विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अजरबैजान के ऐतिहासिक 'फायर टेंपल' का दौरा किया
भारतीय कूटनीति के मजबूत स्तंभ और केंद्रीय विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर की हालिया अजरबैजान यात्रा ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। अजरबैजान की राजधानी बाकू में एक ओर जहां उच्चस्तरीय द्विपक्षीय बातचीत और रणनीतिक साझेदारी पर मंथन हुआ, वहीं दूसरी ओर एक ऐसी तस्वीर सामने आई जिसने हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा कर दिया। विदेश मंत्री बाकू के प्रसिद्ध सुरखानी इलाके में स्थित ऐतिहासिक 'अतेशगाह' (Ateshgah) यानी ज्वाला मंदिर पहुंचे। यह केवल एक प्राचीन इमारत या ऐतिहासिक स्मारक नहीं है, बल्कि यह इस बात का जीवंत प्रमाण है कि सदियों पहले भी भारतीय संस्कृति, सनातन परंपरा और व्यापारिक रिश्ते भारत की सीमाओं को लांघकर मध्य एशिया और कैस्पियन सागर के तटों तक फैले हुए थे। इस मंदिर परिसर में जलती हुई अखंड ज्योति, दीवारों पर उकेरे गए संस्कृत और गुरमुखी के शिलालेख तथा वहां विराजमान भगवान श्री गणेश की प्रतिमा इस बात की गवाही देती है कि भारत का सांस्कृतिक प्रभाव दुनिया के कोने-कोने में किस कदर गहरा रचा-बसा हुआ है।
बाकू का प्रसिद्ध 'अतेशगाह' फायर टेंपल और इसका भारत की समृद्ध व्यापारिक व सांस्कृतिक विरासत से अटूट संबंध
अजरबैजान को ऐतिहासिक रूप से 'लैंड ऑफ फायर' यानी आग की भूमि कहा जाता है, क्योंकि यहां की भूमि के नीचे प्राकृतिक गैस के विशाल भंडार हैं जो सतह पर आकर प्राकृतिक रूप से प्रज्वलित होते रहते हैं। बाकू से करीब 30 किलोमीटर दूर सुरखानी शहर में बना अतेशगाह मंदिर परिसर सदियों से श्रद्धालुओं और यात्रियों के लिए आस्था का केंद्र रहा है। इस मंदिर का निर्माण मुख्य रूप से 17वीं और 18वीं शताब्दी में हुआ था, जब भारतीय व्यापारी प्रसिद्ध सिल्क रूट (रेशम मार्ग) के जरिए मध्य एशिया और यूरोप के साथ व्यापार करते थे। मुल्तान, सिंध और पंजाब के हिंदू व सिख व्यापारी जब कैस्पियन सागर के रास्ते व्यापार के सिलसिले में बाकू ठहरते थे, तो उन्होंने अपनी पूजा-अर्चना और विश्राम के लिए इस भव्य मंदिर परिसर का निर्माण कराया था। यह मंदिर एक पंचकोणीय संरचना के रूप में बना हुआ है जिसके केंद्र में एक खुला प्रांगण है और चारों तरफ श्रद्धालुओं व व्यापारियों के ठहरने के लिए छोटे-छोटे कमरे (कोठरियां) बने हुए हैं। प्रांगण के ठीक बीच में एक चतुष्कोणीय वेदी बनी है, जहां प्राकृतिक रूप से आग की लपटें निरंतर उठती रहती थीं।
मंदिर परिसर में संस्कृत और गुरमुखी शिलालेखों के साथ स्थापित भगवान गणेश की प्रतिमा का ऐतिहासिक महत्व
जब विदेश मंत्री एस जयशंकर ने इस मंदिर परिसर का भ्रमण किया, तो उन्होंने वहां स्थापित भगवान श्री गणेश की प्रतिमा के दर्शन किए और नमन किया। एक मुस्लिम बहुल देश में स्थित ऐतिहासिक इमारत के भीतर प्रथम पूज्य भगवान गणेश की मौजूदगी भारतीय संस्कृति की अमरता को दर्शाती है। इसके अलावा, अतेशगाह मंदिर की सबसे बड़ी खासियत इसकी दीवारों पर उकेरे गए 20 से अधिक ऐतिहासिक शिलालेख हैं। ये शिलालेख मुख्य रूप से संस्कृत (देवनागरी लिपि) और गुरमुखी लिपि में लिखे गए हैं। इनमें से कई शिलालेखों की शुरुआत 'ॐ गणेशाय नमः' और 'सतिनाम श्री वाहेगुरु' से होती है। इन शिलालेखों में उन भारतीय व्यापारियों, साधुओं और दानदाताओं के नाम और तिथियां दर्ज हैं जिन्होंने इस मंदिर के जीर्णोद्धार और निर्माण में अपना योगदान दिया था। ये शिलालेख स्पष्ट रूप से प्रमाणित करते हैं कि यहां सनातन परंपरा के अनुयायियों के साथ-साथ सिख समुदाय के लोग भी नियमित रूप से आते थे और भगवान शिव, भगवान गणेश तथा अग्नि देव की उपासना करते थे।
