सुप्रीम कोर्ट के 37 जजों में सिर्फ तीन महिला नाम, जानिए पूरी न्यायिक तस्वीर

सुप्रीम कोर्ट के 37 जजों में सिर्फ तीन महिला नाम, जानिए पूरी न्यायिक तस्वीर

भारतीय न्यायपालिका और सर्वोच्च अदालत के इतिहास में एक ऐसा ऐतिहासिक और बहुप्रतीक्षित क्षण आने की सुगबुगाहट तेज हो गई है, जिसका देशवासियों को लंबे समय से इंतजार था। देश के सर्वोच्च न्यायालय में दशकों से चली आ रही पुरुष प्रधान व्यवस्था के बीच अब वह दिन दूर नहीं जब भारत को अपनी पहली महिला मुख्य न्यायाधीश यानी सीजेआई (CJI) मिलने वाली है। हालांकि, मौजूदा समय में सुप्रीम कोर्ट के भीतर कुल 37 न्यायाधीशों की स्वीकृत और कार्यरत संख्या में महिला जजों की मौजूदगी बेहद कम यानी केवल तीन ही है, लेकिन इनमें से एक नाम ऐसा है जो वरिष्ठता के आधार पर इस सर्वोच्च पद की दौड़ में सबसे आगे चल रहा है। न्यायिक गलियारों में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि आने वाले समय में देश के सर्वोच्च न्यायिक पद पर एक महिला जज का विराजमान होना भारतीय नारी शक्ति और न्याय व्यवस्था के लिए एक बहुत बड़ा मील का पत्थर साबित होगा।

सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा 37 जजों में कौन सी तीन महिला न्यायमूर्तिकर्ता संभाल रही हैं जिम्मेदारी

देश के सबसे बड़े मंदिर यानी सुप्रीम कोर्ट में वर्तमान समय में विभिन्न उच्च न्यायालयों से चुनकर आए कुल 37 न्यायाधीश अपनी सेवाएं दे रहे हैं, जिनमें से न्याय के इस सर्वोच्च सिंहासन पर बैठने वाली महिला जजों की संख्या मात्र तीन है। इन तीनों महिला न्यायमूर्तियों ने अपनी बेहतरीन कानूनी समझ, निष्पक्ष फैसलों और अद्वितीय कार्यशैली के दम पर देश भर में एक अलग पहचान बनाई है। इनमें से वरिष्ठता क्रम और सेवानिवृत्ति की तारीखों के गणित को देखें तो जस्टिस बीवी नागरत्ना का नाम सबसे ऊपर आता है, जो न केवल इन तीनों में सबसे वरिष्ठ हैं, बल्कि उनके पास न्यायिक मामलों का एक लंबा और शानदार अनुभव भी है। उनके अलावा अन्य महिला जज भी अपने कड़े और स्पष्ट फैसलों के लिए जानी जाती हैं, जो लगातार न्यायपालिका की गरिमा को बढ़ाने का काम कर रही हैं। हालांकि संख्या के लिहाज से यह अनुपात कुल जजों के मुकाबले काफी कम है, फिर भी इन महिला जजों की उपस्थिति ने निचली अदालतों से लेकर उच्च न्यायालयों तक की महिलाओं और वकीलों के लिए एक बहुत बड़ी उम्मीद जगाई है।

जस्टिस बीवी नागरत्ना का नाम क्यों है सबसे आगे और क्या है इतिहास रचने का पूरा गणित

भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में नाम दर्ज कराने की कगार पर खड़ी जस्टिस बीवी नागरत्ना के पक्ष में वरिष्ठता का नियम सबसे मजबूत कड़ी के रूप में खड़ा है। सुप्रीम कोर्ट की कार्यप्रणाली और वरिष्ठता के पारंपरिक नियमों के अनुसार, जब भी अगला मुख्य न्यायाधीश चुना जाता है, तो उसमें सबसे वरिष्ठ जज को प्राथमिकता दी जाती है। यदि सब कुछ तयशुदा और नियमों के मुताबिक चलता रहा, तो जस्टिस नागरत्ना के पास भारत की पहली महिला सीजेआई बनने का ऐतिहासिक अवसर होगा, जो देश के न्यायिक इतिहास का सबसे बड़ा मोड़ साबित होगा। उनके पिता दिवंगत ईएस वेंकटरैया भी देश के मुख्य न्यायाधीश रह चुके हैं, और इस तरह से यह पिता और पुत्री की जोड़ी के लिए भी एक अनूठा और गौरवशाली रिकॉर्ड होगा। देश भर के कानूनविदों और महिला संगठनों की नजरें इस पूरी प्रक्रिया पर टिकी हुई हैं, क्योंकि एक महिला का देश के शीर्ष न्यायिक पद पर बैठना लैंगिक समानता और न्याय के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी बदलाव लाएगा।

न्यायपालिका में लैंगिक विविधता की जरूरत और भविष्य की अदालतों में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी

भले ही वर्तमान समय में सुप्रीम कोर्ट के 37 जजों में केवल तीन महिला जज हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में देश की विभिन्न अदालतों में महिला वकीलों और जजों की संख्या में लगातार सकारात्मक इजाफा देखने को मिल रहा है। देश की अदालतों में लैंगिक विविधता होना न केवल समाज के हर वर्ग को न्याय में प्रतिनिधित्व देने के लिए जरूरी है, बल्कि इससे महिलाओं से जुड़े संवेदनशील मामलों में अधिक संतुलित और मानवीय दृष्टिकोण अपनाने में भी मदद मिलती है। सर्वोच्च न्यायालय में पहली महिला सीजेआई के आने की संभावना मात्र से ही न्याय व्यवस्था की ओर देखने का नजरिया बदलने लगा है और युवा महिला कानूनविदों को देश के सबसे ऊंचे पद तक पहुंचने की प्रेरणा मिल रही है। आने वाले समय में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि सरकार और कॉलेजियम प्रणाली मिलकर न्यायपालिका के भीतर लैंगिक संतुलन को और अधिक मजबूत करने के लिए क्या नए कदम उठाते हैं, ताकि देश की न्याय व्यवस्था आधुनिक और समावेशी बन सके।