5100 रुपये की गोलियां मरीजों को बेची जा रही हैं 78400 में

5100 रुपये की गोलियां मरीजों को बेची जा रही हैं 78400 में

भारतीय स्वास्थ्य सेवा प्रणाली और दवा बाजार के गलियारों में इस समय एक ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसने देश के अंतःकरण को झकझोर कर रख दिया है। एक तरफ जहां कैंसर जैसी घातक और जानलेवा बीमारी से जूझ रहे मरीज और उनके परिजन अस्पताल के बिल और महंगी दवाओं के बोझ तले हर दिन दम तोड़ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ देश की बड़ी फार्मास्युटिकल कंपनियों की मुनाफाखोरी का एक ऐसा खौफनाक चेहरा अदालत के सामने बेनकाब हुआ है, जिसे जानकर हर कोई सन्न रह गया है। हाल ही में सामने आए एक उच्चस्तरीय कानूनी विवाद में यह खुलासा हुआ है कि कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली जिन जीवनरक्षक गोलियों की वास्तविक लागत महज 5100 रुपये के आसपास बैठती है, उन्हें कैंसर रोगियों और उनके परिवारों को बाजार में 78,400 रुपये तक की भारी-भरकम और मनमाने दामों पर बेचा जा रहा है। सबसे ज्यादा हैरान करने वाली और अमानवीय बात तो यह है कि जब इस बेतहाशा लूट और मुनाफाखोरी के खिलाफ अदालत में सुनवाई शुरू हुई, तो बड़ी-बड़ी फार्मा कंपनियों ने बेशर्मी की हद पार करते हुए सीधे तौर पर यह दलील दी कि 'इन दवाओं के दाम सस्ते न किए जाएं।' कंपनियों का यह तर्क है कि यदि दवाएं सस्ती कर दी गईं, तो उनके रिसर्च और विकास (R&D) के बजट पर असर पड़ेगा, जिसके बाद से आम जनता और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं में जबरदस्त आक्रोश फैल गया है।

कैंसर जैसी भयानक बीमारी का नाम सुनते ही मध्यम वर्ग और गरीब परिवारों के पैरों तले जमीन खिसक जाती है। इस बीमारी का इलाज इतना लंबा और खर्चीला होता है कि ज्यादातर परिवार इलाज का आधा सफर तय करते-करते आर्थिक रूप से पूरी तरह कंगाल हो जाते हैं। ऐसे में जब जीवन बचाने वाली कीमोथेरेपी ड्रग्स और टारगेटेड कैंसर थेरेपी की गोलियां अपनी असली कीमत से कई गुना ज्यादा दामों पर बेची जाती हैं, तो यह सीधे तौर पर इंसानियत के खिलाफ एक बड़ा अपराध बन जाता है। इस मामले में जब हेल्थ एक्टिविस्ट्स और कंज्यूमर राइट्स संगठनों ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और यह मांग की कि कैंसर की दवाओं पर लगने वाले भारी प्रॉफिट मार्जिन और टैक्स को नियंत्रित किया जाए ताकि गरीब मरीजों को राहत मिल सके, तब दवा कंपनियों के वकीलों ने जिस तरह का रुख अपनाया, उसने पूंजीवादी व्यवस्था की क्रूरता को सबके सामने ला दिया। कंपनियों का यह बेतुका तर्क कि महंगे दामों से ही नई दवाओं की खोज संभव होती है, उस गरीब मां या पिता के सामने बिल्कुल बेमानी साबित होता है जो अपने बच्चे या जीवनसाथी को बचाने के लिए अपनी जमीन और जेवर बेचने को मजबूर हैं।

मुनाफाखोरी की हदें पार: कैसे तय होती हैं कैंसर की दवाओं की आसमान छूती कीमतें?

दवा उद्योग के भीतर चल रहे इस काले कारोबार की गहराई में जाएं तो यह पता चलता है कि कैसे कच्चा माल बहुत कम कीमत पर तैयार होता है, लेकिन पेटेंट और ब्रांडिंग के नाम पर मरीजों से खून पसीना निचोड़ा जाता है। अंतरराष्ट्रीय और घरेलू फार्मा कंपनियां यह दलील देती हैं कि एक नई कैंसर की दवा को बाजार में लाने में सालों की रिसर्च और करोड़ों रुपये का खर्च आता है, इसलिए वे अपनी लागत वसूलने के लिए ऊंची कीमतें रखने का अधिकार रखती हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या 'लागत वसूलने' और 'अंधाधुंध मुनाफा कमाने' के बीच की सीमा को पूरी तरह मिटा दिया जाना चाहिए? जहां 5100 रुपये की दवा को लगभग 16 गुना दाम यानी 78,400 रुपये में बेचा जा रहा हो, उसे किसी भी लिहाज से जायज नहीं ठहराया जा सकता। भारत जैसे देश में, जहां अधिकांश आबादी के पास कोई मजबूत हेल्थ इंश्योरेंस कवर नहीं है और इलाज का पूरा खर्च जेब से (Out-of-pocket expenditure) करना पड़ता है, वहां इस तरह की कीमतें मरीजों के लिए मौत के परवाने जैसी साबित होती हैं।

न्यायपालिका और सरकार के सामने खड़ी हुई एक बड़ी नैतिक चुनौती

इस हाई-प्रोफाइल कानूनी जंग के दौरान अब देश की सर्वोच्च अदालतों और स्वास्थ्य मंत्रालय के सामने एक बहुत बड़ी नैतिक और प्रशासनिक चुनौती खड़ी हो गई है। क्या सरकार नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) के जरिए इन जीवनरक्षक दवाओं पर कड़े मूल्य नियंत्रण (Price Capping) लागू करेगी? क्या फार्मा कंपनियों के इस तर्क को खारिज करते हुए आम जनता के स्वास्थ्य के अधिकार को सर्वोपरि रखा जाएगा? देश भर के डॉक्टर, कैंसर सर्वाइवर्स और सामाजिक कार्यकर्ता अब एक सुर में यह मांग कर रहे हैं कि सरकार को तुरंत हस्तक्षेप करना चाहिए और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों की हर जरूरी दवा को अत्यधिक सस्ती दरों पर उपलब्ध कराना चाहिए। जब तक दवा कंपनियों की मुनाफाखोरी पर लगाम नहीं कसी जाएगी, तब तक देश में स्वास्थ्य का अधिकार सिर्फ कागजी जुमला बनकर रह जाएगा और गरीब इंसान यूं ही महंगी दवाओं के अभाव में दम तोड़ता रहेगा।