पीएम मोदी के ओटावा दौरे से पहले भारत और कनाडा आए करीब
अंतरराष्ट्रीय राजनीति के गलियारों से एक बहुत बड़ी और हैरान करने वाली खबर सामने आ रही है, जिसने वैश्विक समीकरणों को नए सिरे से परिभाषित करना शुरू कर दिया है। कभी कड़वाहट के दौर से गुजरने वाले भारत और कनाडा के द्विपक्षीय संबंध अब तेजी से सुधरते हुए नजर आ रहे हैं और दोनों देश एक मजबूत आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी की तरफ कदम बढ़ा रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संभावित ओटावा दौरे से ठीक पहले दोनों देशों के बीच व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते यानी CEPA को लेकर चल रही वार्ताओं ने रफ्तार पकड़ ली है। इस तेजी से बदलते कूटनीतिक घटनाक्रम और व्यापारिक नजदीकियों ने पश्चिमी ताकतों और खासकर वाशिंगटन यानी अमेरिका के रणनीतिकारों की नींद उड़ा दी है, क्योंकि वैश्विक आर्थिक मंच पर इस नए समीकरण के दूरगामी और गहरे परिणाम देखने को मिल सकते हैं।
व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते (CEPA) के पांचवें दौर की वार्ता और ओटावा में बन रहा नया मास्टरप्लान
भारत और कनाडा के बीच द्विपक्षीय व्यापार और निवेश के नए रास्ते खोलने के लिए ओटावा में CEPA समझौते को लेकर पांचवें दौर की महत्वपूर्ण बैठकें शुरू हो चुकी हैं। दोनों देशों के शीर्ष व्यापार अधिकारियों और मंत्रियों ने इस बात के स्पष्ट संकेत दिए हैं कि इस साल के अंत तक इस व्यापक मुक्त व्यापार समझौते को पूरी तरह से अंतिम रूप दे दिया जाए। इस समझौते के तहत दोनों देश वस्तुओं और सेवाओं के व्यापार में आने वाली बाधाओं को कम करने, सीमा शुल्क हटाने और तकनीकी सहयोग को बढ़ावा देने के लिए एक ठोस खाका तैयार कर रहे हैं। भारत की तरफ से दवाइयों, तकनीकी सेवाओं और कृषि उत्पादों के लिए कनाडा के बाजार में पहुंच आसान होने की उम्मीद है, तो वहीं कनाडा भी भारत के विशाल बाजार में अपने ऊर्जा संसाधनों और उच्च तकनीक वाले क्षेत्रों में निवेश करने के लिए बेहद उत्सुक नजर आ रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रस्तावित कनाडा दौरे से दोनों देशों के संबंधों में आएगा ऐतिहासिक मोड़
हालिया महीनों में दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच हुई सकारात्मक बैठकों और कूटनीतिक संवादों ने रिश्तों की बर्फ को पूरी तरह पिघला दिया है। कनाडाई प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए संकेतों के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आने वाले महीनों में आधिकारिक रूप से कनाडा के दौरे पर ओटावा जा सकते हैं, जिसे लेकर दोनों देशों के विदेश मंत्रालयों ने तैयारियां शुरू कर दी हैं। इस उच्चस्तरीय यात्रा से न केवल व्यापारिक समझौते मुहरबंद होंगे, बल्कि सुरक्षा, आतंकवाद के खिलाफ सहयोग, अंतरिक्ष अनुसंधान और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में स्थिरता जैसे गंभीर मुद्दों पर भी मुहर लगने की पूरी संभावना है। इस प्रकार की नजदीकी यह साबित करती है कि कूटनीति में कोई भी रिश्ता स्थाई रूप से शत्रुतापूर्ण नहीं होता, बल्कि राष्ट्रहित और आपसी जरूरतें हर कड़वाहट को पीछे छोड़कर नए आयाम गढ़ देती हैं।
अमेरिकी वर्चस्व और भू-राजनीतिक गलियारों में इस नई दोस्ती के क्या होंगे दूरगामी प्रभाव
भारत और कनाडा के बीच बढ़ती इस घनिष्ठता और मुक्त व्यापार समझौते की ओर बढ़ते कदमों को वैश्विक बाजार में अमेरिका के लिए एक बड़े कूटनीतिक झटके के रूप में देखा जा रहा है। पारंपरिक रूप से पश्चिमी खेमे और अमेरिकी नीतियों के इर्द-गिर्द घूमने वाले व्यापारिक ढांचे में जब भारत जैसे उभरते हुए आर्थिक महाशक्ति देश स्वतंत्र रूप से अन्य विकसित देशों के साथ बड़े समझौते करते हैं, तो वैश्विक प्रभुत्व का संतुलन बदलने लगता है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि भारत और कनाडा का यह CEPA समझौता सफलतापूर्वक लागू हो जाता है, तो इससे न केवल दोनों देशों की अर्थव्यवस्था को नई मजबूती मिलेगी, बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में भी एक नया और संतुलित विकल्प तैयार होगा। ओटावा से लेकर नई दिल्ली तक बिछाई जा रही इस नई कूटनीतिक बिसात ने यह साफ कर दिया है कि आने वाला दौर क्षेत्रीय गठबंधनों से परे व्यावहारिक और आर्थिक हितों पर आधारित वार्ताओं का होने वाला है।