एलन मस्क और ट्रंप की नीतियों पर फरीद जकारिया का तीखा हमला
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के पटल पर इन दिनों अमेरिका और भारत के रिश्तों को लेकर एक बहुत बड़ी और गंभीर चर्चा छिड़ गई है। जाने-माने वैश्विक मामलों के विशेषज्ञ और पत्रकार फरीद जकारिया ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन की विदेश नीतियों पर कड़ा प्रहार किया है। जकारिया का मानना है कि ट्रंप प्रशासन के दौरान लिए गए कुछ अचानक और आक्रामक फैसलों के कारण भारत का अमेरिका पर से ऐतिहासिक भरोसा तेजी से टूट रहा है। आधुनिक भू-राजनीति में वाशिंगटन और नई दिल्ली के बीच के समीकरणों में आ रहे इस भारी बदलाव ने दुनिया भर के रणनीतिकारों को चौंका दिया है। एक तरफ जहाँ अमेरिकी तकनीकी दिग्गज और अरबपति एलन मस्क के व्यावसायिक व तकनीकी दखल को लेकर भारत में बहस छिड़ी है, वहीं दूसरी ओर अमेरिकी नीतियों में पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व जैसे कि फील्ड मार्शल या जनरलों के प्रति बदलते नरम रुख ने भारत की चिंता बढ़ा दी है। इस पूरे घटनाक्रम ने भारत और अमेरिका की दोस्ती की बुनियाद पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है।
ट्रंप प्रशासन की नीतियां और भारत-अमेरिका रिश्तों में बढ़ता अतंराल
पिछले कुछ दशकों से लगातार यह कोशिश की जा रही थी कि भारत और अमेरिका मिलकर एशिया प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता और संतुलन बनाए रखें। डेमोक्रेट से लेकर रिपब्लिकन शासन तक, दोनों देशों ने द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने के लिए कई बड़े समझौते किए थे। लेकिन फरीद जकारिया का यह तर्क है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दोबारा सत्ता में लौटने के बाद जिस तरह के अप्रत्याशित और कड़े आर्थिक व कूटनीतिक कदम उठाए गए हैं, उसने ढाई दशकों की मेहनत पर पानी फेर दिया है। भारत जैसे स्वतंत्र और संप्रभु देश पर अचानक अनुचित दबाव बनाना और व्यापारिक मोर्चे पर भारी शुल्क (टैरिफ) थोपना इस बात का प्रमाण है कि अमेरिका अपने साझीदारों को बराबरी का दर्जा देने के बजाय एकतरफा शर्तें थोपना चाहता है। इस तरह के अड़ियल रवैये से भारतीय नीति निर्माताओं के मन में यह आशंका घर कर गई है कि कठिन समय में अमेरिका एक भरोसेमंद और स्थाई रणनीतिक साझीदार साबित नहीं हो सकता।
एलन मस्क का बढ़ता प्रभाव और तकनीकी संप्रभुता पर छिड़ी राष्ट्रीय बहस
इस पूरे कूटनीतिक तनाव के बीच तकनीकी टाइकून एलन मस्क की भूमिका और उनके प्रोजेक्ट्स को लेकर भी भारत में तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। उपग्रह संचार यानी सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं और अन्य आधुनिक तकनीकी क्षेत्रों में मस्क के बढ़ते प्रभाव को भारत के घरेलू बाजार और राष्ट्रीय सुरक्षा के चश्मे से देखा जा रहा है। जब वैश्विक स्तर पर तकनीक और भू-राजनीति आपस में उलझती हैं, तब किसी भी देश के लिए अपनी डिजिटल और आर्थिक संप्रभुता सर्वोपरि हो जाती है। फरीद जकारिया के विश्लेषणों में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि अमेरिकी नेता और बड़े उद्योगपति किस तरह वैश्विक दक्षिण (ग्लोबल साउथ) के देशों की प्राथमिकताओं को दरकिनार कर अपने निजी और व्यावसायिक हितों को साधने में लगे हैं। भारत जैसे विशाल लोकतंत्र ने हमेशा अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को प्राथमिकता दी है, और यही वजह है कि बाहरी दबावों के आगे झुकने के बजाय देशहित को सबसे ऊपर रखा जा रहा है।
पाकिस्तान के सैन्य समीकरण और वाशिंगटन के बदलते रुख से उपजी नाराजगी
अमेरिकी कूटनीति का एक और पहलू जो नई दिल्ली को सबसे ज्यादा खल रहा है, वह है पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व और वहां की व्यवस्था के प्रति अमेरिका का बार-बार बदलता लाड़-प्यार। पाकिस्तानी सेना के शीर्ष अधिकारियों और वहां के रणनीतिक हलकों के साथ वाशिंगटन की अंदरूनी वार्ताओं ने भारतीय सुरक्षा तंत्र को सतर्क कर दिया है। आतंकवाद और क्षेत्रीय अस्थिरता के मुख्य केंद्र रहे पाकिस्तान को एक बार फिर से अमेरिकी कूटनीति में तवज्जो मिलना भारत के लिए कतई स्वीकार्य नहीं हो सकता। जकारिया ने अपने संबोधन में इसी विसंगति की ओर इशारा किया है कि कैसे अमेरिका अपनी तात्कालिक राजनीतिक या सामरिक मजबूरियों के चलते दक्षिण एशिया के उन बुनियादी सत्यों को नजरअंदाज कर रहा है, जो भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सबसे संवेदनशील हैं।
रणनीतिक स्वायत्तता और भारत का भविष्य का कूटनीतिक मार्ग
फरीद जकारिया की इस टिप्पणी और वैश्विक विश्लेषकों के आकलन से यह पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है कि अब अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कोई भी देश अंधभक्ति या एकतरफा भरोसे के सहारे आगे नहीं बढ़ने वाला है। भारत ने अपनी स्वतंत्र विदेश नीति के दम पर यह साबित कर दिया है कि वह अपनी शर्तों पर दुनिया के हर बड़े देश के साथ संबंध रखता है। चाहे रूस से ऊर्जा सुरक्षा का मामला हो या फिर अपने घरेलू उद्योगों और डेटा संप्रभुता की रक्षा का सवाल हो, भारत ने हर मोर्चे पर राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि रखा है। अमेरिका के साथ रिश्तों में आई यह खटास भले ही कुछ समय के लिए कूटनीतिक हलचल पैदा कर रही हो, लेकिन यह भारत के एक मजबूत, आत्मनिर्भर और वैश्विक महाशक्ति के रूप में उभरने का भी संदेश देती है, जो किसी भी बाहरी दबाव या महाशक्ति के इशारे पर अपनी चाल तय नहीं करेगा।