लोन की किस्त नहीं भरने पर क्या होता है? जानिए सिविल स्कोर से लेकर लीगल एक्शन

लोन की किस्त नहीं भरने पर क्या होता है? जानिए सिविल स्कोर से लेकर लीगल एक्शन

आज के समय में वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्सनल लोन, होम लोन, कार लोन या एजुकेशन लोन लेना एक आम बात हो गई है, लेकिन कई बार अचानक नौकरी छूट जाने, बिजनेस में घाटा होने या मेडिकल एमरजेंसी जैसी आर्थिक तंगियों के कारण लोग समय पर बैंक की ईएमआई यानी लोन की किस्त नहीं चुका पाते हैं। यदि आप भी किसी ऐसे ही दौर से गुजर रहे हैं या यह सोच रहे हैं कि एक या दो किस्तें मिस होने से क्या फर्क पड़ेगा, तो आपको बता दें कि बैंक और वित्तीय संस्थान इस मामले में बेहद सख्त रुख अपनाते हैं। समय पर लोन की किस्त न चुकाने पर आपको केवल पेनल्टी ही नहीं चुकानी पड़ती, बल्कि आपकी पूरी वित्तीय सेहत और भविष्य के लोन लेने के रास्ते भी हमेशा के लिए बंद हो सकते हैं। आज के इस विशेष लेख में हम विस्तार से जानेंगे कि लोन की किस्त समय पर न भरने पर बैंक कौन-कौन से कड़े कदम उठाते हैं और इससे बचने के लिए आपको क्या उपाय करने चाहिए।

पहला झटका: बैंक भेजता है रिमाइंडर और लगाता है पेनल्टी चार्ज

जैसे ही आपकी लोन की किस्त की देय तिथि यानी ड्यू डेट निकल जाती है और आपके बैंक खाते से ईएमआई का पैसा ऑटो-डेबिट नहीं हो पाता है, बैंक की प्रक्रिया तुरंत शुरू हो जाती है। सबसे पहले बैंक या एनबीएफसी आपको एसएमएस, ईमेल और फोन कॉल के जरिए भुगतान करने का रिमाइंडर भेजना शुरू करते हैं। इसके साथ ही, किस्त बाउंस होने पर बैंक द्वारा बाउंस चार्ज और लेट पेमेंट फीस यानी पेनल्टी पेनल्टी के रूप में जोड़ दी जाती है। यह पेनल्टी आपके मूल कर्ज की राशि और ब्याज के ऊपर अतिरिक्त बोझ बढ़ा देती है। शुरुआती कुछ दिनों तक बैंक इसे एक आम चूक मानकर सहूलियत देता है, लेकिन यदि आप लगातार एक महीने यानी 30 दिनों तक अपनी किस्त नहीं चुकाते हैं, तो मामला गंभीर कानूनी और तकनीकी चरणों में प्रवेश कर जाता है।

दूसरा बड़ा नुकसान: सिविल और क्रेडिट स्कोर का धड़ाम होना

लोन की किस्त न चुकाने का सबसे बुरा और दीर्घकालिक असर आपके क्रेडिट स्कोर यानी सिबिल स्कोर (CIBIL Score) पर पड़ता है। जब आप लगातार 30 से 90 दिनों तक अपनी ईएमआई नहीं भरते हैं, तो बैंक आपकी इस चूक को क्रेडिट ब्यूरो को रिपोर्ट कर देता है। इसके बाद आपकी क्रेडिट रिपोर्ट में 'डिफ़ॉल्ट' या 'ओवरड्यू' का ठप्पा लग जाता है, जिससे आपका सिबिल स्कोर तेजी से नीचे गिरने लगता है। एक बार सिबिल स्कोर खराब होने का मतलब है कि भविष्य में आपको किसी भी बैंक से नया लोन, क्रेडिट कार्ड या यहां तक कि पर्सनल लोन मिलना लगभग असंभव हो जाएगा। अगर आप भविष्य में कभी घर या गाड़ी खरीदने का सपना देख रहे हैं, तो खराब सिबिल स्कोर आपके उस सपने को बड़ा झटका दे सकता है, क्योंकि बैंक खराब क्रेडिट हिस्ट्री वाले ग्राहकों को जोखिम भरा मानते हैं।

तीसरा और गंभीर चरण: एनपीए (NPA) घोषित होना और कानूनी कार्रवाई

यदि आप लगातार 90 दिनों यानी तीन महीने तक लोन की एक भी किस्त नहीं चुकाते हैं, तो रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के नियमों के अनुसार बैंक आपके लोन खाते को 'नॉन-परफॉर्मिंग एसेट' यानी एनपीए (NPA) की श्रेणी में डाल देता है। एनपीए घोषित होने के बाद बैंक आपके खिलाफ कानूनी शिकंजा कसना शुरू कर देता है। सबसे पहले बैंक आपको सरफेसी एक्ट (SARFAESI Act) या मध्यस्थता अधिनियम के तहत कानूनी नोटिस भेजता है। इस नोटिस में आपको एक निश्चित समय सीमा के भीतर पूरा बकाया चुकाने का अल्टीमेटम दिया जाता है। यदि आप इस दौरान भी भुगतान करने में असमर्थ रहते हैं, तो बैंक को आपके द्वारा गिरवी रखी गई संपत्ति यानी कॉलेटरल को जब्त करने और उसकी नीलामी करके अपने बकाये की वसूली करने का पूरा अधिकार मिल जाता है। होम लोन के मामले में बैंक आपके घर को सील कर सकता है और कार लोन के मामले में आपकी गाड़ी को सड़क से उठवा सकता है।

लोन न चुका पाने की स्थिति में क्या करें और कैसे बचें?

यदि आप किसी वास्तविक वित्तीय संकट में फंस गए हैं और अपनी ईएमआई चुकाने में असमर्थ हैं, तो सबसे बड़ी भूल यह होती है कि आप बैंक के फोन उठाना बंद कर दें या अपनी समस्या छुपाएं। ऐसा करने से बैंक का शक और गुस्सा दोनों बढ़ जाते हैं और वे तुरंत सख्त कानूनी कार्रवाई की ओर बढ़ जाते हैं। इससे बचने का सबसे समझदारी भरा तरीका यह है कि बैंक के रिकवरी एजेंटों से डरने के बजाय तुरंत अपने होम ब्रांच के मैनेजर से संपर्क करें और अपनी स्थिति खुलकर बताएं। आज के समय में अधिकांश बैंक और वित्तीय संस्थान अपने ग्राहकों को 'लोन रीस्ट्रक्चरिंग' (Loan Restructuring) या रीशेड्यूलिंग का विकल्प देते हैं। इसके तहत बैंक आपके लोन की अवधि (Tenure) को बढ़ा सकता है ताकि आपकी मासिक किस्त यानी ईएमआई कम हो जाए। इसके अलावा, आप कुछ महीनों के लिए मोरटोरियम पीरियड (Moratorium Period) या रीपेमेंट हॉलिडे की मांग भी कर सकते हैं, जिसमें आपको कुछ समय के लिए किस्त भरने से राहत मिल जाती है। इसके अलावा, आप अपने किसी दूसरे महंगे अनसिक्योर्ड लोन को कंसोलिडेट करके या किसी अन्य स्रोत से थोड़े समय के लिए फंड अरेंज करके इस बड़े संकट से बाहर निकल सकते हैं, बशर्ते आप बैंक के साथ पारदर्शिता बनाए रखें।