मैथिली ठाकुर ने गाया 'धामी रे... धाकड़ धामी रे', कुमाऊं द्वार महोत्सव में गीतों पर झूम उठे लोग
देवभूमि उत्तराखंड की सांस्कृतिक राजधानी माने जाने वाले हलद्वानी के लालकुआं स्थित 'कुमाऊं द्वार महोत्सव' में रविवार की शाम एक बेहद अलौकिक और यादगार सांस्कृतिक महासंगम की गवाह बनी। मशहूर लोक एवं शास्त्रीय गायिका मैथिली ठाकुर ने जब अपनी सुरीली आवाज में देवभूमि की संस्कृति और प्रदेश के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के कार्यों को समर्पित विशेष गीत 'धामी रे... धाकड़ धामी रे' का गायन शुरू किया, तो पूरा पंडाल तालियों की गड़गड़ाहट और उत्साह से गूंज उठा। मंच पर मौजूद अतिथियों से लेकर सामने बैठी हजारों की संख्या में जनता मैथिली ठाकुर के इस ऊर्जावान और लोकगीतों से सजे सुरम्य गायन पर खुद को झूमने से नहीं रोक पाई। इस भव्य महोत्सव ने न केवल उत्तराखंड की समृद्ध लोक संस्कृति और परंपराओं का जश्न मनाया, बल्कि कुमाऊं और गढ़वाल के सांस्कृतिक सेतु को भी एक नया आयाम दिया।
कुमाऊं द्वार महोत्सव में मैथिली ठाकुर के सुरम्य गीतों का चला जादू, लालकुआं में उमड़ा जनसैलाब
हलद्वानी के लालकुआं क्षेत्र में आयोजित 'कुमाऊं द्वार महोत्सव' के मुख्य सांस्कृतिक संध्या में सुप्रसिद्ध लोक गायिका मैथिली ठाकुर को सुनने के लिए दोपहर से ही लोगों की भारी भीड़ जुटने लगी थी। जैसे ही मैथिली ठाकुर ने अपने भाइयों ऋषव और अयाची के साथ पारंपरिक परिधानों में सुसज्जित होकर मंच संभाला, दर्शकों ने करतल ध्वनि से उनका स्वागत किया। मैथिली ने अपने गायन की शुरुआत पारंपरिक गणेश वंदना और पहाड़ी लोक वंदना से की, जिसने पूरे माहौल को आध्यात्मिक और भक्तिमय बना दिया। इसके बाद जब उन्होंने उत्तराखंड के सुप्रसिद्ध पारंपरिक लोकगीतों 'बेड़ू पाको बारह मासा' और 'न्यौली' की प्रस्तुति दी, तो कुमाऊं के कोने-कोने से आए दर्शक अपनी जगहों पर खड़े होकर नाचने लगे। मैथिली की बहुभाषी प्रतिभा और पहाड़ी बोली के प्रति उनके अद्भुत लगाव ने स्थानीय निवासियों का दिल जीत लिया।
'धामी रे... धाकड़ धामी रे' के बोल पर गूंजा पंडाल, मुख्यमंत्री के विकास कार्यों की हुई सराहना
कार्यक्रम का सबसे मुख्य और आकर्षण का केंद्र वह क्षण रहा जब मैथिली ठाकुर ने मंच से विशेष रूप से तैयार किया गया गीत 'धामी रे... धाकड़ धामी रे' गाना शुरू किया। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के साहसिक निर्णयों, जन-कल्याणकारी योजनाओं और 'धाकड़ धामी' की जन-प्रिय छवि पर आधारित इस गीत के बोल इतने प्रभावी और लयबद्ध थे कि पूरा महोत्सव स्थल देशभक्ति और क्षेत्रीय गौरव के अहसास से सराबोर हो गया। मैथिली ठाकुर ने गीत के माध्यम से देवभूमि के विकास, सुरक्षा और सांस्कृतिक संरक्षण के लिए राज्य सरकार द्वारा उठाए गए कदमों को रेखांकित किया। मंच पर मौजूद जनप्रतिनिधियों, प्रशासनिक अधिकारियों और स्थानीय गणमान्य व्यक्तियों ने मैथिली ठाकुर के इस शानदार और भावुक गायन की मुक्तकंठ से प्रशंसा की।
देवभूमि की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और लोक कलाओं के संरक्षण का बना नया मंच
कुमाऊं द्वार महोत्सव केवल एक मनोरंजन का साधन मात्र नहीं रहा, बल्कि इसने उत्तराखंड की विलुप्त होती लोक कलाओं, हस्तशिल्प और खान-पान को बढ़ावा देने में बड़ी भूमिका निभाई है। महोत्सव समिति द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य नई पीढ़ी को अपनी जड़ों, पारंपरिक परिधानों और लोक संगीत से जोड़ना है। मैथिली ठाकुर ने भी अपने संबोधन में कहा कि देवभूमि उत्तराखंड की पावन धारा में गायन करना उनके लिए किसी सौभाग्य से कम नहीं है। उन्होंने युवाओं से अपनी क्षेत्रीय बोलियों—कुमाऊंनी, गढ़वाली और जौनसारी का सम्मान करने और लोक कलाओं को जीवित रखने का आह्वान किया। महोत्सव में लगाए गए स्थानीय व्यंजनों और हस्तशिल्प के स्टॉलों पर भी लोगों की भारी चहल-पहल देखी गई, जिससे स्थानीय कारीगरों को भी बड़ा प्रोत्साहन मिला।
ऐतिहासिक सांस्कृतिक शाम का समापन, जनता के दिलों पर छाई मैथिली ठाकुर की सादगी
देर रात तक चले इस भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम का समापन दर्शकों की पुरजोर मांग और तालियों की गूंज के साथ हुआ। मैथिली ठाकुर और उनकी टीम को आयोजकों द्वारा पहाड़ी टोपी, अँगवस्त्रम और स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया गया। लालकुआं और आसपास के क्षेत्रों से आए हजारों लोगों के लिए यह शाम ताउम्र याद रहने वाला अनुभव बन गई। महोत्सव के समापन के बाद भी लोगों की जुबान पर मैथिली ठाकुर का गाया 'धामी रे... धाकड़ धामी रे' गीत चढ़ा रहा। इस सफल आयोजन ने यह साबित कर दिया कि जब लोक संगीत में आधुनिकता और अपनी जड़ों का सही समावेश होता है, तो वह हर दिल को छू लेता है और क्षेत्र में सांस्कृतिक चेतना का एक नया संचार करता है।