घाटी में आतंकी धमकियों के बीच कश्मीरी पंडितों की गुहार: 'तैयार फ्लैट्स में तुरंत करें शिफ्ट...
कश्मीर घाटी में एक बार फिर से सुरक्षा और पुनर्वास को लेकर कश्मीरी पंडित समुदाय का गुस्सा और दर्द खुलकर सामने आ गया है, जहां टारगेट किलिंग और लगातार मिलती आतंकी धमकियों के साए में जी रहे इन विस्थापित परिवारों ने सरकार और प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। प्रधानमंत्री पुनर्वास पैकेज यानी पीएम पैकेज के तहत घाटी में नौकरी कर रहे इन कश्मीरी पंडित कर्मचारियों का साफ कहना है कि वे अब और अधिक असुरक्षित माहौल में किराए के मकानों में रहने या खुले मैदानों में अपनी जान जोखिम में डालने को तैयार नहीं हैं। घाटी के विभिन्न ट्रांजिट कैंपों और सुरक्षित ठिकानों पर रह रहे इन कर्मचारियों ने सरकार को चेतावनी दी है कि वे सुरक्षित और पूरी तरह से तैयार हो चुके ट्रांजिट फ्लैट्स में उन्हें तुरंत शिफ्ट करे, अन्यथा वे मजबूरन भूख हड़ताल और तीव्र विरोध प्रदर्शन का रास्ता अख्तियार करेंगे। इस गंभीर स्थिति ने एक बार फिर से केंद्र और जम्मू-कश्मीर प्रशासन के उन दावों पर सवालिया निशान लगा दिया है जिनमें घाटी में हालात पूरी तरह सामान्य होने और विस्थापितों की सुरक्षित घर वापसी के दावे किए जाते रहे हैं।
असुरक्षा और टारगेट किलिंग के साए में नौकरी करने को मजबूर कश्मीरी पंडित कर्मचारी
कश्मीर घाटी के अलग-अलग जिलों में तैनात पीएम पैकेज के तहत कार्यरत कर्मचारियों का जीवन इन दिनों किसी खौफनाक सपने से कम नहीं गुजर रहा है। पिछले कुछ महीनों में जिस तरह से घाटी के भीतर चुन-चुनकर अल्पसंख्यकों और बाहरी लोगों को निशाना बनाया गया है, उससे कश्मीरी पंडित समुदाय के भीतर डर का माहौल इस कदर गहरा गया है कि हर सुबह काम पर निकलने वाला कर्मचारी शाम को सुरक्षित घर लौटने की दुआ मांगता है। इन कर्मचारियों का यह दर्द है कि प्रशासन उन्हें बिना पुख्ता सुरक्षा व्यवस्था के उन इलाकों में ड्यूटी करने के लिए बाध्य कर रहा है जहां आतंकवादियों के स्लीपर सेल और भूमिगत नेटवर्क लगातार सक्रिय बने हुए हैं। कश्मीरी पंडितों का कहना है कि वे अपनी मातृभूमि में रहकर रोजगार तो करना चाहते हैं, लेकिन वे अपनी जान की कीमत पर सरकार की किसी भी प्रशासनिक लापरवाही का शिकार नहीं बनना चाहते हैं। उनके परिवार हर पल एक अनहोनी के डर के साए में जीने को मजबूर हैं, जिससे उनकी मानसिक स्थिति भी बेहद खराब होती जा रही है।
ट्रांजिट अवास निर्माण कार्य पूरा होने के बावजूद आवंटन में हो रही भारी देरी
इस पूरे विवाद की सबसे बड़ी और मुख्य वजह प्रधानमंत्री विकास पैकेज के अंतर्गत बनाए जा रहे वे हजारों सुरक्षित ट्रांजिट फ्लैट्स हैं जिनका निर्माण कार्य लगभग पूरा हो चुका है या अंतिम चरण में है, लेकिन लाल फीताशाही और प्रशासनिक सुस्ती के कारण इनका आवंटन अटका पड़ा है। कश्मीरी पंडित संघर्ष समितियों और कर्मचारी संगठनों का आरोप है कि सरकार ने कागजों पर तो इन आवासों को जल्द देने के तमाम बड़े दावे किए, लेकिन जमीन पर स्थिति यह है कि तैयार इमारतों पर ताले लटके हुए हैं और अधिकारी फाइलों को