नैशनल अवॉर्ड जीतकर भी मिथुन चक्रवर्ती के पास नहीं था काम

नैशनल अवॉर्ड जीतकर भी मिथुन चक्रवर्ती के पास नहीं था काम

भारतीय सिनेमा जगत में 'डिस्को डांसर' के नाम से मशहूर और अपनी दमदार अदायगी से करोड़ों दिलों पर राज करने वाले लीजेंड्री अभिनेता मिथुन चक्रवर्ती (Mithun Chakraborty) का नाम आज किसी परिचय का मोहताज नहीं है। आज भले ही उनके पास शोहरत, दौलत, पद्म सम्मान और फैंस का अटूट प्यार है, लेकिन उनका यह सफर किसी फिल्मी कहानी से कम संघर्षपूर्ण नहीं रहा है। क्या आप जानते हैं कि अपनी पहली ही फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार (National Award) जीतने के बावजूद मिथुन चक्रवर्ती को लंबे समय तक काम के लिए दर-दर भटकना पड़ा था? हालात इतने बदतर थे कि पेट की आग बुझाने के लिए उन्हें कई बार पार्टियों में जाकर डांस करना पड़ता था और मुंबई की सड़कों पर फुटपाथ पर रातें काटनी पड़ती थीं। असफलता, तंगहाली और भूख के उस काले दौर से निकलकर भारतीय सिनेमा के शिखर तक पहुंचने की मिथुन दा की यह दास्तान हर उस इंसान के लिए प्रेरणा है जो विपरीत परिस्थितियों में भी हार न मानने का जज्बा रखता है।

जानिए कैसे शुरू हुआ था मिथुन चक्रवर्ती का संघर्ष और वह ऐतिहासिक राष्ट्रीय पुरस्कार

पश्चिम बंगाल से ताल्लुक रखने वाले मिथुन चक्रवर्ती का शुरुआती जीवन अभिनय की चमक-धमक से कोसों दूर था। युवावस्था में वे क्रांतिकारी गतिविधियों और बंगाल की उथल-पुथल भरी राजनीति से जुड़े रहे थे, लेकिन जब माहौल बदला तो उन्होंने अपने सपनों को पंख देने के लिए मायानगरी मुंबई (तत्कालीन बॉम्बे) का रुख किया। फिल्मों में काम पाने की तलाश में भटकते हुए उन्हें मृणाल सेन की प्रसिद्ध कला फिल्म 'मृगया' (Mrigayaa) में मुख्य भूमिका निभाने का मौका मिला। इस फिल्म में एक संन्यासी शिकारी के रूप में उनकी बेजोड़ और स्वाभाविक अभिनय कला ने आलोचकों और दर्शकों का दिल जीत लिया। साल 1976 में रिलीज हुई इस पहली ही फिल्म के लिए मिथुन चक्रवर्ती को 'सर्वश्रेष्ठ अभिनेता' के राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया। किसी भी नए कलाकार के लिए यह किसी सपने के सच होने जैसा था, क्योंकि करियर की पहली ही फिल्म में नेशनल अवॉर्ड जीतना अपने आप में एक बहुत बड़ा इतिहास था।

राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने के बाद भी क्यों बेसहारा हो गए थे मिथुन दा?

आम आदमी यही सोचता है कि नेशनल अवॉर्ड जीतने के बाद किसी भी अभिनेता के लिए फिल्मों के दरवाजे हमेशा के लिए खुल जाते हैं और उसके पास ऑफर्स की लाइन लग जाती है। लेकिन मिथुन चक्रवर्ती के मामले में हकीकत इसके बिल्कुल विपरीत थी। उस दौर में आर्ट सिनेमा (Art Cinema) और कमर्शियल मसाला फिल्मों की दुनिया अलग हुआ करती थी। 'मृगया' जैसी गंभीर और कलात्मक फिल्म में काम करने के बाद मुख्यधारा के फिल्म निर्माताओं को लगा कि मिथुन केवल गंभीर और ऑफ-बीट भूमिकाओं के ही अभिनेता हैं, जिसके चलते कमर्शियल फिल्मों के मेकर्स ने उनसे दूरी बना ली। नेशनल अवॉर्ड की ट्रॉफी उनके हाथ में थी, लेकिन पॉकेट खाली थी और पेट भरने के लिए एक अदद ढंग का काम भी नहीं था। इंडस्ट्री में कोई गॉडफादर न होने के कारण उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि इस प्रतिष्ठित सम्मान को वे अपनी सफलता मानें या अपने संघर्ष का सबसे बड़ा अभिशाप।

फुटपाथ पर काटी कई रातें और पेट भरने के लिए पार्टियों में किया डांस

जब हाथ में काम और जेब में फूटी कौड़ी न हो, तो मायानगरी मुंबई की रातें किसी भी इंसान के लिए डरावनी हो जाती हैं। मिथुन चक्रवर्ती ने एक इंटरव्यू में खुद इस बात का खुलासा किया था कि पुरस्कार जीतने के बाद भी उन्हें कई-कई रातें मुंबई की सड़कों पर फुटपाथ के किनारे बेंचों पर या खुले आसमान के नीचे गुजारनी पड़ी थीं। कई बार तो ऐसी स्थिति आ जाती थी कि लगातार कई दिनों तक भूखा रहना पड़ता था। ऐसे बुरे वक्त में अपना और अपनी बुनियादी जरूरतों का पेट भरने के लिए उन्होंने डांस का सहारा लिया। वे छोटी-मोटी पार्टियों, शादियों और होटलों में होने वाले कार्यक्रमों में जाकर डांस करते थे, ताकि बदले में कुछ पैसे मिल सकें जिससे दो वक्त की रोटी का जुगाड़ हो सके। एक नेशनल अवॉर्ड विनर अभिनेता का इस तरह पार्टियों में नाचना और फुटपाथ पर सोना इस बात का गवाह है कि सफलता की मंजिल तक पहुंचने से पहले इंसान को किस भट्टी में तपना पड़ता है।

'डिस्को डांसर' ने बदली किस्मत और बॉलीवुड में खड़ी कर दी नई सल्तनत

संघर्षों के उस लंबे दौर के बाद मिथुन चक्रवर्ती की जिंदगी में एक ऐसा मोड़ आया जिसने भारतीय सिनेमा का इतिहास ही बदल कर रख दिया। उन्होंने बी-ग्रेड और एक्शन फिल्मों से अपने करियर की गाड़ी को पटरी पर लाना शुरू किया और फिर साल 1982 में रिलीज हुई फिल्म 'डिस्को डांसर' (Disco Dancer) ने बॉक्स ऑफिस के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। इस फिल्म की अपार सफलता ने उन्हें रातों-रात देश का सबसे बड़ा सुपरस्टार और ग्लोबल आइकन बना दिया। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और एक के बाद एक 'कसम पैदा करने वाले की', 'डांस डांस', 'अग्निपथ', 'प्यार झुका नहीं' जैसी दर्जनों सुपरहिट फिल्में देकर अपनी अभिनय क्षमता का लोहा मनवाया। आज जब हम मिथुन चक्रवर्ती को सफलता की बुलंदियों पर देखते हैं, तो उनके अतीत के वे पन्ने याद आ जाते हैं जहां उन्होंने फुटपाथ की रातों और संघर्षों को चीरकर अपनी इस सुनहरी तकदीर को खुद अपने हाथों से गढ़ा था।