सिंधु जल संधि पर नई दिल्ली की सख्ती के बाद 'जवाब' तलाशने में कंगाल हो रहा इस्लामाबाद
दक्षिण एशिया के कूटनीतिक और भू-राजनीतिक गलियारों में इस समय एक ऐसी सुगबुगाहट तेज हो गई है जिसने पाकिस्तान की नींद उड़ा कर रख दी है। भारत द्वारा सिंधु जल संधि (Indus Water Treaty - IWT) के प्रावधानों में एकतरफा संशोधन करने और देश के राष्ट्रीय हितों के अनुरूप पानी के प्रबंधन को बदलने की ऐतिहासिक पहल के बाद से पाकिस्तान में हाहाकार मचा हुआ है। पाकिस्तानी हुक्मरान और सैन्य रणनीतिकार इस बात से पूरी तरह बौखलाए हुए हैं कि यदि भारत ने सिंधु बेसिन की नदियों के पानी का रुख अपनी तरफ मोड़ लिया, तो कृषि प्रधान पाकिस्तान के बड़े हिस्से बंजर हो जाएंगे और देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो जाएगी। इस आसन्न जल संकट से निपटने और भारत को सामरिक 'जवाब' देने के नाम पर पाकिस्तानी सरकार अंधाधुंध कर्ज लेकर महंगे और असफल रक्षा प्रोजेक्ट्स और काउंटर-मेजर्स पर पानी की तरह पैसा बहा रही है, जिसके चलते देश अब दिवालिया होने की कगार पर पहुंच चुका है।
सिंधु जल संधि में भारत के संशोधन का फैसला और पाकिस्तान पर मंडराता जल संकट का सबसे बड़ा खतरा
विगत दशकों से चली आ रही सिंधु जल संधि पर पुनर्विचार करने का भारत का निर्णय किसी अचानक उठाया गया कदम नहीं है, बल्कि यह एक सोची-समझी और बेहद मजबूत कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर स्पष्ट कर दिया है कि खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते, और जब तक सीमा पार से प्रायोजित आतंकवाद बंद नहीं होता, तब तक ऐसे संधियों पर यथास्थिति बनाए रखना संभव नहीं है। भारत ने अपनी तरफ की नदियों पर पनबिजली परियोजनाओं (Hydroelectric Projects), नहरों के आधुनिकीकरण और जल संचयन क्षमता को तेजी से बढ़ाना शुरू कर दिया है। जैसे-जैसे भारत चेनाव, झेलम और सिंधु नदियों के पानी का अधिकतम उपयोग अपनी उपजाऊ भूमि और पंजाब-हरियाणा के किसानों के लिए सुनिश्चित कर रहा है, वैसे-वैसे पाकिस्तान में जल प्रवाह कम होने की आशंका गहराती जा रही है, जो पाकिस्तान के कृषि क्षेत्र के लिए किसी बड़े महाविनाश से कम नहीं है।
भारत का मुकाबला करने के चक्कर में पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था और खजाने का दिवालिया होना
पाकिस्तान की सरकार और उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई इस बात से अच्छी तरह वाकिफ हैं कि यदि भारत ने वास्तव में सिंधु जल के पारंपरिक प्रवाह को रोक दिया, तो देश की खाद्य सुरक्षा और नदियां पूरी तरह सूख जाएंगी। इस संभावित आपदा से निपटने के लिए पाकिस्तानी हुक्मरानों ने बिना सोचे-समझे अरबों डॉलर के काउंटर-प्रोजेक्ट्स और वैकल्पिक जल संचय बांध बनाने की योजनाएं शुरू कर दी हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से बेलआउट पैकेज और मित्र देशों से कर्ज की भीख मांगकर चलाने वाले पाकिस्तान ने अपनी प्राथमिकताओं को ताक पर रखकर केवल भारत को घेरने के नाम पर अंधाधुंध खर्च करना शुरू कर दिया है। विशेषज्ञों और खुफिया रिपोर्टों के खुलासे के अनुसार, झूठी शान और रणनीतिक अहंकार के चक्कर में पाकिस्तान अपनी चरमराती अर्थव्यवस्था के बचे-खुचे खजाने को भी पानी की तरह बहा चुका है, जिससे देश में महंगाई आसमान छू रही है और आम जनता दो वक्त की रोटी के लिए मोहताज हो रही है।
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में पाकिस्तान की विफलता और वैश्विक समुदाय द्वारा भारत के रुख पर मौन समर्थन
पाकिस्तान ने सिंधु जल संधि के मुद्दे पर दुनिया भर के देशों और विश्व बैंक के दरबार में जाकर रोना रोया, लेकिन उसे हर तरफ से निराशा ही हाथ लगी है। भारत ने कानूनी और कूटनीतिक रूप से यह साबित कर दिया है कि बदलते समय, पर्यावरण की आवश्यकताओं और आतंकवाद के बदलते स्वरूप के मद्देनजर किसी भी संधि की समीक्षा करना किसी भी संप्रभु राष्ट्र का मौलिक अधिकार है। पश्चिमी देशों और अमेरिका ने भी यह समझ लिया है कि भारत अपनी सुरक्षा और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है। पाकिस्तान के पारंपरिक सहयोगी भी अब उसकी आर्थिक तंगी और खोखली धमकियों से तंग आ चुके हैं, जिसके कारण इस्लामाबाद को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पूरी तरह अकेला छोड़ दिया गया है। पाकिस्तान के अधिकारी लाख कोशिशों के बावजूद भारत के इस कूटनीतिक मास्टरस्ट्रोक का कोई भी ठोस और व्यावहारिक काट ढूंढने में पूरी तरह विफल साबित हो रहे हैं।
भारत की भविष्य की रणनीतिक आत्मनिर्भरता और दक्षिण एशिया में बदलता शक्ति संतुलन
सिंधु जल संधि पर भारत के इस दृढ़ और अडिग रुख ने दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन की परिभाषा ही बदल दी है। भारत अब रक्षा और कूटनीति के मोर्चे पर किसी भी प्रकार के दबाव में आने वाला नहीं है। एक तरफ जहां भारत बुनियादी ढांचे, मेक इन इंडिया और वैश्विक आर्थिक वृद्धि के रास्ते पर तेजी से आगे बढ़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान अपनी ही नीतियों और भारत-विरोधी मानसिकता के मकड़जाल में फंसकर खुद ब खुद कंगाल होता जा रहा है। आने वाले समय में जैसे-जैसे भारत अपनी जल परियोजनाओं को अंतिम रूप देगा, पाकिस्तान की मुश्किलें और अधिक विकराल रूप धारण करती जाएंगी। यह स्थिति इस बात का स्पष्ट संदेश है कि पड़ोसी देशों के साथ शांति और व्यापार का रास्ता केवल आपसी सहयोग से ही निकल सकता है, न कि आतंकवाद और बेवजह की जिद पालकर खुद को आर्थिक तबाही के मुहाने पर धकेलने से।