नासा की 1.5 टन वजनी दूरबीन धरती पर गिरी
अंतरिक्ष विज्ञान की दुनिया और वैश्विक सुरक्षा निगरानी एजेंसियों के लिए बीता दिन बेहद धुकधुकी भरा रहा। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) के लगभग 1.5 टन वजनी 'निल गेहरल्स स्विफ्ट ऑब्जर्वेटरी' (Swift Observatory) टेलीस्कोप का अनियंत्रित तरीके से पृथ्वी के वायुमंडल में पुनः प्रवेश (Atmospheric Re-entry) हुआ। इससे पहले नासा और दुनिया भर की स्पेस एजेंसियों ने यह चेतावनी जारी की थी कि भारत के दक्षिणी राज्यों, जिसमें मुंबई, हैदराबाद, बेंगलुरु और चेन्नई जैसे बड़े शहर शामिल थे, के ऊपर से इसका संभावित मलबा गुजर सकता है। हालांकि, राहत की खबर यह रही कि यह विशालकाय स्पेस जंक किसी घनी आबादी या भारतीय भूभाग पर न गिरकर मुख्य रूप से महासागर के ऊपर वायुमंडलीय घर्षण (Atmospheric Friction) की वजह से जलकर राख हो गया।
नासा के 1.5 टन वजनी टेलीस्कोप का अनियंत्रित री-एंट्री और मुंबई पर मंडराता खतरा
नासा का स्विफ्ट ऑब्जर्वेटरी टेलीस्कोप पिछले लगभग 22 वर्षों से पृथ्वी की निचली कक्षा (Low Earth Orbit) में घूमते हुए ब्रह्मांड के गामारे विस्फोटों (Gamma-Ray Bursts) का अध्ययन कर रहा था। पिछले कुछ समय से सूर्य में आई अत्यधिक सौर गतिविधियों (Solar Maxima) के कारण ऊपरी वायुमंडल का विस्तार हुआ, जिससे इस उपग्रह पर ड्रैग (खिंचाव) बढ़ता गया और इसका ऑर्बिटल डिके (Orbital Decay) तेजी से होने लगा। बिना किसी ऑन-बोर्ड प्रोपल्शन सिस्टम के यह अनियंत्रित रूप से धरती की ओर गिरने लगा। शुरुआती ट्रैकिंग डेटा और इसरो (ISRO) के रडार नेटवर्क ने भारत के पश्चिमी और दक्षिणी हिस्सों, विशेषकर मुंबई, हैदराबाद और चेन्नई को संभावित री-एंट्री कॉरिडोर के क्षेत्र में चिन्हित किया था, जिससे कुछ समय के लिए घबराहट और चिंता का माहौल बन गया था।
वायुमंडल में प्रचंड घर्षण और महासागर के ऊपर राख में तब्दील हुआ मलबा
जैसे ही 1.5 टन का यह वजनी सैटेलाइट पृथ्वी के सघन वायुमंडल में लगभग 27,000 किलोमीटर प्रति घंटे की अत्यधिक रफ्तार से दाखिल हुआ, वायुमंडलीय घर्षण के कारण इसका तापमान हजारों डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया। इस प्रचंड गर्मी के कारण टेलीस्कोप का अधिकांश हिस्सा एल्युमिनियम और सोलर पैनलों सहित हवा में ही जलकर भस्म हो गया। स्पेस ट्रैकिंग डेटा (Orbital Radar) के अनुसार, सैटेलाइट का बचा हुआ भारी मलबा (यदि कोई बचा हो) प्रशांत महासागर और खुले जलक्षेत्र में जा गिरा, जिससे किसी भी जमीनी आबादी या शहरी बुनियादी ढांचे को कोई नुकसान नहीं पहुंचा। इस तरह एक बड़ा संभावित खतरा बिना किसी जनधन की हानि के टल गया।
इसरो और वैश्विक अंतरिक्ष एजेंसियों की सतर्कता एवं प्रोजेक्ट नेत्रा की भूमिका
इस पूरे घटनाक्रम के दौरान भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के 'नेटवर्क फॉर स्पेस ऑब्जेक्ट ट्रैकिंग एंड एनालिसिस' (IS4OM) और प्रोजेक्ट 'नेत्रा' (NETRA) ने इस सैटेलाइट की गतिविधियों पर बारीक नजर बनाए रखी थी। श्रीहरिकोटा स्थित मल्टी-ऑब्जेक्ट ट्रैकिंग रडार की मदद से भारतीय वैज्ञानिकों ने इस बात की लगातार समीक्षा की कि क्या कोई टुकड़ा भारतीय हवाई क्षेत्र या भूभाग को प्रभावित कर सकता है। अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष संधियों (Outer Space Treaty 1967 और Liability Convention 1972) के तहत किसी भी उपग्रह से होने वाले नुकसान की जिम्मेदारी प्रक्षेपण करने वाले देश (इस मामले में अमेरिका) की होती है, लेकिन इसरो की त्वरित ट्रैकिंग तकनीक ने देश के भीतर समय रहते सटीक वैज्ञानिक जानकारी साझा की।
स्विफ्ट ऑब्जर्वेटरी की ऐतिहासिक विरासत और अंतरिक्ष कचरे की बढ़ती चुनौती
भले ही स्विफ्ट टेलीस्कोप का अंत वायुमंडल में जलकर हो गया, लेकिन खगोल विज्ञान में इसका योगदान अमूल्य रहा है। अपने दो दशक से अधिक लंबे मिशन के दौरान इसने 2,000 से अधिक गामारे बर्स्ट और लगभग 1,400 सुपरनोवा विस्फोटों की खोज की। हालांकि, इस घटना ने एक बार फिर अंतरिक्ष में जमा हो रहे 'स्पेस जंक' (Space Debris) और अनियंत्रित री-एंट्री की गंभीर समस्या को उजागर किया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि जैसे-जैसे उपग्रहों की संख्या बढ़ रही है, भविष्य में पुरानी हो चुकी सैटेलाइट्स को सुरक्षित तरीके से डी-ऑर्बिट करने के नियम और कड़े किए जाने चाहिए ताकि पृथ्वीवासी ऐसे खतरों से पूरी तरह सुरक्षित रह सकें।