हरे रंग की वह जादुई ट्यूब जो गुलामी के दौर में बनी थी आत्मनिर्भरता की मिसाल

हरे रंग की वह जादुई ट्यूब जो गुलामी के दौर में बनी थी आत्मनिर्भरता की मिसाल

हरे रंग की वह जादुई ट्यूब जो गुलामी के दौर में बनी थी आत्मनिर्भरता की मिसाल: जानिए भारत की पहली एंटीसेप्टिक क्रीम 'बोरोलिन' की अनकही और दिलचस्प कहानी

भारतीय घरों के मेडिसिन बॉक्स, सर्दियों की ठंडी रातों और त्वचा की देखभाल की बात जब भी होती है, तो सबसे पहला नाम जेहन में एक खास खुशबू के साथ हरे रंग की छोटी सी ट्यूब का आता है, जिसे हम प्यार से 'बोरोलिन' (Boroline) कहते हैं। छोटे-मोटे कटने-छिलने से लेकर फटी एड़ियों और रूखेपन तक का यह अचूक इलाज आज भी देश के हर घर का एक अनिवार्य हिस्सा बना हुआ है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह साधारण सी दिखने वाली क्रीम सिर्फ एक स्किनकेयर प्रोडक्ट नहीं है, बल्कि इसके पीछे ब्रिटिश राज के खिलाफ एक मजबूत राजनीतिक विरोध और देश की आत्मनिर्भरता (Self-Reliance) की एक बड़ी ऐतिहासिक कहानी छिपी है। साल 1929 में जब पूरा देश ब्रिटिश हुकूमत की गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था और स्वदेशी आंदोलन की आंधी चल रही थी, तब कोलकाता के एक दूरदर्शी व्यवसायी ने विदेशी उत्पादों को टक्कर देने और देशवासियों को आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनाने के लिए इस चमत्कारी क्रीम की नींव रखी थी।

ब्रिटिश सामानों के बहिष्कार और स्वदेशी आंदोलन से जन्मी थी बोरोलिन

बात साल 1929 की है, जब भारत में स्वतंत्रता संग्राम और 'स्वदेशी आंदोलन' चरम पर था। देश के लोग विदेशी सामानों का बहिष्कार कर रहे थे और स्वदेशी वस्तुओं अपनाने पर जोर दे रहे थे। उस दौर में कलकत्ता के एक व्यवसायी गौराममोहन दत्त (Gour Mohun Dutta), जो मूल रूप से विदेशी वस्तुओं के आयातक (Importer) थे, देश की इस बदलती फिजा से गहरे प्रभावित हुए। उन्होंने ब्रिटिश आर्थिक शोषण के खिलाफ खड़े होने का फैसला किया और विदेश से आने वाली महंगी और एंटीसेप्टिक क्रीम्स का एक स्वदेशी विकल्प तैयार करने की ठानी। उन्होंने अपनी दूरदर्शिता और स्वदेशी की भावना के साथ 'जीडी फार्मास्यूटिकल्स' (GD Pharmaceuticals) की स्थापना की और अपने घर पर ही एक ऐसी क्रीम का फार्मूला तैयार किया जो हर भारतीय की पहुंच में हो। इस प्रकार गुलामी के दौर में जन्म लेने वाली यह हरी ट्यूब अंग्रेजों के आर्थिक प्रभुत्व के खिलाफ एक शांत लेकिन बहुत बड़ा विद्रोह साबित हुई।

'बोरिक' और 'ओलियन' से मिलकर बना नाम और हाथी वाले लोगो का राज

इस ऐतिहासिक क्रीम के नामकरण के पीछे भी एक बहुत ही वैज्ञानिक और दिलचस्प कहानी है। इसका नाम इसके मुख्य घटकों से मिलकर बनाया गया था—'बोरोज़' यानी बोरिक पाउडर (Boric Powder), जिसमें शक्तिशाली एंटीसेप्टिक गुण होते हैं, और दूसरा शब्द 'ओलियन' (Olein) जो लैटिन शब्द 'ओलियम' यानी तेल का एक रूप है। बोरिक पाउडर और जिंक ऑक्साइड के इस बेहतरीन मिश्रण ने इसे त्वचा के लिए एक वरदान बना दिया। इसके साथ ही, इस ब्रांड के लोगो (Logo) पर एक हाथी की तस्वीर को चुना गया, जो इस क्रीम की मजबूती, ताकत और विश्वसनीयता का प्रतीक थी। ग्रामीण भारत में आज भी कई जगहों पर इसे प्यार से 'हाथी वाली क्रीम' के नाम से जाना जाता है।

जब आजादी के जश्न में बांटी गई थीं एक लाख मुफ्त ट्यूब्स

बोरोलिन का देश प्रेम और राष्ट्रवाद से जुड़ाव कितना गहरा था, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब 15 अगस्त 1947 को भारत को अंग्रेजों से आजादी मिली, तो कंपनी ने इस ऐतिहासिक जश्न को मनाने के लिए देशवासियों के बीच लगभग 1 लाख बोरोलिन की ट्यूब्स मुफ्त में बांटी थीं। अखबारों में विज्ञापन छपवाकर इस खुशी को आम जनता के साथ साझा किया गया था। दशकों बीत गए, देश की राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियां पूरी तरह बदल गईं, बड़ी-बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियां बाजार में आ गईं, लेकिन बोरोलिन ने अपनी पारंपरिक हरी पैकेजिंग, वही पुरानी खुशबू और अपनी भरोसेमंद गुणवत्ता से कभी समझौता नहीं किया। आज भी यह क्रीम हमारी पुरानी स्मृतियों और स्वदेशी गौरव की उस अमिट विरासत को जीवित रखे हुए है, जो हर भारतीय परिवार की पीढ़ी-दर-पीढ़ी के साथ अटूट रूप से जुड़ी हुई है।