हूतियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई और विदेश मंत्री इशाक डार की बढ़ी मुश्किलें

हूतियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई और विदेश मंत्री इशाक डार की बढ़ी मुश्किलें

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के पटल पर मध्य पूर्व के बदलते समीकरण इन दिनों पाकिस्तान की आंतरिक और बाहरी राजनीति में बड़े भूचाल का कारण बन गए हैं। सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान के बीच हुए त्रिपक्षीय 'मक्का पैक्ट' (Mecca Pact) को लेकर पाकिस्तान के भीतर सियासी घमासान छिड़ गया है। इस रक्षा समझौते के सक्रिय होने और यमन के हूती विद्रोहियों के खिलाफ संभावित सैन्य कार्रवाई को लेकर पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार बुरी तरह से फंसते हुए नजर आ रहे हैं। विपक्षी दलों और घरेलू मोर्चे पर इस बात को लेकर तीखा विरोध जताया जा रहा है कि क्या पाकिस्तान की सेना को किसी दूसरे देश की ज़मीन पर चल रही जंग में झोंकना देशहित में है या नहीं। इस संवेदनशील मुद्दे पर पाकिस्तान सरकार की नीतियों और विदेश मंत्री के बयानों ने देश की राजनीति में एक नया और गंभीर संकट खड़ा कर दिया है, जिस पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं।

मक्का पैक्ट और सामूहिक रक्षा समझौते की शर्तें

हाल ही में सऊदी अरब के मक्का शहर में सऊदी, तुर्किये और पाकिस्तान के बीच एक अत्यंत महत्वपूर्ण रणनीतिक और रक्षा समझौता हुआ था, जिसे 'मक्का पैक्ट' या मक्का डिफेंस एग्रीमेंट का नाम दिया गया है। इस समझौते की सबसे बड़ी और विवादित शर्त यह है कि यदि हस्ताक्षरकर्ता तीनों देशों में से किसी भी एक देश पर कोई बाहरी सशस्त्र हमला होता है, तो उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा और तीनों मिलकर उसका जवाब देंगे। पिछले कुछ हफ्तों के दौरान जब यमन के हूती विद्रोहियों की तरफ से सऊदी अरब के विभिन्न ठिकानों और हवाई अड्डों पर लगातार बैलिस्टिक मिसाइलें और ड्रोन हमले किए गए, तब इस समझौते के तहत रियाद पर दबाव बढ़ गया कि वह अपने सहयोगियों की मदद से इन हमलों का करारा जवाब दे। इसी पृष्ठभूमि में रियाद में बुलाई गई आपातकालीन बैठकों के बाद इस पैक्ट को सक्रिय करने की घोषणा की गई, जिसके तहत सैन्य बलों की तेजी से तैनाती और रणनीतिक सहयोग पर मुहर लगाई गई।

विदेश मंत्री इशाक डार की बढ़ी मुश्किलें और घरेलू राजनीति का विरोध

जैसे ही पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार ने मक्का पैक्ट के तहत सऊदी अरब की सुरक्षा में व्यावहारिक कदम उठाने और रक्षा समिति की बैठकों के ब्योरे सार्वजनिक किए, वैसे ही पाकिस्तान की घरेलू राजनीति में भूचाल आ गया। जानकारों और विपक्षी नेताओं का कहना है कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पहले से ही गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है और ऐसे समय में देश की सेना को खाड़ी देशों के आंतरिक संघर्ष या हूतियों के साथ चल रही लंबी जंग में उलझाना देश की सुरक्षा के लिए घातक साबित हो सकता है। हालांकि इशाक डार ने यह सफाई देने की कोशिश की है कि इस समझौते का मकसद केवल सामूहिक सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता को मजबूत करना है तथा हूतियों के साथ कूटनीतिक और राजनीतिक संवाद के रास्ते भी खुले रखे जा रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद जनता और राजनीतिक हलकों में इस बात को लेकर भारी नाराजगी है कि पाकिस्तान बिना सोचे-समझे मध्य पूर्व की आग में कूद रहा है।

हूती विद्रोहियों की आक्रामक धमकियां और क्षेत्रीय स्थिरता पर मंडराता खतरा

एक तरफ जहां पाकिस्तान इस पैक्ट को सक्रिय करने और अपनी सेना की भूमिका तय करने में व्यस्त है, वहीं दूसरी तरफ हूती विद्रोही पूरी तरह बेखौफ नजर आ रहे हैं। पाकिस्तान और तुर्किये की एंट्री के बाद भी हूती गुटों ने सऊदी अरब के महत्वपूर्ण ठिकानों और एयरपोर्ट्स को निशाना बनाकर अपने इरादे साफ कर दिए हैं। कूटनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस प्रकार के क्षेत्रीय समझौतों से पाकिस्तान की विदेश नीति और मध्य पूर्व के देशों के साथ उसके पारंपरिक संबंधों में एक जटिल मोड़ आ गया है। यदि आने वाले दिनों में हूती हमलों का दायरा और अधिक बढ़ता है, तो विदेश मंत्री इशाक डार और पाकिस्तानी हुक्मरानों के लिए घरेलू दबाव को संभालना नामुमकिन हो जाएगा। यह पूरा घटनाक्रम इस बात का गवाह है कि कैसे क्षेत्रीय कूटनीति के दांवपेंच कई बार देशों की आंतरिक राजनीति और स्थिरता के लिए एक बड़ा सिरदर्द बन जाते हैं।