भारतीय जिमनास्ट प्रणति नायक के साथ पेरिस ओलिंपिक में शर्मनाक लापरवाही
देश का नाम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रोशन करने वाले खिलाड़ियों को जब खेल के सबसे बड़े मंच पर ही बुनियादी सम्मान और सुरक्षा के लाले पड़ने लगें, तो यह पूरे खेल जगत के लिए बेहद शर्मनाक और चिंता का विषय बन जाता है। भारत की स्टार और अनुभवी महिला जिमनास्ट प्रणति नायक (Pranati Nayak) को लेकर एक बेहद चौंकाने वाला और गंभीर मामला सामने आया है। मीडिया रिपोर्ट्स और खेल गलियारों से आ रही खबरों के मुताबिक, जब प्रणति नायक अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं या ओलिंपिक जैसे महाकुंभ के दौरान आधिकारिक आवास पर पहुंचीं, तो खेल प्रबंधन और संबंधित अधिकारियों की घोर लापरवाही के चलते उन्हें एक पुरुष कोच के साथ एक ही कमरे (Room Sharing with Male Coach) में ठहरा दिया गया। रात के वक्त जब इस गंभीर स्थिति का अहसास हुआ, तो महिला एथलीट असहज और बेहद परेशान हो गईं तथा आधी रात को 2 बजे तक भटकने के लिए मजबूर होना पड़ा। जब इस मामले की शिकायत भारतीय ओलंपिक संघ (IOA) तक पहुंची और शीर्ष अधिकारियों ने हस्तक्षेप किया, तब जाकर कहीं उन्हें दूसरा कमरा आवंटित किया गया। इस घटना ने एक बार फिर से हमारे देश के खेल प्रशासन में महिला एथलीटों की सुरक्षा, प्राइवेसी और बुनियादी व्यवस्थाओं पर बहुत बड़े और गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आइए इस पूरे शर्मनाक वाकये और इसके पीछे की व्यवस्थागत लापरवाहियों के हर पहलू को विस्तार से समझते हैं।
जानिए क्या है पूरा मामला: कैसे एक महिला अंतरराष्ट्रीय एथलीट को झेलनी पड़ी भारी मानसिक प्रताड़ना और असुरक्षा
किसी भी एथलीट के लिए खेल के बड़े मैदान पर उतरने से पहले मानसिक रूप से शांत और सुरक्षित महसूस करना सबसे ज्यादा जरूरी होता है। लेकिन भारतीय जिमनास्टिक की शान प्रणति नायक के साथ जो प्रशासनिक लापरवाही हुई, उसने खेल प्रबंधकों की संवेदनशीलता की पोल खोल कर रख दी। जब प्रणति नायक अपने निर्धारित आवास पर पहुंचीं, तो उन्हें जो कमरा आवंटित किया गया था, उसमें उनके साथ एक पुरुष कोच को ठहरा दिया गया था। एक महिला खिलाड़ी के लिए यह स्थिति न केवल अत्यंत असहज और शर्मनाक थी, बल्कि यह उनकी व्यक्तिगत निजता (Privacy) और सुरक्षा के अधिकारों का खुला उल्लंघन भी था। रात के वक्त जब वे इस व्यवस्था से स्तब्ध रह गईं, तो उनके पास तुरंत कमरा बदलने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं था।
रात के 2 बजे तक परेशान भटकती रहीं प्रणति नायक: खेल अधिकारियों की संवेदनहीनता का नमूना
जब एक प्रतिष्ठित एथलीट को इस प्रकार की गंभीर समस्या का सामना करना पड़ा, तो उसे तुरंत हल करने के बजाय संबंधित अधिकारियों ने अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ना शुरू कर दिया। रात के सन्नाटे में जब प्रणति नायक भटक रही थीं और अधिकारियों के दरवाजे खटखटा रही थीं, तब कहीं कोई सुनने वाला नहीं था। मध्यरात्रि के लगभग 2 बज चुके थे और एक अंतरराष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी अपने ही देश के या खेल से जुड़े प्रबंधन के अधिकारियों की लापरवाही के कारण दर-दर भटकने को मजबूर थी। यह दृश्य किसी भी खेल प्रेमी का दिल दहलाने के लिए काफी है कि जिस खिलाड़ी को देश का तिरंगा थामकर मैदान में उतरना है, उसे अपने रहने की बुनियादी जगह के लिए आधी रात को संघर्ष करना पड़ रहा है। खेल प्रशासन की यह लचर व्यवस्था इस बात का प्रमाण है कि कागजों पर बड़े-बड़े दावे करने वाले लोग जमीनी स्तर पर खिलाड़ियों की सुविधाओं को लेकर कितने लापरवाह हैं।
भारतीय ओलंपिक संघ (IOA) के हस्तक्षेप के बाद जाकर बदला गया कमरा, उठा बड़ा सवाल
जब स्थानीय अधिकारियों और संबंधित प्रबंधन की तरफ से कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली, तब इस पूरे मामले की शिकायत शीर्ष स्तर पर भारतीय ओलंपिक संघ (IOA) के अधिकारियों तक पहुंचाई गई। मामले की गंभीरता को समझते हुए IOA ने तुरंत कड़ा संज्ञान लिया और खेल अधिकारियों को फटकार लगाते हुए निर्देश जारी किए। भारतीय ओलंपिक संघ के हस्तक्षेप के बाद ही रात के समय हरकत में आए अधिकारियों ने प्रणति नायक के लिए दूसरा कमरा उपलब्ध कराया, तब जाकर उन्हें चैन की सांस मिली। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या हर छोटी-छोटी और बुनियादी जरूरत के लिए हमेशा शीर्ष संस्थाओं के हस्तक्षेप का इंतजार करना पड़ेगा? क्या खेल परिसरों और विलेज में महिला खिलाड़ियों की सुरक्षा और प्राइवेसी के लिए पहले से कोई मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तय नहीं होनी चाहिए?
महिला एथलीटों की सुरक्षा और खेल प्रशासन में सुधार की सख्त जरूरत
इस पूरी घटना के सामने आने के बाद देश भर के खेल प्रेमियों, पूर्व खिलाड़ियों और सामाजिक संगठनों में भारी गुस्सा देखा जा रहा है। लोगों का कहना है कि भारत में महिला एथलीट पहले ही पुरुष प्रधान खेल संस्कृति और संसाधनों की कमी से जूझते हुए अपनी मेहनत के दम पर आगे बढ़ती हैं, और जब वे देश का मान बढ़ाने विदेश जाती हैं, तो इस तरह की प्रशासनिक लापरवाही उनका मनोबल तोड़ देती है। खेल मंत्रालय और भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) को इस मामले की उच्च स्तरीय जांच करानी चाहिए और उन तमाम लापरवाह अधिकारियों की जवाबदेही तय करनी चाहिए जिनकी वजह से एक अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी को इतनी बड़ी मानसिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी। भविष्य में किसी भी महिला एथलीट के साथ इस तरह की अमानवीय घटना न घره, इसके लिए कड़े नियम बनाए जाने बेहद आवश्यक हैं।