तुकाराम मुंढे का नाम सुनते ही छात्रों का प्रदर्शन खत्म, रडार पर आए पेपर लीक और गड़बड़ी करने वाले माफिया
कड़क मिजाज, बेबाक कार्यशैली और भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस के लिए पहचाने जाने वाले वरिष्ठ आईएएस अधिकारी तुकाराम मुंढे का नाम आते ही प्रतियोगी परीक्षाओं में धांधली के खिलाफ सड़कों पर उतरे हजारों छात्रों का गुस्सा शांत हो गया। महाराष्ट्र के कई शहरों में भर्ती परीक्षाओं और पेपर में गड़बड़ी को लेकर लंबे समय से आंदोलन कर रहे छात्रों ने प्रशासन की इस घोषणा के बाद अपना प्रदर्शन खत्म कर दिया कि पूरे मामले की कमान या जांच प्रक्रिया में तुकाराम मुंढे की सीधी निगरानी सुनिश्चित की जा रही है। छात्र संगठनों का कहना है कि जहां बड़े-बड़े आश्वासनों और कमेटियों पर उनका भरोसा टूट चुका था, वहीं एक ईमानदार और सख्त प्रशासनिक अधिकारी की मौजूदगी ने उन्हें न्याय की ठोस उम्मीद दी है। इस फैसले के साथ ही अब पेपर लीक और उत्तर पुस्तिकाओं में हेरफेर करने वाले शिक्षा माफिया और बिचौलियों की धड़कनें तेज हो गई हैं।
नाम आते ही बदला माहौल, छात्रों का भरोसा क्यों है इतना मजबूत
प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं के बीच तुकाराम मुंढे की छवि एक ऐसे अधिकारी की है जो न तो राजनीतिक दबाव के आगे झुकते हैं और न ही किसी रसूखदार को बख्शते हैं। पिछले कई दिनों से हजारों छात्र धूप और बारिश की परवाह किए बिना सड़कों पर डटे हुए थे। उनकी मांग थी कि परीक्षाओं में हुई गड़बड़ी की निष्पक्ष जांच कराई जाए और दोषियों को सलाखों के पीछे भेजा जाए। स्थानीय प्रशासन और पुलिस के कई दौर की वार्ताओं के बावजूद छात्र हटने को तैयार नहीं थे। जैसे ही शासन के वरिष्ठ अधिकारियों ने छात्रों के प्रतिनिधिमंडल को यह आधिकारिक भरोसा दिलाया कि जांच व्यवस्था और सुधार की प्रक्रिया में तुकाराम मुंढे को मुख्य भूमिका सौंपी जा रही है, प्रदर्शन स्थल पर माहौल पूरी तरह बदल गया। छात्रों ने ताली बजाकर फैसले का स्वागत किया और तत्काल प्रभाव से धरना समाप्त करने का ऐलान कर दिया।
पेपर माफिया और रैकेट से जुड़े सिंडिकेट पर शिकंजा कसने की तैयारी
तुकाराम मुंढे की कार्यप्रणाली को जानने वाले लोग अच्छी तरह वाकिफ हैं कि वे आधी-अधूरी जांच या लीपापोती में कतई विश्वास नहीं रखते। सूत्रों के मुताबिक जांच दल अब उन सभी कोचिंग संस्थानों, परीक्षा केंद्रों, प्रिंटिंग प्रेस के संपर्कों और ऑनलाइन सर्वर संचालकों की कुंडली खंगालने में जुट गया है जहां से गड़बड़ी के तार जुड़े हो सकते हैं। पिछले कुछ वर्षों में भर्ती परीक्षाओं में जिस तरह से संगठित सिंडिकेट सक्रिय हुए हैं, उन्होंने मेहनती और गरीब परिवारों के छात्रों के भविष्य पर ग्रहण लगा दिया था। अब जांच का दायरा केवल निचले स्तर के दलालों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि परीक्षा नियामक संस्थाओं के भीतर बैठे उन सफेदपोश चेहरों की पहचान भी की जाएगी जो मोटी रकम लेकर मेरिट लिस्ट में हेराफेरी करते रहे हैं।
