ये दो मुख्य कारण देश के करोड़ों युवाओं का भविष्य कर रहे हैं बर्बाद, जानिए पूरी सच्चाई

ये दो मुख्य कारण देश के करोड़ों युवाओं का भविष्य कर रहे हैं बर्बाद, जानिए पूरी सच्चाई

देश के सबसे बड़े युवा वर्ग और छात्रों के सपनों को हर साल चकनाचूर करने वाली प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक की बीमारी आज एक ऐसे नासूर का रूप ले चुकी है, जिसने पूरी शिक्षा व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है। दिन-रात मेहनत करने वाले लाखों मेधावी छात्र जब परीक्षा हॉल में पहुंचते हैं और उससे ठीक पहले पेपर आउट होने की खबर सामने आती है, तो उनके और उनके परिवार के वर्षों के अरमान पलभर में पानी में मिल जाते हैं। इस काले और भ्रष्ट बाजार का मकड़जाल इतना गहरा हो चुका है कि हर बार कड़े कानूनों के दावों के बावजूद यह नेटवर्क नए तरीकों से सक्रिय हो जाता है। आखिर इस नापाक पेपर लीक के बाजार को बार-बार बढ़ावा क्यों मिल रहा है, इसके पीछे कौन सी ऐसी ताकतें और कमियां हैं जो इस धंधे को फलने-फूलने का मौका दे रही हैं, इसे गहराई से समझना अब देश की सबसे बड़ी जरूरत बन चुका है।

पहला बड़ा कारण: परीक्षा तंत्र में अत्यधिक तकनीकी निर्भरता और सुरक्षा में लापरवाही की गंभीर चूक

पेपर लीक के इस संगठित अपराध को बढ़ावा मिलने का सबसे पहला और मुख्य कारण हमारी चयन परीक्षाओं को आयोजित कराने वाले तंत्र की पुरानी और कमजोर कार्यप्रणाली है। आज के इस डिजिटल और हाई-टेक युग में जहां हर काम ऑनलाइन और सुरक्षित माध्यमों से हो सकता है, वहीं देश के कई हिस्सों में आज भी प्रश्नपत्रों के मुद्रण यानी प्रिंटिंग से लेकर परीक्षा केंद्रों तक उनके भौतिक परिवहन के लिए पुराने और संदेहास्पद तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है। कई प्रिंटिंग प्रेस और कूरियर एजेंसियों की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता का भारी अभाव होता है, जहां मामूली लालच या मिलीभगत के कारण गोपनीय दस्तावेज आसानी से लीक हो जाते हैं। इसके अलावा, परीक्षा केंद्रों पर बायोमेट्रिक सत्यापन, सीसीटीवी निगरानी और जैमर जैसी आधुनिक तकनीकों का पूर्ण और सख्त पालन न होना भी इन माफियाओं के लिए खुला मैदान तैयार कर देता है, जिससे वे आसानी से अपनी साजिशों को अंजाम देने में सफल हो जाते हैं।

दूसरा बड़ा कारण: संगठित माफियाओं और कोचिंग माफिया गठजोड़ को मिलने वाला राजनीतिक व प्रशासनिक संरक्षण

इस काले कारोबार के फलने-फूलने का दूसरा सबसे बड़ा और खतरनाक कारण वह ताकतवर सांठगांठ है जो अपराधियों, कुछ भ्रष्ट प्रशासनिक अधिकारियों और अनैतिक कोचिंग संस्थानों के बीच गुप्त रूप से काम करती है। आज के समय में प्रतियोगी परीक्षाओं का बाजार अरबों-खरबों रुपए का एक बहुत बड़ा कमर्शियल कारोबार बन चुका है, जहां कुछ लालची लोग छात्रों की मजबूरी का फायदा उठाकर शॉर्टकट से सफलता दिलाने के नाम पर करोड़ों रुपए वसूलते हैं। जब इन पेपर लीक कराने वाले सिंडिकेट्स के तार ऊंचे पदों पर बैठे लोगों या स्थानीय राजनीतिक सरपरस्तों से जुड़ जाते हैं, तो उन पर होने वाली कार्रवाई कमजोर पड़ जाती है या मामले की फाइलें फाइलों में ही दफ्तरों के चक्कर काटती रह जाती हैं। सजा का डर कम होने और भ्रष्टाचार की जड़ें मजबूत होने के कारण नए-नए अपराधी इस धंधे में कूद पड़ते हैं, क्योंकि वे अच्छी तरह जानते हैं कि कुछ समय के हंगामे के बाद वे इस दलदल से आसानी से बाहर निकल आएंगे।

युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ रोकने के लिए कठोर दंड और संपूर्ण व्यवस्थागत सुधार की सख्त जरूरत

यदि इस देश के भविष्य यानी युवाओं को इन शातिर ठगों और पेपर लीक माफियाओं के चंगुल से बचाना है, तो केवल सतही बयानबाजी या साधारण गिरफ्तारियों से काम नहीं चलने वाला है, बल्कि एक बिल्कुल नई और अभेद्य व्यवस्था खड़ी करनी होगी। सरकार द्वारा हाल ही में लाए गए सख्त नकल विरोधी कानूनों को जमीन पर पूरी निष्पक्षता और बिना किसी राजनीतिक भेदभाव के सख्ती से लागू करना होगा, ताकि दोषियों की संपत्तियों को जब्त करने और उम्रकैद जैसी सजा का ऐसा खौफ पैदा हो सके कि कोई दोबारा ऐसी जुर्रत न कर सके। परीक्षा आयोजित करने वाली संस्थाओं की जवाबदेही तय होनी चाहिए और हर एक स्तर पर फुल-प्रूफ डिजिटल ऑडिट सिस्टम लागू किया जाना चाहिए। जब तक इस पूरे तंत्र में पारदर्शिता लाकर दोषियों को मिसाल के तौर पर कठोरतम सजा नहीं दी जाती, तब तक इस काले बाजार का सफाया करना मुमकिन नहीं होगा और देश के मेहनतकश युवाओं का यूं ही खून पसीना बहता रहेगा।