ऑपरेशन सिंदूर' के बाद पहली बार पाकिस्तान की धरती पर उतरा भारतीय दल

ऑपरेशन सिंदूर' के बाद पहली बार पाकिस्तान की धरती पर उतरा भारतीय दल

भारत और पाकिस्तान के बीच दशकों से चली आ रही तल्खी और कूटनीतिक शीतयुद्ध के बीच एक ऐसी चौंकाने वाली घटना घटी है जिसने दुनिया भर के रक्षा विशेषज्ञों और राजनीतिक विश्लेषकों को गहरी सोच में डाल दिया है। सामरिक रूप से बेहद संवेदनशील और कड़े सैन्य अभियानों के प्रतीक बन चुके बहुचर्चित 'ऑपरेशन सिंदूर' के बाद यह पहला ऐसा मौका है जब आधिकारिक रूप से एक भारतीय प्रतिनिधिमंडल या दल ने पाकिस्तान की धरती पर कदम रखा है। सदियों से एक-दूसरे के धुर विरोधी माने जाने वाले इन दोनों पड़ोसी देशों के बीच अचानक हुए इस हाई-प्रोफाइल दौरे के बाद से कूटनीतिक गलियारों में अटकलों का बाजार गर्म हो गया है। हर कोई यह जानने के लिए बेताब है कि क्या भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से जमी रिश्तों की बर्फ आखिरकार पिघलने लगी है, या फिर इस गुप्त और कड़े पहरे के बीच द्विपक्षीय संबंधों को लेकर कोई नया कूटनीतिक खेल खेला जा रहा है। ऐतिहासिक रूप से तल्ख रहे इन रिश्तों के बीच इस यात्रा ने दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में एक नया भूचाल ला दिया है, जिसके दूरगामी परिणाम आने वाले समय में देखने को मिल सकते हैं।

क्या है 'ऑपरेशन सिंदूर' और इसका सामरिक महत्व

दोनों देशों के बीच हालिया सैन्य और रणनीतिक इतिहास में 'ऑपरेशन सिंदूर' एक ऐसा अध्याय रहा है जिसने भारत की सैन्य ताकत, अचूक गुप्तचर क्षमताओं और आतंकवाद के खिलाफ शून्य सहिष्णुता (Zero Tolerance) की नीति को पूरी दुनिया के सामने मजबूती से स्थापित किया था। इस अभियान के बाद से भारत ने सीमा पार से होने वाली हर नापाक हरकत का मुंहतोड़ जवाब देने की अपनी नीति को और अधिक आक्रामक बना लिया था, जिसके चलते दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संवाद के सारे दरवाजे लगभग बंद हो चुके थे। उच्च स्तरीय राजनीतिक और राजनयिक बैठकों पर पूरी तरह रोक लगी हुई थी और दोनों तरफ से केवल जुबानी जंग और सैन्य सतर्कता ही मुख्य बात रह गई थी। ऐसे माहौल में अचानक से भारतीय दल का पाकिस्तान की सीमा के भीतर प्रवेश करना किसी बड़े चमत्कार से कम नहीं माना जा रहा है। विश्लेषक यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर ऐसी कौन सी मजबूरी या कूटनीतिक आवश्यकता आन पड़ी है कि भारत को अपनी पारंपरिक कठोर नीति से इतर इस प्रकार का कदम उठाना पड़ा है।

