जानिए क्या है मां दुर्गा का 'चक्षु दान' का रहस्य और पूजा में क्यों पहनी जाती है लाल-सफेद साड़ी

जानिए क्या है मां दुर्गा का 'चक्षु दान' का रहस्य और पूजा में क्यों पहनी जाती है लाल-सफेद साड़ी

भारत के सांस्कृतिक मानचित्र पर जब बंगाल की दुर्गा पूजा (Durga Puja in Bengal) का जिक्र होता है, तो आंखों के सामने ढिंढार की थाप, धुनुची नृत्य और मां के भव्य पंडालों की अद्भुत छटा तैरने लगती है। शारदीय नवरात्रि के ठीक मुहाने पर आने वाली सर्वपितृ अमावस्या (Sarva Pitru Amavasya) का दिन बंगाल के लिए सिर्फ पितरों की विदाई का दिन नहीं होता, बल्कि यहीं से महालया (Mahalaya) के पावन अवसर पर उस महापर्व की वास्तविक शुरुआत हो जाती है जिसका पूरे साल बंगाली समाज को बेसब्री से इंतजार रहता है। इस खास दिन बंगाल के कुम्हारटोली (Kumartuli) और विभिन्न पूजा पंडालों में एक बेहद रहस्यमयी, जादुई और प्राचीन रस्म निभाई जाती है जिसे 'चक्षु दान' (Chakshu Daan) कहा जाता है, जिसके बिना मां की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा अधूरी मानी जाती है। इसके साथ ही, बंगाली संस्कृति में इस पूरे उत्सव के दौरान महिलाओं द्वारा पहनी जाने वाली पारंपरिक लाल पाड़ वाली सफेद साड़ी (Lal Paar Sada Saree) का भी एक गहरा धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व है, जो इस पर्व को पूरी दुनिया में अनूठा बनाता है। आइए जानते हैं सर्वपितृ अमावस्या के दिन बंगाल की इन सांस्कृतिक गहराइयों और परंपराओं से जुड़ी पूरी अनकही दास्तान।

महालया के दिन क्या होता है मां दुर्गा का 'चक्षु दान': जानिए कैसे मूर्तिकार जीवित कर देते हैं माता की मिट्टी की मूर्ति

बंगाल की कला और परंपरा में 'चक्षु दान' (Chakshu Daan) की रस्म को किसी चमत्कार से कम नहीं माना जाता है, जो हर साल सर्वपितृ अमावस्या या महालया की सुबह भोर में संपन्न होती है। जब मूर्तिकार महीनों की मेहनत के बाद मां दुर्गा की विशालकाय और सुंदर प्रतिमा को अंतिम रूप दे देते हैं, तो महालया के दिन सूर्योदय से पहले वे माता की आंखों में अपनी उंगलियों या विशेष कुतूहल से अंतिम रेखा खींचकर आंखें बनाते हैं, जिसे चक्षु दान कहा जाता है। मान्यता है कि इसी एक अनुष्ठान के बाद मृतिका (मिट्टी) से बनी मूर्ति में प्राणों का संचार होता है और मां दुर्गा धरती पर अपने बच्चों का हाल जानने के लिए जागृत हो जाती हैं। इस रस्म को देखने के लिए कोलकाता के प्रसिद्ध कुम्हारटोली इलाके में सुबह-ससुबह हजारों की संख्या में कला प्रेमी और भक्त इकट्ठा होते हैं, और जब मूर्तिकार मां की आंखें खोलता है, तो पूरा माहौल 'जय माता दी' और 'या देवी सर्वभूतेषु' के जयकारों से गूंज उठता है।

लाल-सफेद साड़ी का बंगाली संस्कृति में महत्व: क्यों दुर्गा पूजा के पंडालों में हर बंगाली महिला की पहली पसंद बनती है 'लाल पाड़ साड़ी'

दुर्गा पूजा के इन पांच दिनों में जब आप बंगाल की गलियों और भव्य पंडालों में जाएंगे, तो आपको हर उम्र की महिलाएं और युवतियां पारंपरिक बंगाली शैली में लाल बॉर्डर वाली सफेद या ऑफ-व्हाइट रंग की सूती या सिल्क की साड़ी (Lal Paar Saree) पहने नजर आएंगी। इस विशेष पोशाक का इतिहास बंगाल की समृद्ध परंपरा से जुड़ा हुआ है, जहां सफेद रंग पवित्रता, शांति और सादगी का प्रतीक माना जाता है, जबकि लाल रंग ऊर्जा, शक्ति और मां दुर्गा के सुहाग व उग्र स्वरूप का प्रतिनिधित्व करता है। महालया और अष्टमी के दिन विशेष रूप से बंगाली महिलाएं 'अंजली' देने के लिए इसी पारंपरिक लिबास को पहनती हैं, जो उनकी सांस्कृतिक पहचान का सबसे बड़ा गहना माना जाता है। समय के साथ भले ही फैशन और कपड़ों के डिजाइन में कई बदलाव आए हों, लेकिन बंगाली महिलाओं के दिल में लाल-सफेद साड़ी का जो स्थान है, वह आज भी पहले जैसा ही अटूट और अमर बना हुआ है।

पितृ पक्ष की विदाई और मातृ शक्ति के आगमन का अनूठा संगम: सर्वपितृ अमावस्या से कैसे शुरू होती है दुर्गोत्सव की उल्टी गिनती

सर्वपितृ अमावस्या का दिन आध्यात्मिक दृष्टि से जहां एक तरफ अपने पूर्वजों को अंतिम तर्पण देकर विदा करने का भावुक पल होता है, वहीं बंगाल की धरती पर यह दिन शोक से उत्सव की ओर मुड़ने का सबसे बड़ा मोड़ होता है। अमावस्या की इस शांत और पवित्र रात के ठीक बाद जब अगले दिन प्रतिपदा से नवरात्र की विधिवत शुरुआत होती है, तो बंगाल का कोना-कोना ढोल-ढाक की आवाज और मां के स्वागत के गीतों से झूम उठता है। पितरों के आशीर्वाद के साथ जब माता रानी अपने मायके यानी धरती पर पधारती हैं, तो यह संगम इस बात का प्रतीक है कि जीवन में दुख और मृत्यु के बाद भी उत्सव और सृजन का पहिया निरंतर घूमता रहता है। यदि आप भी इस बार दुर्गा पूजा के असली रंग और बंगाली संस्कृति की उस पारम्परिक खूबसूरती को करीब से देखना चाहते हैं, तो महालया और सर्वपितृ अमावस्या के दिन बंगाल की यात्रा करना आपके लिए एक कभी न भूलने वाला और अलौकिक अनुभव साबित होगा।