नेपाल में दशैन से ठीक पहले मटन की कीमतें आसमान पर: 1700 रुपये प्रति किलो बिक रहा मांस

नेपाल में दशैन से ठीक पहले मटन की कीमतें आसमान पर: 1700 रुपये प्रति किलो बिक रहा मांस

पड़ोसी देश नेपाल में इस समय त्योहारों का उल्लास शुरू हो चुका है, लेकिन इस खुशी के माहौल के बीच वहां की आम जनता पर महंगाई की एक बहुत बड़ी मार पड़ी है। नेपाल का सबसे बड़ा और प्रमुख पर्व 'दशैन' (Dashain) अब बेहद करीब है, और इस पावन अवसर पर खानपान की चीजों, विशेषकर मटन (बकरे के मांस) की कीमतों ने सारे पिछले रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। राजधानी काठमांडू समेत देश के विभिन्न हिस्सों में मटन का भाव अचानक उछलकर 1700 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गया है। इतनी भारी-भरकम कीमत होने के कारण आम मध्यमवर्गीय और गरीब परिवारों के लिए इस बार त्योहार के मौके पर पारंपरिक पकवान बनाना बेहद मुश्किल हो गया है। त्योहारों के सीजन में अचानक खाद्य पदार्थों के दाम इस कदर बढ़ने से बाजारों में हड़कंप मच गया है और लोग सरकार तथा प्रशासनिक व्यवस्था से दामों को नियंत्रित करने की गुहार लगा रहे हैं। इस बेकाबू महंगाई के पीछे क्या कारण हैं और त्योहार से पहले कीमतें इतनी कैसे बढ़ गईं, इसे लेकर पूरे देश में तीखी बहस छिड़ गई है।

दशैन पर्व का त्योहारी सीजन और बकरे के मांस की भारी मांग

नेपाल में दशैन का त्योहार केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं है, बल्कि यह परिवारों के मिलने-जुलने, खुशियां बांटने और विशेष पकवान बनाने का सबसे बड़ा अवसर माना जाता है। इस त्योहार के दौरान पारंपरिक रूप से घरों में मांस और विभिन्न प्रकार के व्यंजनों का विशेष महत्व होता है, जिसके चलते बाजार में बकरे के मांस यानी मटन की मांग कई गुना बढ़ जाती है। मांग और आपूर्ति के इस असंतुलन का फायदा अक्सर स्थानीय व्यापारी और मांस विक्रेता उठाने की कोशिश करते हैं। हर साल दशैन के नजदीक आते ही मटन के दामों में उछाल आना आम बात है, लेकिन इस बार कीमतों में जिस तरह का ऐतिहासिक और बेकाबू उछाल देखा गया है, उसने पिछले सभी रिकॉर्ड पीछे छोड़ दिए हैं। व्यापारियों का तर्क है कि ग्रामीण इलाकों से राजधानी और बड़े शहरों तक बकरों की आवाजाही का खर्च बढ़ गया है और चारे के दाम महंगे होने की वजह से पशुपालकों को भी ऊंची लागत चुकानी पड़ रही है, जिसका सीधा असर खुदरा बाजार में देखने को मिल रहा है।

कीमतों में अचानक इस रिकॉर्ड उछाल के पीछे छिपे मुख्य कारण

नेपाल के खुदरा बाजार में मटन के भाव 1700 रुपये प्रति किलो तक पहुंचने के पीछे कई आर्थिक और व्यावहारिक कारण जिम्मेदार बताए जा रहे हैं। सबसे बड़ा कारण यह है कि नेपाल अपनी स्थानीय मांस की मांग को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर पड़ोसी देशों, विशेषकर भारत से जीवित बकरों के आयात पर निर्भर रहता है। आयात शुल्क, परिवहन लागत, सीमा शुल्क और ईंधन के दामों में वृद्धि के कारण बाहर से आने वाले बकरों की खरीद काफी महंगी हो चुकी है। इसके अलावा, देश के भीतर भी पशुपालन करने वाले किसानों को बाढ़, सूखे और चारे की कमी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ा है, जिससे बाजार में स्वस्थ बकरों की कुल संख्या में खासी कमी दर्ज की गई है। आपूर्ति सीमित होने और त्योहार के कारण मांग अचानक आसमान छूने से बिचौलियों और मुनाफाखोरों को इसका अनुचित लाभ उठाने का पूरा मौका मिल गया है, जिससे कीमतें सीधे नियंत्रण से बाहर होकर रिकॉर्ड स्तर पर जा पहुंची हैं।

आम जनता की बढ़ी मुश्किलें और सरकार की भूमिका पर उठते सवाल

त्योहार के इस सीजन में महंगाई की इस मार ने आम नेपाली नागरिकों की कमर तोड़कर रख दी है। एक तरफ जहां रोजमर्रा की अन्य जरूरतें जैसे दाल, चावल, तेल और सब्जियां पहले से ही महंगी थीं, वहीं अब मटन के दाम 1700 रुपये किलो होने से त्योहार की खुशियां फीकी पड़ने लगी हैं। आम जनता का आरोप है कि सरकार और संबंधित उपभोक्ता अधिकार एजेंसियां त्योहारी सीजन में होने वाली इस कालाबाजारी और मूल्य वृद्धि को रोकने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रही हैं। बाजारों में किसी भी तरह की प्रभावी निगरानी न होने के कारण दुकानदार अपनी मर्जी से मनमाने दाम वसूल रहे हैं। हालांकि उपभोक्ता संरक्षण विभाग और स्थानीय प्रशासन की तरफ से औचक निरीक्षण करने की बात कही जा रही है, लेकिन धरातल पर इसका कोई खास असर दिखाई नहीं दे रहा है। यदि समय रहते कीमतों पर लगाम कसने के लिए कड़े कदम नहीं उठाए गए, तो इस बार का दशैन पर्व आम जनता के लिए उत्सव की बजाय आर्थिक संकट का सबब बनकर रह जाएगा।