अमेरिकी हथियारों से लैस भारतीय नौसेना ने क्यों ठुकराया अमेरिकी F/A-18 सुपर हॉर्नेट
हिंद महासागर में भारत की समुद्री सीमाओं को अभेद्य बनाने और नौसेना की मारक क्षमता को कई गुना बढ़ाने की दिशा में एक बेहद ऐतिहासिक और दूरगामी फैसला लिया गया। भारतीय नौसेना ने अपने पहले स्वदेशी विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत (INS Vikrant) और आईएनएस विक्रमादित्य के डेक से उड़ान भरने के लिए दो दुनिया के सबसे शक्तिशाली नौसैनिक लड़ाकू विमानों - अमेरिका के F/A-18 सुपर हॉर्नेट (F/A-18 Super Hornet) और फ्रांस के राफेल-मरीन (Rafale-M) के बीच गहन परीक्षण और मूल्यांकन किया। नौसेना के पास पहले से ही कई आधुनिक अमेरिकी सैन्य उपकरण और पनडुब्बी रोधी हथियार (जैसे MH-60R रोमियो हेलीकॉप्टर और P-8I पोसाइडन विमान) मौजूद हैं, इसके बावजूद भारतीय नौसेना ने अमेरिकी एयरोस्पेस दिग्गज बोइंग के F/A-18 सुपर हॉर्नेट के प्रस्ताव को खारिज करते हुए फ्रांसीसी डसॉल्ट एविएशन के राफेल-एम को अपनी पहली पसंद चुना। यह फैसला केवल एक सैन्य खरीद नहीं है, बल्कि भारत की रणनीतिक स्वायत्तता, वायु सेना के साथ तालमेल (Commonality) और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन को पूरी तरह बदलने वाला एक मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है।
गोवा के तट पर हुए कड़े परीक्षणों में राफेल-एम ने सुपर हॉर्नेट को पीछे छोड़कर कैसे बनाई बढ़त
भारतीय नौसेना ने आईएनएस विक्रांत के 'स्की-जंप' (STOBAR सिस्टम) से फाइटर जेट्स के टेक-ऑफ और लैंडिंग क्षमताओं को परखने के लिए गोवा के हंस नेवल एयर स्टेशन पर दोनों विदेशी लड़ाकू विमानों के कठोर लैंड-बेस्ड स्की-जंप ट्रायल आयोजित किए थे। अमेरिका का F/A-18 सुपर हॉर्नेट एक बेहद क्षमतावान, जुड़वां इंजन वाला बहुउद्देशीय फाइटर जेट है और अमेरिकी नौसेना के कैटापुल (CATOBAR) सिस्टम वाले एयरक्राफ्ट कैरियर का मुख्य आधार रहा है। हालांकि, जब बात भारतीय विमानवाहक पोतों के लिफ्ट (Elevator) साइज और हैंगर आयामों की आई, तो राफेल-एम ने स्पष्ट बढ़त हासिल कर ली। आईएनएस विक्रांत और विक्रमादित्य के विमान लिफ्ट का आकार इस तरह से डिजाइन किया गया है कि राफेल-एम के फोल्डिंग विंग्स और कॉम्पैक्ट एयरफ्रेम बिना किसी बड़े तकनीकी या ढांचागत बदलाव के उसमें आसानी से समा जाते हैं, जबकि सुपर हॉर्नेट को लिफ्ट में फिट करने के लिए उसकी विंगटिप मिसाइल रेल को बार-बार हटाने की जटिल प्रक्रिया की आवश्यकता पड़ती। इसके अलावा, राफेल-एम ने स्की-जंप से भारी हथियार और ईंधन पेलोड के साथ टेक-ऑफ करने के मामले में भारतीय परिस्थितियों के अनुसार उत्कृष्ट प्रदर्शन करके नौसैन्य विशेषज्ञों का दिल जीत लिया।
भारतीय वायुसेना के साथ 100% लॉजिस्टिक्स और स्पेयर पार्ट्स का तालमेल बना सबसे बड़ा रणनीतिक कारण
