मंदिरों में VIP दर्शन की संस्कृति पर इंडस्ट्रियलिस्ट हर्ष गोयनका का फूटा गुस्सा
देश के प्रसिद्ध उद्योगपति और अपने बेबाक बयानों के लिए जाने जाने वाले आरपीजी ग्रुप के चेयरमैन हर्ष गोयनका (Harsh Goenka) एक बार फिर सोशल मीडिया पर अपने एक तीखे और विचारोत्तेजक ट्वीट के चलते चर्चा के केंद्र में आ गए हैं। इस बार उन्होंने देश के तमाम बड़े धार्मिक स्थलों, मंदिरों और तीर्थक्षेत्रों में पैसे और रसूख के बल पर मिलने वाले वीआईपी दर्शन (VIP Darshan Culture) की व्यवस्था पर करारा प्रहार किया है। हर्ष गोयनका ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर एक बहुत ही गहरी और सोचने पर मजबूर करने वाली बात साझा करते हुए लिखा कि भगवान के दरबार में चाहे कोई देश का सबसे बड़ा अरबपति हो या फिर कोई साधारण गरीब भक्त, दोनों की हैसियत ईश्वर के सामने बिल्कुल समान होती है, फिर क्यों कुछ खास लोगों को भगवान के दर्शन के नाम पर स्पेशल ट्रीटमेंट और वीआईपी पास दिए जाते हैं? उनके इस दो टूक बयान के सामने आते ही इंटरनेट पर एक लंबी बहस छिड़ गई है और आम जनता से लेकर बड़े-बड़े हस्तियां भी इस व्यवस्था के खिलाफ अपनी भड़ास निकाल रहे हैं। एक सोशल मीडिया यूजर ने तो इस पर प्रतिक्रिया देते हुए यहां तक लिख दिया कि आधुनिक मंदिरों की इस मुनाफाखोरी और भेदभावपूर्ण व्यवस्था को देखकर अब सचमुच घिन आने लगी है।
भारत जैसे धार्मिक और आध्यात्मिक देश में जहां हर साल करोड़ों श्रद्धालु अपनी अटूट आस्था के साथ चार धाम, तिरुपति बालाजी, महाकाल, काशी विश्वनाथ और बांके बिहारी जैसे बड़े मंदिरों में माथा टेकने पहुंचते हैं, वहां आम दर्शनार्थियों को कई-कई घंटे लंबी कतारों में खड़ा रहना पड़ता है। इसके विपरीत, जो लोग पैसे वाले होते हैं, राजनीतिक रसूख रखते हैं या बड़े पदों पर बैठे होते हैं, वे कथित वीआईपी संस्कृति के तहत बिना किसी परेशानी के सीधे गर्भगृह तक पहुंच जाते हैं और भगवान के दर्शन कर लेते हैं। आम भक्त, जो अपनी गाढ़ी कमाई से थोड़ा-थोड़ा पैसा बचाकर भगवान के दर्शन के लिए यात्रा करता है, उसे धूप और धक्के खाने पड़ते हैं। हर्ष गोयनका ने इसी असमानता और विसंगति पर सीधा सवाल खड़ा किया है। उनका यह पोस्ट ऐसे समय में आया है जब देश के कई प्रमुख मंदिरों में हाल ही में वीआईपी पास और महंगे टिकट के जरिए दर्शन कराने के मामलों को लेकर श्रद्धालुओं में पहले से ही भारी असंतोष और नाराजगी देखने को मिल रही है।
मंदिरों में बढ़ती कमर्शियल संस्कृति और 'वीआईपी दर्शन' का काला सच
हर्ष गोयनका के इस ट्वीट के वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर कमेंट्स की बाढ़ आ गई है। लोगों ने खुलकर यह लिखना शुरू कर दिया है कि किस तरह आज के समय में धर्म और आस्था का भी व्यवसायीकरण (Commercialization) कर दिया गया है। कई यूजर्स ने अपने कड़वे अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि कैसे देश के कई बड़े मंदिरों में भगवान के दर्शन को अब एक 'लक्जरी सर्विस' बना दिया गया है, जहां भगवान के घर में भी पैसे के आधार पर भेदभाव किया जाता है। एक यूजर ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए लिखा कि जब कोई इंसान अपनी प्रार्थना लेकर भगवान के पास जाता है, तो वहां उसकी जेब या उसका बैंक बैलेंस नहीं देखा जाना चाहिए, लेकिन आज के मंदिरों का मैनेजमेंट सिर्फ बड़े दानदाताओं और नेताओं की चापलूसी में व्यस्त रहता है, जिसे देखकर सचमुच मन में घिन पैदा होती है।
भगवान के दरबार में कब खत्म होगी यह असमानता?
भारतीय संस्कृति में हमेशा से यह सिखाया गया है कि ईश्वर के सामने सभी मनुष्य एक समान हैं, न कोई ऊंचा है और न कोई नीचा। लेकिन आधुनिक भारत की धार्मिक व्यवस्था और मंदिर प्रबंधन समितियों ने जिस प्रकार से 'वीआईपी कल्ट' को बढ़ावा दिया है, वह कहीं न कहीं आध्यात्मिक मूल्यों के बिल्कुल विपरीत है। हर्ष गोयनका जैसे उद्योगपति द्वारा इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाए जाने के बाद अब यह सवाल फिर से खड़ा हो गया है कि क्या मंदिर ट्रस्ट और सरकारें कभी ऐसी पारदर्शी और समान व्यवस्था लागू करेंगी जहां हर भक्त को बिना किसी सिफारिश या पैसे के भगवान के बराबर और सुलभ दर्शन मिल सकें? जनता अब यह उम्मीद कर रही है कि कम से कम धार्मिक स्थलों पर तो इस वीआईपी संस्कृति का अंत होना चाहिए, ताकि हर साधारण इंसान भी बिना किसी अपमान या लंबी कतार की घुटन के अपने आराध्य के दर्शन कर सके।