अंडरवर्ल्ड डॉन पर बनी फिल्म 'धुरंधर' में क्यों रखा गया था 'बड़े साहब' नाम

अंडरवर्ल्ड डॉन पर बनी फिल्म 'धुरंधर' में क्यों रखा गया था 'बड़े साहब' नाम

भारतीय सिनेमा में जब भी अंडरवर्ल्ड, अपराध और मुंबई के खूंखार गैंगस्टर्स पर फिल्में बनती हैं, तो दर्शकों के बीच एक अलग ही रोमांच देखने को मिलता है। इस जॉनर में कई बेहतरीन और मास्टरपीस फिल्में बनी हैं, लेकिन जब कभी पर्दे के पीछे की कहानियों या किरदारों के असली नामों को लेकर चर्चा होती है, तो कई चौंकाने वाले खुलासे सामने आते हैं। बॉलीवुड के गलियारों में आजकल कुख्यात वैश्विक आतंकवादी और भारत के सबसे वांटेड डी-कंपनी के सरगना दाऊद इब्राहिम (Dawood Ibrahim) के जीवन और उसके काले साम्राज्य पर आधारित फिल्मों के नामकरण को लेकर एक बहुत ही दिलचस्प किस्सा वायरल हो रहा है। हाल ही में फिल्म इंडस्ट्री के एक जाने-माने निर्देशक और पटकथा लेखक ने यह बड़ा खुलासा किया है कि उनकी एक्शन से भरपूर थ्रिलर फिल्म 'धुरंधर' (Dhurandhar) में अंडरवर्ल्ड डॉन के मुख्य किरदार का नाम जानबूझकर दाऊद इब्राहिम रखने के बजाय 'बड़े साहब' क्यों रखा गया था। इसके पीछे की जो वजह सामने आई है, वह बेहद हैरान करने वाली है।

अंडरवर्ल्ड के खौफ और मेकर्स की सावधानी की दिलचस्प कहानी

सिनेमाई दुनिया में अक्सर यह देखा जाता है कि जब भी किसी बड़े क्रिमिनल या माफिया डॉन के जीवन पर फिल्म बनाई जाती है, तो कानूनी पचड़ों, सुरक्षा कारणों और अंडरवर्ल्ड की धमकियों से बचने के लिए किरदारों के नाम और घटनाओं में कुछ काल्पनिक बदलाव (Fictionalized Changes) किए जाते हैं। फिल्म 'धुरंधर' से जुड़े सूत्रों और मेकर्स के मुताबिक, जब स्क्रिप्ट पर काम चल रहा था, तब यह तय किया गया था कि फिल्म में डॉन की खूंखार छवि को पर्दे पर उतारने के लिए किसी एक व्यक्ति के सीधे नाम का इस्तेमाल करने से बचा जाए। इंडस्ट्री के जानकारों का यह भी मानना है कि दाऊद इब्राहिम और उसके गुर्गों का मिजाज ऐसा रहा है कि वे अपनी या अपने गिरोह की किसी भी प्रकार की सार्वजनिक आलोचना, मज़ाक या 'इंसल्ट' को कभी बर्दाश्त नहीं करते हैं। ऐसे में यदि फिल्म में सीधे तौर पर उसका असली नाम इस्तेमाल किया जाता, तो न केवल सेंसर बोर्ड और कानूनी मोर्चे पर अड़चनें आतीं, बल्कि फिल्म यूनिट को सुरक्षा संबंधी गंभीर खतरों का भी सामना करना पड़ सकता था।

'बड़े साहब' नाम के पीछे की सोची-समझी कूटनीति और उसका असर

फिल्म में डॉन के किरदार को 'बड़े साहब' नाम देने का विचार पूरी तरह से एक सोची-समझी कूटनीति और क्रिएटिव फ्रीडम का हिस्सा था। मुंबई के अंडरवर्ल्ड में जिस तरह से हर छोटा-बड़ा गुर्गा और अपराधी अपने आका को आदर या डर से 'भाई', 'कंपनी' या 'साहब' कहकर संबोधित करता है, उसी कल्चर को ध्यान में रखते हुए इस नाम को गढ़ा गया था। 'बड़े साहब' नाम सुनने में जितना साधारण लगता है, फिल्म के भीतर उसका खौफ उतना ही बड़ा और खतरनाक दिखाया गया था। इस एक नाम के इस्तेमाल से फिल्म मेकर्स ने कानूनी पचड़ों से भी खुद को बचा लिया और दर्शकों के मन में उस छुपे हुए खौफ को भी बखूबी जिंदा रखा, जो असल जिंदगी में डी-कंपनी के नाम से जुड़ा हुआ है।

पर्दे के पीछे की राजनीति और बॉक्स ऑफिस पर अंडरवर्ल्ड फिल्मों का क्रेज

भारतीय दर्शकों के बीच हमेशा से ही अंडरवर्ल्ड और कॉप्स (पुलिस) की लुकाछिपी पर आधारित कहानियों का एक बहुत बड़ा वर्ग दीवाना रहा है। 'कंपनी', 'शूटआउट एट लोखंडवाला' और 'वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई' जैसी फिल्मों ने यह साबित कर दिया है कि जब पर्दे पर पर्दे के पीछे की दुनिया का सच दिखाया जाता है, तो जनता उसे बेहद पसंद करती है। 'धुरंधर' फिल्म में भी इस फॉर्मूले का बखूबी इस्तेमाल किया गया, जहां फिक्शनल नामों और दमदार डायलॉग्स के जरिए अंडरवर्ल्ड के उस दौर को जीवंत किया गया जब मुंबई की सड़कों पर गैंगवार्ड और फिरौती का बोलबाला था। मेकर्स का यह फैसला कि दाऊद का नाम सीधे इस्तेमाल करने के बजाय उसे 'बड़े साहब' का कोडनेम दिया जाए, पूरी तरह से एक समझदारी भरा कदम साबित हुआ, जिसने फिल्म को किसी भी अनावश्यक विवाद से दूर रखते हुए बॉक्स ऑफिस पर एक सुरक्षित और शानदार सफर तय करने में मदद की।