गुरु बदलना बेईमानी है', पद्मश्री बांसुरी वादक पंडित रोनू मजूमदार ने जब नहीं मानी दिग्गज की सलाह
भारतीय शास्त्रीय संगीत के जगत में गुरु-शिष्य परंपरा का स्थान भगवान और भक्त के रिश्ते जितना पवित्र और अटूट माना जाता है। इस पारंपरिक मर्यादा और कला के प्रति अगाध निष्ठा से जुड़ी एक बेहद दिलचस्प, प्रेरणादायक और रोमांचक कहानी देश के प्रख्यात पद्मश्री बांसुरी वादक पंडित रोनू मजूमदार (Pandit Ronu Majumdar) के जीवन से जुड़ी है। संगीत की दुनिया में अपने सुरों से जादू बिखेरने वाले पंडित रोनू मजूमदार ने अपने शुरुआती सफर में एक ऐसा कड़ा फैसला लिया था, जब संगीत के एक बड़े दिग्गज ने उन्हें अपना गुरु बदलने की सलाह दी थी। उस दिग्गज ने रोनू मजूमदार से कहा था कि 'गुरु बदलना बेईमानी है', लेकिन अपनी कला, अपने अभ्यास और अपने पहले गुरु के प्रति अटूट आस्था के बल पर उन्होंने उस सलाह को दरकिनार कर दिया था। वक्त का पहिया ऐसा घूमी कि सालों बाद जब रोनू मजूमदार ने अपनी मेहनत और साधना से संगीत जगत में शिखर को छुआ, तो वही कलाकार उनके सामने नतमस्तक हो गया और खुद उनके पैर पकड़कर उनकी महानता को स्वीकार किया।
पंडित रोनू मजूमदार का संगीत का सफर आसान नहीं था। बचपन से ही बांसुरी की सुरीली धुनों के प्रति समर्पित रोनू ने जब शास्त्रीय संगीत की तालीम लेनी शुरू की, तो उनके सामने कई कठिन चुनौतियां आईं। भारतीय शास्त्रीय संगीत में घराने और गुरु का विशेष महत्व होता है। शुरुआती दौर में जब रोनू मजूमदार अपने संगीत कौशल को तराश रहे थे, तब संगीत जगत के कुछ स्थापित और वरिष्ठ उस्तादों ने उनकी प्रतिभा को तो पहचाना, लेकिन उन्हें यह सलाह दी कि उन्हें अपने वर्तमान गुरु का साथ छोड़कर किसी अन्य बड़े घराने के उस्ताद से तालीम लेनी चाहिए। उस दौर में यह माना जाता था कि बड़े मुकाम तक पहुंचने के लिए बड़े घरानों का ठप्पा होना जरूरी है। हालांकि, रोनू मजूमदार का अंतःकरण इस बात की गवाही नहीं देता था। उनका यह मानना था कि जिस गुरु ने उन्हें उंगली पकड़कर सुर साधना सिखाई है, उनका साथ छोड़ना कला और गुरु के साथ सबसे बड़ी बेईमानी होगी। उन्होंने तमाम दबावों और सलाहों के बावजूद अपने पहले गुरु के दामन को कभी नहीं छोड़ा और अपनी साधना पर पूरा भरोसा रखा।
साधना और रियाज के बल पर तय किया फर्श से अर्श तक का सफर
गुरु के प्रति निष्ठा और अपनी बांसुरी की साधना को सर्वोपरि रखते हुए पंडित रोनू मजूमदार ने दिन-रात एक कर कड़ा रियाज किया। उन्होंने पंडित रविशंकर और संगीत सम्राटों के सानिध्य में अपनी कला को परिष्कृत किया और वैश्विक स्तर पर भारतीय बांसुरी वादन को एक नई पहचान दिलाई। उनकी फूंकी गई बांसुरी की एक-एक तान ने श्रोताओं के दिलों पर ऐसा जादू चलाया कि देखते ही देखते वे दुनिया के शीर्ष कलाकारों की सूची में शुमार हो गए। उन्होंने ग्रैमी अवार्ड्स के लिए नामांकन से लेकर दुनिया के सबसे बड़े संगीत मंचों पर अपनी प्रस्तुतियां दीं। उनकी इस अद्भुत सफलता ने यह साबित कर दिया कि सफलता किसी घराने की मोहताज नहीं होती, बल्कि यह आपकी सच्ची लगन, तपस्या और गुरु के प्रति समर्पण का परिणाम होती है।
जब आलोचक और सलाहकार खुद पहुंचे पैर पकड़ने
वक्त हमेशा एक जैसा नहीं रहता। जिन कलाकारों या सलाहकारों ने कभी रोनू मजूमदार को यह कहा था कि उन्हें अपनी राह बदलकर दूसरा गुरु चुन लेना चाहिए, वे जब सालों बाद पंडित रोनू मजूमदार के शिखर पर पहुंचे हुए व्यक्तित्व और उनके संगीत का जादू देखा, तो वे खुद को रोक नहीं पाए। एक प्रतिष्ठित संगीत समारोह के दौरान जब पंडित रोनू मजूमदार ने अपनी बांसुरी से रागों की ऐसी वर्षा की कि पूरा सभागार मंत्रमुग्ध हो गया, तब वही कलाकार उनके पास आया जिसने कभी उन्हें सलाह दी थी। उस दिग्गज ने न केवल खुलेआम अपनी पुरानी सोच पर पछतावा जताया, बल्कि रोनू मजूमदार की महानता और उनकी कला के आगे झुकते हुए उनके पैर पकड़ लिए। इस भावुक और ऐतिहासिक पल ने यह साबित कर दिया कि भारतीय शास्त्रीय संगीत में अहंकार की कोई जगह नहीं होती, यहां केवल साधना और समर्पण ही सर्वोच्च है। पंडित रोनू मजूमदार का यह जीवन प्रसंग आज की युवा पीढ़ी और संगीत साधकों के लिए एक मिसाल है कि कैसे अपने उसूलों पर अडिग रहकर और गुरु का सम्मान करते हुए शिखर को छुआ जा सकता है।