'CJI को हर मिनट देनी होती है अग्निपरीक्षा, जरूरी नहीं कि परखने वाले सच्चे हों'; विपक्ष के हंगामे के बीच NHRC चीफ का बड़ा बयान

'CJI को हर मिनट देनी होती है अग्निपरीक्षा, जरूरी नहीं कि परखने वाले सच्चे हों'; विपक्ष के हंगामे के बीच NHRC चीफ का बड़ा बयान

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में विपक्षी दलों के सुप्रीम कोर्ट मार्च और राजनीतिक गहमागहमी के बीच राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के अध्यक्ष जस्टिस वी. रामासुब्रमण्यम (सेवानिवृत्त) ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के पद और जिम्मेदारियों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और सांकेतिक टिप्पणी की है। मानवाधिकार आयोग के 33वें स्थापना दिवस के अवसर पर आयोजित समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत के सामने बोलते हुए एनएचआरसी चीफ ने कहा कि प्रधान न्यायाधीश के पद पर बैठे व्यक्ति को हर मिनट 'अग्निपरीक्षा' से गुजरना पड़ता है। उन्होंने अपने भाषण में यह भी जोड़ा कि यह बिल्कुल जरूरी नहीं कि हर बार परीक्षा लेने वाले लोग पवित्र या सच्चे ही हों। विपक्षी दलों के जारी प्रदर्शन और सीजेआई द्वारा नेताओं को दिए गए हालिया कानूनी सुझावों के संदर्भ में इस बयान को राजनीतिक और कानूनी विश्लेषक बेहद अहम मान रहे हैं।

'जरूरी नहीं कि हर बार परीक्षा लेने वाले सच्चे हों': एनएचआरसी प्रमुख

स्थापना दिवस समारोह को संबोधित करते हुए एनएचआरसी अध्यक्ष जस्टिस वी. रामासुब्रमण्यम ने न्यायिक पद की चुनौतियों और दबावों को खुलकर रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि मुख्य न्यायाधीश का पद देश का सबसे शक्तिशाली और साथ ही सबसे संवेदनशील व दबाव वाला संस्थान है। कार्यक्रम में सीजेआई सूर्यकांत की उपस्थिति पर आभार जताते हुए उन्होंने कहा कि ऐसे समय में जब प्रधान न्यायाधीश बहुत व्यस्त हैं और चारों तरफ से उनकी भारी मांग है, हमारे निमंत्रण को स्वीकार करना वास्तव में उल्लेखनीय है। एनएचआरसी प्रमुख ने हल्के-फुल्के अंदाज में यह भी जोड़ा कि अगर मौका मिले, तो शायद मुख्य न्यायाधीश यहां रुकना भी पसंद करेंगे। हालांकि, उन्होंने 'अग्निपरीक्षा लेने वालों' को लेकर अपनी टिप्पणी पर कोई सीधा राजनीतिक स्पष्टीकरण नहीं दिया, लेकिन सभागार में मौजूद गणमान्य व्यक्तियों और स्वयं सीजेआई ने इस टिप्पणी पर सहज मुस्कान के साथ प्रतिक्रिया दी।

विपक्ष के सुप्रीम कोर्ट मार्च और सियासी तनातनी के बीच आया बयान

एनएचआरसी प्रमुख का यह बयान ऐसे नाजुक वक्त पर सामने आया है जब कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में 'इंडिया' गठबंधन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और 'वोट चोरी' के आरोपों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे पर दस्तक दे रहा है। इससे पहले सीजेआई सूर्यकांत ने विपक्षी नेताओं को पत्र लिखकर स्पष्ट किया था कि विचाराधीन मामलों में प्रशासनिक मुलाकात करना संविधान के 'शक्तियों के पृथक्करण' के सिद्धांत के खिलाफ होगा और नेताओं को ज्ञापन देने के बजाय अनुच्छेद 32 के तहत न्यायिक याचिका दाखिल करनी चाहिए। सीजेआई के इस कड़े रुख के बाद दिल्ली की सड़कों पर विपक्षी सांसदों और कार्यकर्ताओं का भारी प्रदर्शन देखने को मिला। इसी सियासी हलचल की पृष्ठभूमि में एनएचआरसी चीफ द्वारा 'अग्निपरीक्षा' का जिक्र करना न्यायपालिका पर बढ़ते राजनीतिक और सार्वजनिक दबाव की ओर सीधा इशारा माना जा रहा है।

मानवाधिकार आयोग के 33 साल और बदलती वैश्विक चुनौतियां

जस्टिस वी. रामासुब्रमण्यम ने याद दिलाया कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की स्थापना ठीक 33 वर्ष पहले 12 अक्टूबर 1993 को की गई थी। अपने तीन दशकों से अधिक के सफर में आयोग ने देश के नागरिकों के मानवाधिकारों की रक्षा और उन्हें सशक्त बनाने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई है। उन्होंने अपने संबोधन में इस बात पर जोर दिया कि अब मानवाधिकारों का दायरा पारंपरिक चौखटों से कहीं आगे बढ़ चुका है। कुछ दशक पहले तक मानवाधिकारों को केवल नागरिक बनाम राज्य (Citizen vs State) के रूप में देखा जाता था, लेकिन डिजिटल क्रांति के बाद अब गैर-सरकारी ताकतों और डिजिटल मैनिपुलेशन (डिजिटल हेरफेर) की भूमिका बहुत बढ़ गई है। उन्होंने आगाह किया कि डिजिटल दुष्प्रचार, जलवायु परिवर्तन और बढ़ती असमानता जैसे नए खतरे मानवाधिकारों के सामने नई चुनौतियां पेश कर रहे हैं, जिससे निपटने के लिए सभी संवैधानिक संस्थाओं को खुद को नए सिरे से तैयार करना होगा।

संस्थागत स्वतंत्रता और न्यायिक गरिमा पर विश्लेषकों का नजरिया

कानूनी जानकारों का मानना है कि एनएचआरसी प्रमुख का यह वक्तव्य केवल एक औपचारिक भाषण नहीं, बल्कि देश की सर्वोच्च अदालत की साख और स्वतंत्रता को रेखांकित करने वाला संदेश है। वर्तमान दौर में जब भी कोई बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा होता है, तो विभिन्न राजनीतिक खेमे तुरंत न्यायपालिका की ओर रुख करते हैं और अपने अनुकूल फैसले या हस्तक्षेप की अपेक्षा रखते हैं। ऐसे माहौल में किसी भी मुख्य न्यायाधीश के लिए संवैधानिक मर्यादा, तटस्थता और न्यायिक निष्पक्षता को बनाए रखना वास्तव में हर दिन और हर मिनट एक कठिन इम्तिहान साबित होता है। सीजेआई सूर्यकांत द्वारा संवैधानिक मर्यादा का पालन करते हुए राजनीतिक दबाव से खुद को अलग रखने और कानूनी प्रक्रिया पर जोर देने के कदम को न्यायिक हलकों में मजबूत नेतृत्व के तौर पर देखा जा रहा है।