युवाओं का ब्रेन और लंग्स हो रहा है बर्बाद, जानिए कितनी खतरनाक है यह नई लत

युवाओं का ब्रेन और लंग्स हो रहा है बर्बाद, जानिए कितनी खतरनाक है यह नई लत

देश के आधुनिक और शहरी युवाओं के बीच तेजी से पैर पसार रही ई-सिगरेट और वेपिंग की लत अब स्वास्थ्य के मोर्चे पर एक बहुत बड़ा राष्ट्रीय संकट बनती जा रही है। पारंपरिक सिगरेट से तौबा करने वाले और खुद को कूल दिखाने की चाह रखने वाले युवा आज अनजाने में ही एक बेहद खतरनाक और जानलेवा जाल में फंसते चले जा रहे हैं। दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों जैसे थाईलैंड, कंबोडिया और पड़ोसी देश चीन के रास्ते तस्करी करके भारत के महानगरों से लेकर छोटे शहरों तक पहुंचाई जा रही ये फैंसी ई-सिगरेट देश की युवा पीढ़ी के फेफड़ों और मस्तिष्क को भीतर से खोखला कर रही है। हालांकि भारत सरकार ने साल 2019 में ही ई-सिगरेट के उत्पादन, आयात, बिक्री और विज्ञापन पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया था, लेकिन इसके बावजूद तस्करों और अवैध नेटवर्क के जरिए यह जहर धड़ल्ले से युवाओं तक पहुंच रहा है, जिससे माता-पिता और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की नींद उड़ी हुई है।

विदेश से तस्करी कर भारत पहुंच रहे ई-सिगरेट के आकर्षक उत्पाद और अवैध नेटवर्क का काला कारोबार

थाईलैंड के समुद्री रास्तों, कंबोडिया के बार्डर और चीन की फैक्ट्रियों में धड़ल्ले से बनने वाली रंग-बिरंगे फ्लेवर और चॉकलेट-फ्रूट की खुशबू वाली ये ई-सिगरेट दिखने में किसी खिलौने या पेन ड्राइव जैसी लगती हैं, जो आसानी से युवाओं को अपनी ओर आकर्षित कर लेती हैं। तस्करों का यह गिरोह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स, इंस्टाग्राम, स्नैपचैट और गुप्त डिलीवरी ऐप्स के जरिए कॉलेज के छात्रों और स्कूली बच्चों को निशाना बनाकर इन प्रतिबंधित उत्पादों की होम डिलीवरी कर रहा है। कानून प्रवर्तन एजेंसियों और कस्टम विभाग की तमाम सख्ती के बावजूद ये अवैध कंसाइनमेंट कूरियर और पार्सल के जरिए देश के कोने-कोने तक पहुंच रहे हैं। इन विदेशी उत्पादों में निकोटीन की मात्रा इतनी खतरनाक हद तक ज्यादा होती है कि एक बार इसका सेवन शुरू करने वाला युवा बहुत कम समय में ही इसका गंभीर रूप से आदी हो जाता है और चाहकर भी इस बुरी लत से बाहर नहीं निकल पाता है।

ब्रेन और लंग्स पर सीधा हमला: कैसे शरीर के अंगों को अंदर से गला रही है वेपिंग की यह जानलेवा आदत

चिकित्सा विज्ञान और शोधकर्ताओं ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि ई-सिगरेट को सिगरेट का सुरक्षित विकल्प मानना सबसे बड़ा भ्रम है, क्योंकि इसमें तंबाकू का धुआं भले ही न हो, लेकिन खतरनाक केमिकल और लिक्विड निकोटीन का एरोसोल होता है। जब युवा इसे फेफड़ों के भीतर खींचते हैं, तो इसके जहरीले रसायन फेफड़ों की नाजुक कोशिकाओं को स्थाई रूप से नुकसान पहुंचाते हैं, जिससे क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस, अस्थमा और फेफड़ों के कैंसर जैसी भयानक बीमारियां बेहद कम उम्र में ही घेर लेती हैं। इसके अलावा, इसका सबसे बुरा प्रभाव मानव मस्तिष्क यानी ब्रेन के विकास पर पड़ता है, खासकर किशोरों और युवाओं का दिमाग जो अभी विकसित हो रहा होता है, निकोटीन के लगातार संपर्क में आने से उनकी याददाश्त, एकाग्रता और निर्णय लेने की क्षमता बुरी तरह प्रभावित होने लगती है। कई मामलों में अत्यधिक वेपिंग के कारण युवाओं को गंभीर मानसिक तनाव, एंग्जायटी और डिप्रेशन जैसी समस्याओं का भी सामना करना पड़ रहा है, जो उनके भविष्य को पूरी तरह अंधकारमय बना रहा है।

माता-पिता की अनदेखी और समाज की सामूहिक जिम्मेदारी से ही रुकेगा इस नए नशे का खतरनाक प्रसार

आज के इस दौर में जहां बच्चे अपनी जेब खर्च से ऑनलाइन पेमेंट करके आसानी से इन अवैध उत्पादों को मंगा रहे हैं, वहां परिवारों और अभिभावकों की भूमिका सबसे अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। माता-पिता को अपने बच्चों के व्यवहार में आने वाले बदलावों, अजीब सी सुगंध और उनकी ऑनलाइन गतिविधियों पर पैनी नजर रखनी होगी ताकि समय रहते उन्हें इस जहर से बचाया जा सके। प्रशासन और पुलिस को भी केवल छोटे तस्करों को पकड़ने के बजाय इस अवैध सप्लाई चेन के मास्टरमाइंड्स तक पहुंचना होगा और स्कूलों तथा कॉलेजों के बाहर विशेष निगरानी अभियान चलाने होंगे। देश का युवा वर्ग ही राष्ट्र की असली पूंजी है, और अगर यह पीढ़ी इस विदेशी ई-सिगरेट के जाल में फंसकर अंदर से खोखली हो गई, तो देश का भविष्य खतरे में पड़ जाएगा। इसलिए यह समय सिर्फ कानून बनाने का नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग को मिलकर इस घातक नशे के खिलाफ एक बड़ा जनआंदोलन खड़ा करने का है।