बस 72 घंटे बचे हैं...शुरू हो गई नेपाल के 'झील बम' की उलटी गिनती, क्या भारत पर भी सैलाब का खतरा?

बस 72 घंटे बचे हैं...शुरू हो गई नेपाल के 'झील बम' की उलटी गिनती, क्या भारत पर भी सैलाब का खतरा?

हिमालय की गोद में बसे पड़ोसी देश नेपाल से एक ऐसी भयानक और दहला देने वाली खबर सामने आ रही है, जिसने भारत के सीमावर्ती इलाकों से लेकर राष्ट्रीय राजधानी तक के हुक्मरानों की नींद उड़ा दी है। मौसम वैज्ञानिकों, भूगर्भशास्त्रियों और आपदा प्रबंधन एजेंसियों ने एक अत्यंत गंभीर चेतावनी जारी करते हुए बताया है कि नेपाल के ऊंचाई वाले पर्वतीय क्षेत्रों में स्थित एक बेहद संवेदनशील और खतरनाक ग्लेशियर झील पर कुदरत का कहर कभी भी टूट सकता है। इसे तकनीकी भाषा में 'ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड' (GLOF) यानी 'झील बम' कहा जा रहा है, जिसकी उलटी गिनती के अब महज 72 घंटे ही शेष बचे बताए जा रहे हैं। यदि यह प्राकृतिक टाइम बम फटा, तो करोड़ों घन मीटर पानी और भारी मात्रा में मलबा अचानक नीचे की तरफ बहेगा, जिससे भारत के कई मैदानी और तटीय इलाकों में भयंकर तबाही मच सकती है। इस आसन्न खतरे को भांपते हुए उत्तर प्रदेश, बिहार और अन्य पड़ोसी राज्यों के संबंधित जिलों में हाई अलर्ट घोषित कर दिया गया है, और हर कोई बस यही प्रार्थना कर रहा है कि कुदरत इस बड़ी आपदा से इस क्षेत्र को सुरक्षित बचा ले।

क्या है यह 'झील बम' का पूरा रहस्य और क्यों बन रहा है यह मौत का परवाना?

ग्लेशियरों के पिघलने से पहाड़ों की ऊंची चोटियों पर जो प्राकृतिक झीलें बनती हैं, वे समय के साथ इतनी विशाल हो जाती हैं कि उनके किनारे प्राकृतिक रूप से कमजोर होने लगते हैं। नेपाल के हिमालयी क्षेत्र में स्थित इस विशेष झील में पानी का जलस्तर लगातार खतरनाक सीमा को पार कर चुका है, और ग्लोबल वार्मिंग के चलते इसके बांध पर लगातार भारी दबाव बन रहा है। भूवैज्ञानिकों का मानना है कि यदि तापमान में थोड़ी सी भी वृद्धि होती है या कोई हल्का भूकंप आता है, तो इस झील का मुहाना अचानक टूट सकता है। यह स्थिति किसी बड़े बम के फटने से भी ज्यादा खतरनाक साबित हो सकती है, क्योंकि इसके फटने से चंद मिनटों में ही पानी का ऐसा तूफानी रेला निकलेगा जो रास्ते में आने वाले गांवों, पुलों, सड़कों और बस्तियों को क्षणभर में नेस्तनाबूद कर देगा। इसी अतिसंवेदनशील खतरे के कारण इसे 'झील बम' की संज्ञा दी गई है, और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की नजर भी इस वक्त नेपाल के इस संवेदनशील जोन पर टिकी हुई है।

भारत के किन राज्यों पर मंडरा रहा है सबसे बड़ा और सीधा खतरा?