करियर के हर पड़ाव पर सख्त फैसलों के लिए जाने जाते हैं मुंढे
2005 बैच के आईएएस अधिकारी तुकाराम मुंढे का प्रशासनिक रिकॉर्ड बेहद चर्चित और प्रेरणादायी रहा है। सोलापुर, नवी मुंबई, नागपुर, नासिक या फिर मंत्रालय के विभिन्न विभागों में तैनाती के दौरान उन्होंने हमेशा व्यवस्था में गहरे पैठ बना चुके भ्रष्टाचार पर सीधा प्रहार किया। उनकी इसी सख्त और बेबाक शैली के कारण उनका कई बार तबादला भी हुआ, लेकिन आम जनता और खासकर युवाओं के बीच उनकी साख लगातार बढ़ती चली गई। नवी मुंबई नगर निगम में अवैध निर्माणों पर बुलडोजर चलाने से लेकर नागपुर में स्मार्ट सिटी परियोजना की वित्तीय गड़बड़ियों को उजागर करने तक, मुंढे ने हर बार साबित किया है कि कानून के सामने कोई भी रसूखदार बड़ा नहीं होता। यही वजह है कि जब शिक्षा और भर्ती परीक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में उनके हस्तक्षेप की बात आई, तो छात्रों ने बिना किसी शर्त के आंदोलन वापस लेने का निर्णय लिया।
परीक्षा प्रणाली में बुनियादी और डिजिटल सुधारों का खाका तैयार
जांच के साथ-साथ राज्य सरकार और प्रशासनिक अमला अब इस बात पर भी मंथन कर रहा है कि भविष्य में आयोजित होने वाली किसी भी परीक्षा में मानवीय दखल और गड़बड़ी की गुंजाइश को पूरी तरह खत्म किया जाए। इसके तहत परीक्षा केंद्रों पर बायोमेट्रिक अटेंडेंस, जैमर तकनीक, प्रश्नपत्रों की डिजिटल ट्रैकिंग और कड़े निगरानी प्रोटोकॉल लागू करने की योजना बनाई जा रही है। छात्रों का स्पष्ट कहना है कि वे किसी परीक्षा को रद्द कराने के पक्षधर नहीं हैं, बल्कि वे एक ऐसी पारदर्शी व्यवस्था चाहते हैं जिसमें सिर्फ और सिर्फ योग्यता और मेहनत के दम पर चयन हो। प्रशासनिक तंत्र में तुकाराम मुंढे की मौजूदगी यह आश्वस्त करती है कि बनाई जाने वाली नई व्यवस्था कागजी नहीं होगी, बल्कि धरातल पर पूरी सख्ती के साथ लागू की जाएगी।
युवाओं के आंदोलन ने दिखाया व्यवस्था पर विश्वास का नया मॉडल
आम तौर पर जब कोई बड़ा छात्र आंदोलन भड़कता है, तो उसे शांत करने के लिए पुलिस बल या राजनीतिक बातचीत का सहारा लिया जाता है। लेकिन इस घटनाक्रम ने एक बेहद अनूठा और सकारात्मक संदेश दिया है कि यदि व्यवस्था में किसी एक भी ईमानदार और निर्भीक अधिकारी पर जनता का अटूट भरोसा हो, तो बड़े से बड़ा गतिरोध चंद मिनटों में खत्म हो सकता है। छात्रों का सड़कों से वापस अपनी किताबों और लाइब्रेरी की ओर लौटना इस बात का प्रमाण है कि युवा सिर्फ ठोस और निष्पक्ष न्याय चाहते हैं। अब पूरी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले दिनों में जांच एजेंसी पेपर लीक माफियाओं पर किस तरह का बड़ा प्रहार करती है और छात्रों के भरोसे की यह जीत भर्ती व्यवस्था को कितना पारदर्शी बना पाती है।