'मक्का पैक्ट' में शामिल होने के लिए 'दुश्मन' ईरान को न्योता, क्या हूतियों पर लगाम कसने के लिए सऊदी अरब ने चली बड़ी कूटनीतिक चाल?

'मक्का पैक्ट' में शामिल होने के लिए 'दुश्मन' ईरान को न्योता, क्या हूतियों पर लगाम कसने के लिए सऊदी अरब ने चली बड़ी कूटनीतिक चाल?

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों से इस वक्त की सबसे बड़ी खबर सामने आ रही है कि पश्चिम एशिया के सुरक्षा समीकरणों को पूरी तरह से बदलकर रख देने वाले 'मक्का ज्वॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट' (मक्का पैक्ट) में शामिल होने के लिए ईरान को औपचारिक निमंत्रण मिला है। लेबनान के मीडिया आउटलेट 'अल-मायदीन' और ईरानी संसद से जुड़ी समाचार एजेंसी के प्रमुख मेहदी रहीमी के हवाले से यह दावा किया गया है कि सऊदी अरब, तुर्किए और पाकिस्तान के बीच हुए इस सैन्य समझौते का हिस्सा बनने के लिए तेहरान को न्योता भेजा गया है। हालांकि इस प्रस्ताव पर अभी तक किसी भी देश की सरकारों की ओर से आधिकारिक रूप से मुहर नहीं लगाई गई है, लेकिन इस खबर के सामने आते ही वैश्विक रणनीतिकारों के कान खड़े हो गए हैं। पारंपरिक रूप से एक-दूसरे के धुर विरोधी माने जाने वाले देशों के बीच इस तरह की सुगबुगाहट ने दुनिया भर के डिफेंस एनालिस्ट्स को नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया है।

क्या है बहुचर्चित 'मक्का पैक्ट' और इसके नियम?

कुछ समय पहले ही सऊदी अरब के पवित्र शहर मक्का में सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने मिलकर ऐतिहासिक 'मक्का संयुक्त रक्षा समझौते' पर हस्ताक्षर किए थे। इस trilateral डिफेंस पैक्ट की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे ठीक अमेरिकी नेतृत्व वाले नाटो (NATO) संगठन के अनुच्छेद-5 की तर्ज पर तैयार किया गया है। इस समझौते के मुताबिक, यदि तीनों में से किसी भी एक देश पर कोई भी बाहरी सशस्त्र हमला होता है, तो उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा और तीनों मिलकर उसका जवाब देंगे। इस ब्लॉक में सऊदी अरब वित्तीय तौर पर मदद और फंडिंग की भूमिका में है, तुर्किए आधुनिक डिफेंस टेक्नोलॉजी और उपकरण मुहैया कराता है, जबकि पाकिस्तान फ्रंटलाइन पर सैन्य जनशक्ति प्रदान करने की कमान संभालता है। ऐसे मजबूत सुरक्षा कवच में अब ईरान जैसे क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी को जोड़ने की चर्चा अपने आप में एक बड़ा भू-राजनीतिक बदलाव है।

हूती विद्रोहियों और क्षेत्रीय सुरक्षा पर लगाम कसने की सुनियोजित रणनीति

विश्लेषकों का मानना है कि यदि सऊदी अरब और उसके सहयोगियों ने अपने पारंपरिक 'दुश्मन' माने जाने वाले ईरान को इस समझौते में शामिल होने का विकल्प दिया है, तो इसके पीछे बहुत बड़ा कूटनीतिक गणित काम कर रहा है। यमन के रास्ते सऊदी हितों को लगातार निशाना बनाने वाले ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों की गतिविधियों पर लगाम कसना रियाद की एक बड़ी प्राथमिकता रही है। मध्य पूर्व में चल रहे तनाव और अस्थिरता के बीच खाड़ी देशों के ऊर्जा मार्गों और तेल रिफाइनरियों को सुरक्षित रखना सऊदी अरब के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बना हुआ है। यदि ईरान इस सुरक्षा ढांचे का हिस्सा बनता है, तो प्रॉक्सी युद्धों और क्षेत्रीय अशांति पर काफी हद तक अंकुश लगाया जा सकता है। ईरानी संसद के अंदर से आ रहे बयानों के मुताबिक, वे इस प्रस्ताव का सकारात्मक मूल्यांकन कर रहे हैं क्योंकि तेहरान भी हमेशा से क्षेत्रीय देशों द्वारा ही आपसी सहयोग से सुरक्षा तंत्र विकसित करने की वकालत करता रहा है।

वैश्विक कूटनीति पर असर और भारत की बढ़ती चिंताएं

इस पूरे घटनाक्रम पर दुनिया भर की बड़ी ताकतों की पैनी नजर बनी हुई है। एक तरफ जहां अमेरिकी नेतृत्व ने इस तरह के क्षेत्रीय समझौतों को पश्चिम एशिया की स्थिरता के लिए शुरुआती कदम बताया है, वहीं भारत जैसी क्षेत्रीय ताकतों के लिए यह रणनीतिक रूप से चिंता का विषय बन सकता है। चूंकि इस पैक्ट में पाकिस्तान एक मुख्य सैन्य साझीदार के रूप में शामिल है, ऐसे में पश्चिम एशिया के तमाम बड़े मुस्लिम बहुसंख्यक देश यदि एक बड़े रक्षा मंच पर एकजुट होते हैं, तो एशियाई भू-राजनीति में संतुलन बदल सकता है। ईरानी अधिकारियों का कहना है कि प्रस्ताव अभी शुरुआती विचारणीय दौर में है, लेकिन आने वाले दिनों में यदि तेहरान इस मक्का डिफेंस पैक्ट में शामिल होता है, तो यह मिडिल ईस्ट के इतिहास का सबसे बड़ा कूटनीतिक उलटफेर साबित होगा।