विदेश मंत्री एस जयशंकर का भावुक संदेश और आधुनिक जनरेटिव एआई दौर में भारत की वैश्विक सांस्कृतिक कूटनीति
सुरखानी के फायर टेंपल की यात्रा के बाद विदेश मंत्री एस जयशंकर ने सोशल मीडिया पर अपनी तस्वीरें साझा करते हुए लिखा कि अजरबैजान के बाकू स्थित अतेशगाह मंदिर का दौरा करना बेहद अद्भुत और यादगार अनुभव रहा। उन्होंने कहा कि यह मंदिर भारत और अजरबैजान के बीच सदियों पुराने ऐतिहासिक, व्यापारिक और जन-से-जन (People-to-People) संबंधों का एक सजीव प्रतीक है। आज के आधुनिक दौर में जब दुनिया एआई (Artificial Intelligence) और वैश्विक नेटवर्क के जरिए जुड़ रही है, तब भारत अपनी प्राचीन सांस्कृतिक कूटनीति (Soft Power) को दुनिया के सामने नए रूप में प्रस्तुत कर रहा है। अजरबैजान सरकार ने भी इस ऐतिहासिक विरासत के महत्व को समझते हुए वर्ष 1998 में इसे यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल की संभावित सूची में शामिल कराया और 2007 में इसे एक राज्य ऐतिहासिक-वास्तुकला रिजर्व घोषित किया। आज इस परिसर को एक शानदार संग्रहालय के रूप में विकसित किया गया है, जहां दुनिया भर से आने वाले पर्यटक भारत की इस गौरवशाली विरासत को देखने पहुंचते हैं।
भारत और अजरबैजान के मजबूत होते द्विपक्षीय रिश्ते और क्षेत्रीय कूटनीतिक भू-राजनीति में इस यात्रा का प्रभाव
विदेश मंत्री की यह यात्रा केवल एक सांस्कृतिक दौरा नहीं थी, बल्कि इसके पीछे गहरे रणनीतिक और कूटनीतिक मायने भी छिपे हैं। अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) के दृष्टिकोण से अजरबैजान भारत के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार है। कैस्पियन सागर के तट पर बसा अजरबैजान भारत को रूस और यूरोप से जोड़ने में एक अहम कड़ी साबित हो सकता है। यद्यपि पिछले कुछ वर्षों में अजरबैजान और भारत के संबंधों में कूटनीतिक उतार-चढ़ाव देखे गए हैं, विशेष रूप से अजरबैजान के पाकिस्तान और तुर्की के साथ करीबी संबंधों के कारण, लेकिन जयशंकर की इस यात्रा और ऐतिहासिक सांस्कृतिक संबंधों की याद दिलाने से दोनों देशों के बीच संवाद का एक नया और सकारात्मक रास्ता खुला है। भारत ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि वह अपनी ऐतिहासिक जड़ों का सम्मान करते हुए अजरबैजान के साथ व्यापारिक, ऊर्जा और सांस्कृतिक क्षेत्रों में आपसी लाभ के आधार पर आगे बढ़ने के लिए तैयार है।
बाकू के अतेशगाह में सनातन और सिख धर्म के संगम की अद्भुत गाथा जो आज भी पूरी दुनिया को प्रेरणा देती है
बाकू का ज्वाला मंदिर केवल पत्थरों और चूने से बनी कोई पुरानी संरचना नहीं है, बल्कि यह दूर-दराज के देशों में भी अपने धर्म, आस्था और जड़ों से जुड़े रहने की भारतीय भावना का प्रतीक है। प्राचीन काल में जब संचार और परिवहन के आधुनिक साधन नहीं थे, तब भी भारतीय व्यापारी महीनों की कठिन यात्राएं करके बाकू पहुंचते थे और अपनी कमाई का एक हिस्सा इस पावन स्थल के निर्माण और रखरखाव में लगाते थे। वहां मौजूद गुरमुखी के शिलालेख इस बात का सबूत हैं कि गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं और सिख परंपराओं का प्रभाव भी इस क्षेत्र तक पहुंचा था। स्थानीय अजरबैजानी लोग भी इस स्थल को अत्यधिक पवित्र मानते हैं और इसे अपनी साझी विरासत का हिस्सा मानते हैं। एस जयशंकर की इस ऐतिहासिक यात्रा ने एक बार फिर से पूरी दुनिया का ध्यान इस बात की ओर खींचा है कि भारत की सांस्कृतिक सीमाएं हमेशा से ही अत्यंत व्यापक रही हैं और भारत का वैश्विक प्रभाव सदियों पुराना है।