बॉलीवुड नहीं कर सकता हॉलीवुड की बराबरी: विद्युत जामवाल बोले- 'सिर्फ पैसा खर्च करके एक्शन नहीं बनता
भारतीय सिनेमा में अपने हैरतअंगेज स्टंट्स और कलारीपयट्टू मार्शल आर्ट्स के दम पर खास पहचान बनाने वाले एक्शन स्टार विद्युत जामवाल ने फिल्म इंडस्ट्री के काम करने के तौर-तरीकों पर बड़ा बयान दिया है। अक्सर जब भी भारतीय फिल्मों की तुलना हॉलीवुड से की जाती है, तो बड़े बजट और आधुनिक तकनीक का हवाला देकर पल्ला झाड़ लिया जाता है। हालांकि, विद्युत जामवाल का मानना इससे बिल्कुल अलग है। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा है कि बॉलीवुड अभी हॉलीवुड के एक्शन और सिनेमाई अनुशासन की बराबरी नहीं कर सकता, क्योंकि केवल अंधाधुंध पैसा पानी की तरह बहा देने से कोई फिल्म विश्वस्तरीय नहीं बन जाती।
विद्युत जामवाल ने एक बातचीत के दौरान हॉलीवुड और भारतीय सिनेमा के बीच के अंतर को बहुत बारीक तरीके से समझाया। उन्होंने बताया कि समस्या पैसों या विजुअल इफेक्ट्स (VFX) की नहीं, बल्कि उस काम के प्रति समर्पण, महीनों की सख्त ट्रेनिंग और बुनियादी तैयारी की कमी की है।
'सिर्फ पैसा लगाने से एक्शन नहीं आता, पसीना बहाना पड़ता है'
विद्युत जामवाल ने कहा कि हमारे यहां कई बार निर्माता और निर्देशक यह मान बैठते हैं कि अगर फिल्म पर 300 या 500 करोड़ रुपये का भारी-भरकम बजट खर्च कर दिया गया, तो वह अपने आप ही अंतरराष्ट्रीय स्तर की बन जाएगी। जबकि सच्चाई यह है कि एक्शन सीन केवल महंगे कैमरों या विदेशी क्रू को बुला लेने से दमदार नहीं बनते।
विद्युत ने कहा, "हॉलीवुड में अगर किसी अभिनेता को एक खास तरह का एक्शन या बॉडी लैंग्वेज दिखानी होती है, तो वह उसके लिए छह महीने से एक साल तक लगातार पसीना बहाता है। वहां के एक्टर्स उस कला को गहराई से सीखते हैं। हमारे यहां अक्सर सब कुछ जल्दबाजी में होता है। यहां लोग सोचते हैं कि पैसा लगा दिया तो सब हो जाएगा, लेकिन स्क्रीन पर दिखने वाली प्रामाणिकता केवल कठिन ट्रेनिंग, अनुशासन और खुद को झोंकने से आती है।"
मार्शल आर्ट्स और तकनीक का सही तालमेल जरूरी
देश-दुनिया में शीर्ष मार्शल आर्टिस्ट्स की सूची में गिने जाने वाले विद्युत ने इस बात पर जोर दिया कि भारतीय सिनेमा के पास प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। भारत के पास कलारीपयट्टू और कुश्ती जैसी प्राचीन और समृद्ध युद्ध कलाएं मौजूद हैं, जिन्हें अगर सही तरीके से तराशा जाए तो वे दुनिया में किसी भी एक्शन फॉर्म को पीछे छोड़ सकती हैं।
हालांकि, उन्होंने अफसोस जताया कि अक्सर भारतीय फिल्ममेकर अपनी मूल ताकतों को गहराई से समझने के बजाय हॉलीवुड के फॉर्मूलों की नकल करने में लग जाते हैं। उन्होंने कहा कि जब तक एक्टर्स खुद जोखिम लेने, शरीर को ढालने और कला को जीने के लिए तैयार नहीं होंगे, तब तक विदेशी तकनीशियनों के सहारे वह जादू पैदा नहीं किया जा सकता जो दर्शकों के रोंगटे खड़े कर दे।
कंटेंट और किरदारों के प्रति ईमानदारी की जरूरत
विद्युत ने यह भी साफ किया कि उनका मकसद अपने उद्योग को कम आंकना नहीं, बल्कि आईना दिखाना है ताकि भारतीय सिनेमा सचमुच वैश्विक स्तर पर अपनी अमिट छाप छोड़ सके। उन्होंने कहा कि हॉलीवुड की बराबरी करने के लिए हमें दिखावे और सतही चमक-दमक से बाहर निकलकर किरदारों की भावनात्मक गहराई और एक्शन की विश्वसनीयता पर काम करना होगा। जब तक प्रोसेस के प्रति वफादारी नहीं होगी, तब तक करोड़ों रुपये के सेट्स भी किसी कमजोर एक्शन को मजबूत नहीं बना सकते।