भारत-अजरबैजान की नई नजदीकी से पाकिस्तान में बौखलाहट
दक्षिण काकेशस (South Caucasus) की रणनीतिक बिसात पर भारतीय विदेश नीति के मास्टरस्ट्रोक ने पाकिस्तान के राजनीतिक व सैन्य गलियारों में खलबली मचा दी है। भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर की अजरबैजान की राजधानी बाकू की हालिया महत्वपूर्ण यात्रा और राष्ट्रपति इल्हाम अलियेव के साथ हुई उच्चस्तरीय बातचीत के बाद इस्लामाबाद और रावलपिंडी में तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। ऐतिहासिक रूप से अजरबैजान को अपना करीबी रणनीतिक साझेदार मानने वाला पाकिस्तान, भारत के इस कूटनीतिक कदम को अपने प्रभाव क्षेत्र में सीधी सेंधमारी के रूप में देख रहा है। विशेष रूप से पाकिस्तान द्वारा अजरबैजान को बेचे जा रहे JF-17 थंडर फाइटर जेट (JF-17 Thunder Block-III) रक्षा सौदे की पृष्ठभूमि में पाकिस्तानी विश्लेषक और पूर्व रक्षा अधिकारी अब बाकू को सचेत कर रहे हैं कि नई दिल्ली के साथ किसी भी प्रकार का कूटनीतिक रीसेट (Diplomatic Reset) उनके पारंपरिक संबंधों और सैन्य समझौतों पर असर डाल सकता है।
बाकू में जयशंकर और राष्ट्रपति अलियेव की वार्ता के बाद इस्लामाबाद में क्यों बढ़ी कूटनीतिक हलचल
हाल के वर्षों में भारत और अजरबैजान के संबंधों में कुछ कूटनीतिक खिंचाव देखने को मिला था, क्योंकि बाकू ने तुर्की और पाकिस्तान के साथ मिलकर एक मजबूत धुरी का निर्माण किया था और भारत ने अजरबैजान के विरोधी देश आर्मेनिया को रक्षा उपकरण (जैसे पिनाका रॉकेट सिस्टम) मुहैया कराए थे। हालांकि, बदलते वैश्विक परिदृश्य में विदेश मंत्री एस जयशंकर की बाकू यात्रा ने दोनों देशों के बीच संबंधों को नए सिरे से परिभाषित करने का काम किया है। बाकू में हुई वार्ता में अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC), क्षेत्रीय सुरक्षा, आतंकवाद-विरोधी तंत्र और व्यापारिक सहयोग पर गहन चर्चा हुई। भारत के इस सक्रिय कूटनीतिक रुख ने पाकिस्तान के उस रणनीतिक भ्रम को तोड़ दिया है, जिसमें वह मानता था कि दक्षिण काकेशस में भारत की पहुंच सीमित है। पाकिस्तानी मीडिया और थिंक टैंक अब इस बात से आशंकित हैं कि अगर अजरबैजान और भारत के बीच आर्थिक व रणनीतिक दूरी कम होती है, तो पाकिस्तान की 'मुस्लिम एकजुटता' और गुटबाजी वाली विदेश नीति को बड़ा झटका लगेगा।
JF-17 फाइटर जेट डील और पाकिस्तान की चिंता: क्या अजरबैजान के साथ उसकी रणनीतिक धुरी कमजोर होगी
पाकिस्तान ने चीन के साथ मिलकर विकसित किए गए अपने JF-17 थंडर लड़ाकू विमानों की बिक्री के लिए अजरबैजान के साथ लगभग 1.6 बिलियन डॉलर से अधिक का ऐतिहासिक रक्षा समझौता किया था। पाकिस्तान इस रक्षा सौदे को अपने रक्षा निर्यात और भू-राजनीतिक जीत के रूप में प्रचारित कर रहा था। लेकिन जयशंकर की यात्रा और भारत-अजरबैजान के बीच बढ़ते संवाद के बाद पाकिस्तानी रणनीतिकारों को डर सता रहा है कि भारत इस क्षेत्र में अजरबैजान को एक तटस्थ रुख अपनाने के लिए प्रेरित कर सकता है। पाकिस्तानी टीवी चैनलों और रक्षा मंचों पर विश्लेषकों ने बाकू को चेतावनी देना शुरू कर दिया है कि वह भारत की 'सॉफ्ट पावर' और आर्थिक ताकत के प्रभाव में न आए। पाकिस्तानी विशेषज्ञों का मानना है कि भारत आर्मेनिया के साथ अपने रक्षा संबंधों को संतुलित करते हुए बाकू के साथ ऊर्जा और लॉजिस्टिक्स क्षेत्र में बड़े समझौते करने की क्षमता रखता है, जिससे पाकिस्तान-अजरबैजान-तुर्की की त्रिकोणीय धुरी का प्रभाव कम हो सकता है।
अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC) और भारत की दीर्घकालिक यूराशियन रणनीति
बाकू में डॉ. एस जयशंकर की बैठकों का सबसे महत्वपूर्ण पहलू अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC) रहा, जो भारत को ईरान, अजरबैजान और रूस के रास्ते यूरोप व मध्य एशिया से जोड़ता है। भारत के लिए अजरबैजान इस रणनीतिक व्यापारिक मार्ग का एक अनिवार्य भौगोलिक केंद्र है। भारत यह भली-भांति समझता है कि केवल आर्मेनिया तक अपनी नीति सीमित रखने से वह पूरे काकेशस क्षेत्र से अलग-थलग पड़ सकता है। इसलिए, जयशंकर की इस यात्रा के माध्यम से भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा, व्यापारिक हितों और क्षेत्रीय पहुंच के मामले में व्यावहारिक और संतुलित कूटनीति अपनाएगा। भारत की यह परिपक्व और दूरदर्शी कूटनीति पाकिस्तान की उस संकीर्ण नीति को करारा जवाब है, जो केवल सैन्य निर्यात और बयानों पर निर्भर रहती है।
दक्षिण काकेशस में शक्ति संतुलन का नया दौर और पाकिस्तान के लिए बदलती वैश्विक जमीनी हकीकत
पाकिस्तान में जयशंकर की इस यात्रा पर आ रही तीखी और तिलमिलाई प्रतिक्रियाएं यह साबित करती हैं कि भारत का वैश्विक प्रभाव अब केवल उसके पड़ोसी राज्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह विश्व के उन हिस्सों में भी अपने हितों की रक्षा कर रहा है जिन्हें पाकिस्तान अपना 'सुरक्षित गढ़' समझता था। अजरबैजान द्वारा भारत के कूटनीतिक प्रतिनिधियों का गर्मजोशी से स्वागत करना इस बात का संकेत है कि बाकू भी अपनी विदेश नीति को किसी एक देश (पाकिस्तान या तुर्की) का बंधक नहीं बनने देना चाहता और वह भारत जैसी दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के साथ जुड़ने के व्यावहारिक लाभों को समझता है। आने वाले समय में जैसे-जैसे INSTC प्रोजेक्ट गति पकड़ेगा और भारत-अजरबैजान के बीच व्यापारिक संबंध मजबूत होंगे, पाकिस्तान के लिए इस क्षेत्र में भारत के बढ़ते कदम को रोकना और अपनी प्रासंगिकता बनाए रखना एक बेहद कठिन चुनौती बन जाएगा।