मापदंड और अन्यायपूर्ण व्यवस्था पर करारा प्रहार करते हुए कहा कि जब तक दुनिया के सभी क्षेत्रों और देशों को बराबरी का हक नहीं मिलता, तब तक संयुक्त राष्ट्र की प्रासंगिकता और विश्वसनीयता पर सवालिया निशान हमेशा बने रहेंगे।
वैश्विक दक्षिण की आवाज और मलेशियाई विदेश मंत्री का ऐतिहासिक भाषण
मलेशिया के शीर्ष राजनयिक द्वारा संयुक्त राष्ट्र के मंच से उठाई गई यह आवाज केवल एक देश का विचार नहीं है, बल्कि यह ग्लोबल साउथ यानी विकासशील देशों की उस गहरी पीड़ा और असंतोष का प्रतिबिंब है जो दशकों से वैश्विक निर्णयों से बाहर रखे गए हैं। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के अधिकांश देश लगातार यह मांग करते रहे हैं कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का विस्तार किया जाना चाहिए और उसमें भारत, ब्राजील, जापान और जर्मनी जैसे उभरते हुए बड़े देशों को भी स्थायी सदस्यता दी जानी चाहिए ताकि दुनिया का वास्तविक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो सके। मलेशियाई विदेश मंत्री ने अपने संबोधन में दो टूक शब्दों में कहा कि चंद देशों के हाथों में असीमित अधिकार होना वैश्विक लोकतंत्र की मूल भावना के पूरी तरह खिलाफ है। उनके इस भाषण के बाद हॉल में मौजूद कई देशों के प्रतिनिधियों ने दबे स्वर में इसका समर्थन किया, जिससे यह साफ हो गया कि दुनिया अब इस बात को लेकर जागरूक हो रही है कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार का समय आ चुका है।
P5 देशों की प्रतिक्रिया और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर पड़ने वाले दूरगामी प्रभाव
मलेशियाई मंत्री द्वारा दी गई इस खुली चुनौती के बाद स्थायी सदस्य देशों (P5) की तरफ से अभी तक कोई आधिकारिक और तीखी प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि महाशक्तियां अपनी इस विशेष ताकत को आसानी से छोड़ने वाली नहीं हैं। चीन, रूस और पश्चिमी देशों के अपने-अपने भू-राजनीतिक हित हैं और वे सुरक्षा परिषद की वर्तमान संरचना को अपने पक्ष में बनाए रखने के लिए हरसंभव प्रयास करते हैं। हालांकि, इस तरह की आवाजें उठने से वैश्विक दबाव लगातार बढ़ रहा है और संयुक्त राष्ट्र में सुधार (UN Reforms) की मांग अब केवल एक बहस तक सीमित नहीं, बल्कि एक अंतरराष्ट्रीय आंदोलन का रूप लेती जा रही है। भारत जैसे देश भी लंबे समय से सुरक्षा परिषद में सुधार की वकालत करते रहे हैं और उनका मानना है कि जब तक इस संस्था में बदलाव नहीं होगा, तब तक समकालीन दुनिया की चुनौतियों से प्रभावी तरीके से नहीं निपटा जा सकता। आने वाले समय में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि मलेशिया और अन्य समान विचारधारा वाले देशों की यह पहल संयुक्त राष्ट्र के भविष्य की दिशा तय करने में कितनी कारगर साबित होती है।