नेपाल से निकलने वाली कई बड़ी नदियां सीधे तौर पर भारत के मैदानी राज्यों जैसे बिहार, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में प्रवेश करती हैं। जब कभी भी नेपाल के पहाड़ी इलाकों में बादल फटने या इस तरह की झील के टूटने की घटनाएं होती हैं, तो उसका सबसे पहला और भयंकर असर भारत के इन सीमावर्ती जिलों पर ही पड़ता है। कोसी, गंडक, घाघरा और राप्ती जैसी नदियां अचानक उफान पर आ जाती हैं, जिससे निचले इलाकों में देखते ही देखते महाप्रलय जैसी स्थिति पैदा हो जाती है। पिछले कुछ वर्षों में ऐसी कई घटनाओं ने बिहार और उत्तर प्रदेश के उत्तरी जिलों में लाखों लोगों को बेघर किया है और फसलों तथा बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाया है। इस बार चूंकि खतरा सीधे तौर पर एक बड़े 'झील बम' के फटने का है, इसलिए जल संसाधन मंत्रालयों ने केंद्रीय केंद्रीय जल आयोग (CWC) के साथ मिलकर सीमावर्ती क्षेत्रों में पानी के प्रवाह की 24 घंटे निगरानी शुरू कर दी है ताकि किसी भी अनहोनी से पहले लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया जा सके।

प्रशासन की नींद उड़ी: हाई अलर्ट पर एजेंसियां और जिला प्रशासन

72 घंटों की इस अल्टीमेटम वाली चेतावनी के बाद से ही भारत और नेपाल दोनों देशों के प्रशासनिक अमले में भारी हड़कंप मच गया है। भारत के आपदा प्रबंधन विभाग (NDRF) और राज्य की आपदा प्रतिक्रिया टीमों (SDRF) को पूरी तरह से मुस्तैद कर दिया गया है। जिन जिलों के डूबने का सबसे ज्यादा खतरा है, वहां लगातार सायरन बजाकर और स्थानीय मुनादी के जरिए लोगों को नदियों के किनारे से दूर रहने की हिदायत दी जा रही है। राहत और बचाव कार्यों के लिए मोटरबोट्स, मेडिकल टीमों और गोताखोरों को संवेदनशील बिंदुओं पर तैनात कर दिया गया है। जिलाधिकारियों ने आपातकालीन नियंत्रण कक्ष (Control Room) स्थापित कर दिए हैं जो पल-पल की सैटेलाइट रिपोर्ट और मौसम विभाग के अपडेट्स पर नजर बनाए हुए हैं। सरकार की कोशिश यही है कि यदि प्रकृति का यह प्रकोप बरसता भी है, तो कम से कम जनहानि को पूरी तरह रोका जा सके और प्रभावितों को समय रहते सुरक्षित राहत शिविरों में पहुंचाया जा सके।

क्लाइमेट चेंज का खतरनाक रूप और भविष्य के लिए एक गंभीर चेतावनी

यह पूरी घटना केवल एक तात्कालिक आपदा की आशंका नहीं है, बल्कि यह पूरी दुनिया के लिए जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के दुष्प्रभावों का एक अत्यंत डरावना और यथार्थवादी उदाहरण है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण जिस तेजी से हिमालय के ग्लेशियर पिघल रहे हैं, उससे इस प्रकार की खतरनाक झीलों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हो रही है। वैज्ञानिक लंबे समय से चेतावनी देते आ रहे हैं कि यदि समय रहते कार्बन उत्सर्जन को नियंत्रित नहीं किया गया और पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र (Mountain Ecosystem) की रक्षा के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो ऐसी मानव-जनित और प्राकृतिक आपदाएं रोज की बात बन जाएंगी। नेपाल की यह झील इस बात का जीवंत प्रमाण है कि प्रकृति जब अपना रौद्र रूप दिखाती है, तो इंसानी तकनीक और तैयारियां बौनी साबित होने लगती हैं। फिलहाल सबकी निगाहें अगले 72 घंटों की गतिविधियों पर टिकी हुई हैं, और पूरी इंसानियत यही दुआ कर रही है कि यह आसन्न संकट बिना किसी बड़ी तबाही के टल जाए।