राफेल-एम के चयन के पीछे सबसे बड़ा और मजबूत व्यावहारिक कारण भारतीय वायुसेना (IAF) के पास पहले से मौजूद 36 राफेल फाइटर जेट्स का बेड़ा है। वायुसेना अंबाला और हाशिमारा एयरबेस से पहले से ही राफेल विमानों का संचालन कर रही है। नौसेना द्वारा राफेल-एम को चुने जाने से भारतीय सशस्त्र बलों को रखरखाव, स्पेयर पार्ट्स की आपूर्ति, पायलटों के प्रशिक्षण, सिमुलेटर और रखरखाव बुनियादी ढांचे (MRO) में अरबों डॉलर की बचत होगी। यदि भारत अमेरिकी F/A-18 सुपर हॉर्नेट को चुनता, तो भारतीय नौसेना को बिल्कुल नया लॉजिस्टिक्स चेन, नया प्रशिक्षण ढांचा और अलग स्पेयर पार्ट्स की व्यवस्था खड़ी करनी पड़ती, जिससे रखरखाव का खर्च और परिचालन जटिलता बहुत अधिक बढ़ जाती। राफेल-एम के आने से भारतीय वायुसेना और नौसेना के बीच एक अनूठा 'जॉइंटनेस' और इंटरऑपरेबिलिटी कायम होगी, जिससे युद्ध के समय दोनों सेनाएं एक-दूसरे के हथियारों, मिसाइलों और कलपुर्जों का बिना किसी तकनीकी बाधा के इस्तेमाल कर सकेंगी।
अमेरिकी काटसा प्रतिबंधों और रणनीतिक निर्भरता के जोखिम से बचने की भारतीय कूटनीतिक नीति
अमेरिका के साथ भारत के रक्षा संबंध पिछले एक दशक में बेहद मजबूत हुए हैं, फिर भी इतिहास गवाह है कि अमेरिकी सैन्य प्रणालियों के साथ कड़े प्रतिबंध नियम (जैसे CAATSA), अंतिम उपयोगकर्ता निगरानी (End-User Monitoring) और कड़े भू-राजनीतिक नियम जुड़े होते हैं। संकट की स्थिति में अमेरिकी कांग्रेस द्वारा सैन्य आपूर्ति या स्पेयर पार्ट्स पर रोक लगाने का जोखिम हमेशा बना रहता है। इसके विपरीत, फ्रांस भारत का एक अत्यंत विश्वसनीय और परखा हुआ रणनीतिक साझेदार रहा है, जिसने 1998 के पोखरण परमाणु परीक्षणों के दौरान अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के समय भी भारत का साथ दिया था। फ्रांस की रक्षा नीतियां बिना किसी राजनीतिक शर्तों के तकनीक हस्तांतरण और समय पर हथियारों की आपूर्ति की गारंटी देती हैं। भारत ने अमेरिकी सुपर हॉर्नेट को ठुकराकर एक बार फिर दुनिया को यह संदेश दे दिया है कि वह अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा खरीद निर्णयों में किसी भी महाशक्ति के दबाव में आने के बजाय पूरी तरह स्वतंत्र और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाता है।
राफेल-एम में लगे उल्का (Meteor) और स्कैल्प (SCALP) मिसाइल सिस्टम से हिंद महासागर में भारत का एकतरफा दबदबा
राफेल-एम केवल एक विमान नहीं है, बल्कि यह एक उड़ता हुआ घातक हथियार प्रणाली मंच है। यह लड़ाकू विमान बीवियोंड विजुअल रेंज (BVR) हवा से हवा में मार करने वाली दुनिया की सबसे घातक मिसाइल 'मीटियोर' (Meteor) और हवा से जमीन पर सटीक निशाना साधने वाली क्रूज मिसाइल 'स्कैल्प' (SCALP) से लैस है। इसके साथ ही इसमें आरबीई-2 (RBE2) एईएसए रडार और 'स्पेक्ट्रा' (SPECTRA) इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सूट मौजूद है, जो दुश्मन के रडार और मिसाइल ट्रैकिंग सिस्टम को पूरी तरह चकमा देने में सक्षम है। जब राफेल-एम आईएनएस विक्रांत के डेक से उड़ान भरेगा, तो यह हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी नेवी (PLAN) के बढ़ते नौसैनिक कदमों और पाकिस्तानी नौसेना के खिलाफ भारत को अभूतपूर्व हवाई श्रेष्ठता प्रदान करेगा। यह क्षमता भारत के स्वदेशी 'ट्विन इंजन डेक बेस्ड फाइटर' (TEDBF) प्रोजेक्ट के पूरी तरह तैयार होने तक नौसेना के लिए एक मजबूत और अजेय अंतरिम सुरक्षा कवच का काम करेगी।