द्विपक्षीय रिश्तों की मौजूदा स्थिति और अचानक हुए इस दौरे के मायने

भारत और पाकिस्तान के आपसी संबंधों की बात करें तो अनुच्छेद 370 के खात्मे, आतंकवाद के लगातार प्रायोजन और सिंधु जल संधि जैसे मुद्दों पर दोनों देशों के बीच खाई इतनी चौड़ी हो चुकी थी कि सामान्य बातचीत की गुंजाइश लगभग खत्म हो चुकी थी। पाकिस्तान की चरमराती अर्थव्यवस्था, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के कर्ज के मोहताज हालात और आंतरिक राजनीतिक उठापटक के बीच वहां की सरकार लगातार भारत के साथ किसी न किसी माध्यम से संवाद बहाल करने की जुगत में लगी रहती है। हालांकि, नई दिल्ली का रुख हमेशा से यह स्पष्ट रहा है कि 'आतंक और बातचीत एक साथ नहीं चल सकते'। ऐसे में यह सवाल सबसे बड़ा बन जाता है कि क्या यह भारतीय दल किसी द्विपक्षीय राजनीतिक वार्ता का हिस्सा है, या फिर यह सिंधु जल आयोग, राजनयिक शिष्टाचार, तकनीकी निरीक्षण या किसी बहुपक्षीय अंतरराष्ट्रीय समझौते के तहत उठाया गया एक अनिवार्य प्रशासनिक कदम है। जानकारों का मानना है कि इस तरह के दौरों को तुरंत दोस्ती की शुरुआत या 'रिश्तों के पिघलने' के रूप में देखना जल्दबाजी होगी, क्योंकि पाकिस्तान के फितूर और उसकी सेना के दोहरे चरित्र से भारत अच्छी तरह वाकिफ है।

पर्दे के पीछे का कूटनीतिक खेल और वैश्विक दबाव की भूमिका

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कोई भी कदम बिना किसी ठोस कारण या भू-राजनीतिक दबाव के नहीं उठाया जाता है। अमेरिका, पश्चिम एशिया और मध्य एशियाई देशों के बदलते समीकरणों के बीच इस बात की भी चर्चा तेज हो गई है कि क्या वैश्विक महाशक्तियों के परोक्ष दबाव या क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने की मजबूरी के कारण यह यात्रा संभव हुई है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) और दक्षिण एशिया में बढ़ते तनाव के बीच भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति के तहत हर कदम बहुत ही नपेंगे-तुले अंदाज में उठाता है। यह भी संभव है कि यह दौरा पूरी तरह से तकनीकी या सीमित दायरे का हो, जिसका राजनीतिक वार्ताओं से कोई दूर-दूर तक वास्ता न हो। पाकिस्तान की मीडिया और हुक्मरान भले ही इस दौरे को अपनी कूटनीतिक जीत के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हों, लेकिन भारत के रणनीतिक हलकों में इसे लेकर पूरी तरह से गोपनीयता और सतर्कता बरती जा रही है, जिससे यह साफ होता है कि भारत अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के हितों से कभी एक इंच भी पीछे हटने वाला नहीं है।

भविष्य की दिशा और दक्षिण एशिया में शांति की उम्मीद या छलावा

नदी जल बंटवारे, क्षेत्रीय व्यापार, आवाजाही और सीमा सुरक्षा जैसे अनगिनत अनसुलझे मुद्दों के बीच भारत और पाकिस्तान के रिश्ते हमेशा से एक बारूद के ढेर पर बैठे रहे हैं। 'ऑपरेशन सिंदूर' के बाद पाकिस्तान की धरती पर भारतीय दल का पहुंचना भले ही एक असाधारण घटना हो, लेकिन यह इस बात की गारंटी बिल्कुल नहीं है कि दोनों देशों के बीच स्थायी शांति का दौर शुरू हो चुका है। जब तक पाकिस्तान अपनी सरजमीं से भारत के खिलाफ चल रहे आतंकवादी ढांचों को पूरी तरह नेस्तनाबूद नहीं करता और भारत विरोधी गतिविधियों को संरक्षण देना बंद नहीं करता, तब तक किसी भी बड़े बदलाव की उम्मीद करना बेमानी होगा। देश की जनता और कूटनीतिक मामलों के जानकार इस बात पर पैनी नजर बनाए हुए हैं कि इस दौरे के बाद दोनों सरकारों की तरफ से क्या आधिकारिक बयान सामने आते हैं। आने वाले हफ्तों में यह साफ हो जाएगा कि यह यात्रा महज एक प्रशासनिक औपचारिकता थी या फिर दक्षिण एशिया की राजनीति में किसी बड़े बदलाव का छिपा हुआ संकेत।