एक टेबल से दूसरी टेबल घुमाने में व्यस्त हैं। इन सुरक्षित परिसरों या कॉलोनियों में सुरक्षा के तमाम आधुनिक इंतजाम, सीसीटीवी कैमरे, कटीले तार और बाउंड्री वॉल जैसी सुविधाएं दी जानी हैं ताकि आतंकी हमलों से तुरंत बचाव किया जा सके। जब सरकार के पास ये सभी सुरक्षित इंफ्रास्ट्रक्चर और तैयार फ्लैट्स उपलब्ध हैं, तो फिर अधिकारियों द्वारा इन्हें पात्र कर्मचारियों को तुरंत अलॉट करने में इतनी हीला-हिलाली क्यों बरती जा रही है, यह कश्मीरी पंडितों के लिए सबसे बड़ा और अनुत्तरित सवाल बना हुआ है।
भूख हड़ताल की चेतावनी और सरकार की प्रशासनिक नींद पर बड़ा सवालिया निशान
जब बार-बार गुहार लगाने, प्रशासनिक अधिकारियों से मिलने और मंत्रियों को ज्ञापन सौंपने के बाद भी कश्मीरी पंडित कर्मचारियों की इस गंभीर और जीवन-मरण से जुड़ी समस्या का कोई ठोस समाधान नहीं निकला, तो उनके सब्र का बांध आखिरकार टूट गया है। कर्मचारियों ने यह स्पष्ट ऐलान कर दिया है कि यदि प्रशासन ने तय समय सीमा के भीतर उन्हें इन सुरक्षित और तैयार फ्लैट्स में शिफ्ट नहीं किया, तो वे मजबूर होकर घाटी से लेकर जम्मू तक बड़े पैमाने पर भूख हड़ताल शुरू करेंगे जिसकी पूरी जिम्मेदारी स्थानीय प्रशासन और सरकार की होगी। इस चेतावनी के बाद सुरक्षा एजेंसियों और खुफिया विभागों में भी हड़कंप मच गया है क्योंकि सर्दियों की आहट के बीच घाटी में इस तरह का कोई भी बड़ा आंदोलन कानून-व्यवस्था की एक नई समस्या पैदा कर सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का भी यह मानना है कि कश्मीरी पंडितों का यह आक्रोश इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि घाटी की जमीनी हकीकत और प्रशासनिक दावों के बीच एक बहुत बड़ा और खतरनाक फासला अभी भी कायम है, जिसे पाटने के लिए सरकार को तुरंत और युद्ध स्तर पर ठोस कदम उठाने की जरूरत है।
शांति बहाली के दावों के बीच विस्थापितों के पुनर्वास पर मंडराता गंभीर संकट
एक तरफ जहां केंद्र सरकार और जम्मू-कश्मीर प्रशासन द्वारा अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय मंचों पर यह दावा किया जा रहा है कि अनुच्छेद 370 हटने के बाद घाटी में शांति का नया दौर शुरू हो चुका है, वहीं दूसरी तरफ कश्मीरी पंडितों की यह ताजा गुहार उन तमाम दावों की पोल खोलती हुई नजर आ रही है। किसी भी क्षेत्र में शांति का पैमाना केवल पर्यटन का बढ़ना या पत्थरबाजी की घटनाओं का कम होना नहीं हो सकता, बल्कि उसका असली पैमाना यह होता है कि वहां का मूल अल्पसंख्यक समुदाय बिना किसी खौफ के स्वतंत्र रूप से अपनी जिंदगी जी सके। कश्मीरी पंडितों का यह संकट इस बात की ओर साफ इशारा करता है कि जब तक विस्थापितों का सम्मानजनक, सुरक्षित और मुकम्मल पुनर्वास जमीन पर नहीं उतरता, तब तक घाटी में पूर्ण शांति और सामान्य स्थिति का दावा अधूरा ही माना जाएगा। अब यह देखना बेहद दिलचस्प और महत्वपूर्ण होगा कि केंद्र सरकार और उपराज्यपाल प्रशासन इस गंभीर चेतावनी का कितना संज्ञान लेते हैं और कितनी जल्दी इन भयभीत परिवारों को सुरक्षित आशियाना मुहैया कराकर उनके गुस्से को शांत करने में सफल होते हैं।