SIR के बाद कटे 85 हजार वोटरों के नाम, आखिर क्या कर रहे हैं PDA के मसीहा? सपा के गढ़ आजमगढ़ में जमकर गरजे असदुद्दीन ओवैसी
उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर तीखी बयानबाजी और सियासी घमासान तेज हो गया है। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख और हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने समाजवादी पार्टी के मजबूत सियासी गढ़ माने जाने वाले आजमगढ़ में एक विशाल जनसभा को संबोधित किया। मंच संभालते ही ओवैसी ने सीधे तौर पर अखिलेश यादव और उनके बहुचर्चित 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) फॉर्मूले पर सीधा हमला बोला। ओवैसी ने चुनाव आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची से सोचे-समझे तरीके से हजारों लोगों के नाम काट दिए गए हैं, लेकिन खुद को पीडीए का मसीहा बताने वाले नेता पूरी तरह खामोश बैठे हैं। ओवैसी के इस तीखे तेवर ने आगामी चुनावी समीकरणों से पहले समाजवादी पार्टी के खेमे में बड़ी हलचल पैदा कर दी है।
'SIR के बाद कटे 85 हजार नाम', फॉर्म 7 में फर्जीवाड़े का लगाया बड़ा आरोप
आजमगढ़ की रैली में असदुद्दीन ओवैसी ने बाकायदा आंकड़े पेश करते हुए चुनाव आयोग और स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश में SIR प्रक्रिया पूरी होने के बाद करीब 85 हजार लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए। ओवैसी ने तंज कसते हुए कहा कि नियम के मुताबिक यदि किसी का नाम मतदाता सूची से काटना होता है, तो फॉर्म-7 में शिकायतकर्ता का पूरा नाम और विवरण दर्ज होना चाहिए, लेकिन यहां फॉर्म में केवल 'A', 'N', 'H' और 'F' जैसे बेबुनियाद अक्षर लिखकर नाम हटाए जा रहे हैं। उन्होंने पीलीभीत का उदाहरण देते हुए दावा किया कि वहां महज 18 लोगों ने मिलकर 829 लोगों के नाम कटवाने के लिए फॉर्म-7 दाखिल कर दिए। ओवैसी ने सीधे अखिलेश यादव पर निशाना साधते हुए पूछा कि जब गरीब, अल्पसंख्यक और दलित वोटरों के नाम मतदाता सूची से गायब किए जा रहे थे, तब पीडीए के स्वयंभू मसीहा आखिर कहां सो रहे थे और उन्होंने अपने वोटरों के हक के लिए क्या कदम उठाया?
'हमने हैदराबाद में ऐप बनाया, विरोधियों के वोट भी बचाए'
अखिलेश यादव और सपा समर्थकों के संभावित सवालों का जवाब पहले ही देते हुए ओवैसी ने अपनी पार्टी के हैदराबाद मॉडल का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि जब पीडीए के समर्थक मुझसे पूछेंगे कि ओवैसी तुमने क्या किया, तो मेरा जवाब साफ है कि मजलिस ने साल 2002 की वोटर लिस्ट का विशेष डिजिटल एप्लिकेशन तैयार करवाया। इसके जरिए हैदराबाद और तेलंगाना के इलाकों में लाखों लोगों के नाम ढूंढकर मतदाता सूची में दर्ज कराए गए। ओवैसी ने कहा कि हमने केवल अपने समर्थकों के ही नहीं, बल्कि अपनी पार्टी के घोर राजनीतिक विरोधियों को भी बुलाकर कहा कि लोकतंत्र में तुम्हारा वोट जरूरी है, इसलिए अपना नाम वोटर लिस्ट में जुड़वाओ। उन्होंने कहा, "ओवैसी मुकाबले से कभी नहीं डरता; हम चाहते हैं कि हर नागरिक के पास वोट की ताकत हो, ताकि जब हम सामने वाले को हराएं तो मुकाबले का असली मजा आए"।
'लाल टोपी के साथ जुड़ोगे तो गुलाम बनोगे, नेता नहीं'
अपने चिरपरिचित आक्रामक अंदाज में ओवैसी ने मुस्लिम और पिछड़े समाज के युवाओं को समाजवादी पार्टी से सतर्क रहने की नसीहत दी। सपा के प्रतीक चिन्ह लाल टोपी पर कटाक्ष करते हुए उन्होंने कहा कि अगर लोग केवल लाल टोपी के पीछे भागते रहेंगे, तो वे कभी अपने समाज के बड़े नेता नहीं बन पाएंगे, बल्कि हमेशा के लिए दूसरों के गुलाम बनकर रह जाएंगे। उन्होंने आरोप लगाया कि तथाकथित सेक्युलर पार्टियां केवल चुनाव के समय मुसलमानों से वोट मांगती हैं, लेकिन जब उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व, अधिकारों और सुरक्षा का सवाल आता है, तो वे चुप्पी साध लेती हैं। ओवैसी ने कहा कि मुस्लिम समाज को केवल 'दरी बिछाने' और चुनावी रैलियों में नारे लगाने तक सीमित कर दिया गया है। विपक्षी पार्टियां कभी नहीं चाहतीं कि उत्तर प्रदेश में अल्पसंख्यकों का अपना स्वतंत्र और मजबूत राजनीतिक नेतृत्व खड़ा हो सके।
संभल से चुनाव लड़ने की दी खुली चुनौती, 2027 के लिए नए समीकरण के संकेत
रैली के दौरान ओवैसी ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और सपा प्रमुख अखिलेश यादव दोनों को सीधे आड़े हाथों लिया। उन्होंने दोनों नेताओं को चुनौती देते हुए कहा कि यदि उनमें राजनीतिक दम है, तो वे संभल की सरजमीं से चुनावी मैदान में उतरकर अपनी लोकप्रियता साबित करें। उन्होंने कहा कि सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही अल्पसंख्यकों के मुद्दों पर आंखें मूंदे हुए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आजमगढ़ में ओवैसी की इस आक्रामक जनसभा का मकसद उत्तर प्रदेश के 2027 विधानसभा चुनावों से पहले मुस्लिम बहुल सीटों पर AIMIM की मजबूत उपस्थिति दर्ज कराना और तीसरे मोर्चे की जमीन तैयार करना है। यदि ओवैसी सपा के परंपरागत समीकरणों में सेंध लगाने में कामयाब होते हैं, तो इसका सीधा असर उत्तर प्रदेश की चुनावी लड़ाई पर पड़ना तय माना जा रहा है।