अफगानिस्तान की संप्रभुता का समर्थन: मॉस्को में तालिबान के हक में खड़ा हुआ भारत
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों में समय-समय पर समीकरण इतनी तेजी से बदलते हैं कि कई बार पारंपरिक दुश्मनी और दोस्ती की परिभाषाएं भी बदल जाती हैं। रूस की राजधानी मॉस्को में हाल ही में आयोजित एक उच्च स्तरीय अंतरराष्ट्रीय बैठक के दौरान कुछ ऐसा ही हैरान करने वाला और रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण नजारा देखने को मिला, जब भारत ने खुलकर अफगानिस्तान की संप्रभुता और स्थिरता का समर्थन किया। लंबे समय तक काबुल की सत्ता पर काबिज तालिबान प्रशासन से दूरी बनाए रखने की नीति पर चलने वाले भारत ने अब व्यावहारिक कूटनीति का परिचय देते हुए क्षेत्रीय स्थिरता के मद्देनजर तालिबान समर्थित व्यवस्था के पक्ष में खुलकर बैटिंग की है। मॉस्को के इस मंच पर भारत के इस कड़े और स्पष्ट रुख से पाकिस्तान को एक बहुत बड़ा कूटनीतिक झटका लगा है, जो अब तक अफगानिस्तान के आंतरिक मामलों में अपनी पैठ जमाने और क्षेत्रीय राजनीति में खुद को एकमात्र खिलाड़ी साबित करने की फिराक में रहता था। इस पूरी कूटनीतिक चाल ने दक्षिण एशिया और मध्य एशिया की भू-राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत कर दी है, जिस पर पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हुई हैं।
मॉस्को फॉर्मेट बैठक में भारत का बदला हुआ और व्यावहारिक कूटनीतिक रुख
मॉस्को में आयोजित अफगानिस्तान से जुड़ी अहम क्षेत्रीय बैठकों में विभिन्न देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए थे, जहां क्षेत्रीय सुरक्षा, आतंकवाद के खात्मे और मानवीय सहायता को लेकर गहन मंथन किया गया। इस दौरान भारतीय कूटनीतिक दल ने जो बयान दिए, उसने अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया। भारत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वह अफगानिस्तान की स्वतंत्रता, क्षेत्रीय अखंडता और वहां के लोगों की भलाई के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। भारतीय प्रतिनिधियों का यह मानना था कि काबुल में एक स्थिर और शांतिपूर्ण सरकार का होना न केवल अफगानिस्तान के आंतरिक हितों के लिए जरूरी है, बल्कि पूरे दक्षिण और मध्य एशियाई क्षेत्र की सुरक्षा के लिए भी अनिवार्य है। भारत ने तालिबान शासन के साथ प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संवाद के माध्यम से वहां विकास कार्यों और मानवीय मदद को जारी रखने का जो संकेत दिया है, वह इस बात को साबित करता है कि भारत अब क्षेत्रीय कूटनीति में किसी भी बाहरी देश या प्रॉक्सी को अपने सामरिक हितों पर हावी नहीं होने देना चाहता है।
पाकिस्तान की क्षेत्रीय साजिशों को मॉस्को में लगा तगड़ा झटका
इस पूरी कूटनीति के केंद्र में सबसे बड़ा झटका पाकिस्तान के लिए माना जा रहा है, जो पिछले कई दशकों से अफगानिस्तान की राजनीति को अपने हिसाब से नियंत्रित करने और वहां अपनी रणनीतिक गहराई (Strategic Depth) तलाशने के सपने देखता रहा है। पाकिस्तान की हमेशा से यह कोशिश रही है कि वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अफगानिस्तान के मामलों में एकमात्र मध्यस्थ या प्रवक्ता की भूमिका निभाए, ताकि पश्चिमी देशों और इस्लामी दुनिया से उसे राजनीतिक और आर्थिक लाभ मिल सके। लेकिन मॉस्को में भारत द्वारा अफगानिस्तान की संप्रभुता का सीधा समर्थन किए जाने और तालिबान के साथ व्यावहारिक संवाद के रास्ते खोलने से पाकिस्तान की तमाम योजनाएं धरी की धरी रह गईं। पाकिस्तानी कूटनीतिज्ञ इस बात से हैरान हैं कि कैसे भारत ने बिना किसी हिचकिचाहट के काबुल के नए शासकों के साथ अपने कूटनीतिक संपर्कों को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया है, जिससे क्षेत्रीय मंचों पर इस्लामाबाद की वह पुरानी पकड़ पूरी तरह कमजोर हो गई है जिसका फायदा वह वर्षों से उठाता आया था।
क्षेत्रीय सुरक्षा, आतंकवाद और बदलती भू-राजनीति के नए मायने
भारत और अफगानिस्तान के बीच सदियों पुराने सांस्कृतिक और आर्थिक संबंध रहे हैं, और मौजूदा कूटनीतिक बदलाव इसी प्राचीन रिश्ते को नई व्यावहारिक हकीकत के साथ जोड़ने का प्रयास है। भले ही भारत ने अभी तक औपचारिक रूप से तालिबान सरकार को मान्यता नहीं दी है, लेकिन मॉस्को के मंच से जिस तरह से काबुल की संप्रभुता का समर्थन किया गया है, उसने यह साफ कर दिया है कि भारत अपनी सुरक्षा और रणनीतिक हितों को सर्वोपरि रखता है। अफगानिस्तान की धरती का इस्तेमाल भारत विरोधी आतंकवादी गतिविधियों के लिए न हो, इसके लिए क्षेत्रीय ताकतों के साथ मिलकर काम करना आज की सबसे बड़ी जरूरत बन चुका है। भारत का यह कदम क्षेत्रीय स्थिरता को बढ़ावा देने के साथ-साथ उन सभी ताकतों को करारा जवाब है जो इस देश की अस्थिरता का फायदा उठाकर अपनी रोटियां सेकना चाहती थीं। आने वाले समय में भारत और अफगानिस्तान के बीच मानवीय सहायता, व्यापारिक रास्तों और कूटनीतिक बैठकों का यह सिलसिला दक्षिण एशिया की तस्वीर को पूरी तरह बदलकर रख सकता है।