पोलैंड में संविधान पीठ पर नियंत्रण को लेकर भीषण संग्राम

पोलैंड में संविधान पीठ पर नियंत्रण को लेकर भीषण संग्राम

यूरोप के प्रमुख देश पोलैंड में उस समय अभूतपूर्व संवैधानिक और राजनीतिक संकट खड़ा हो गया, जब देश की सर्वोच्च अदालत (संवैधानिक ट्रिब्यूनल) के चीफ जस्टिस बोस्दान श्वेचकोवस्की (Bogdan Swieczkowski) को पद से निलंबित किए जाने की नाटकीय घोषणा हुई। इस घटनाक्रम के बाद अदालत परिसर के बाहर पुलिसकर्मियों की भारी तैनाती कर दी गई और कोर्ट प्रशासन ने इसे खुले तौर पर सरकार का 'तख्तापलट' (Coup d'état) करार दिया। इस राजनीतिक तूफान और राजधानी वारसॉ में बढ़ते तनाव को देखते हुए सेनेगल की आधिकारिक यात्रा पर जा रहे पोलैंड के राष्ट्रपति करोल नाव्रोस्की (Karol Nawrocki) को हवा में ही अपना सरकारी विमान मोड़कर आपात स्थिति में स्वदेश वापस लौटना पड़ा। राष्ट्रपति ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर स्पष्ट संदेश जारी करते हुए कहा कि ऐसे नाजुक दौर में राष्ट्रपति को देश में मौजूद रहना चाहिए।

मुख्य न्यायाधीश का निलंबन और कोर्ट परिसर में भारी पुलिस बल की तैनाती

यह पूरा घटनाक्रम उस समय शुरू हुआ जब संवैधानिक पीठ की वरिष्ठतम जज अन्ना कोरविन-पियोत्रोव्स्का ने चीफ जस्टिस बोस्दान श्वेचकोवस्की और उनके डिप्टी के निलंबन का ऐलान कर दिया। पोलैंड के न्याय मंत्री वाल्देमार ज़ुरेक के निर्देश पर न्यायपालिका की सुरक्षा का हवाला देते हुए भारी संख्या में दंगा रोधी पुलिस बल को अदालत के बाहर तैनात कर दिया गया। सरकार का आरोप था कि श्वेचकोवस्की पिछली दक्षिणपंथी सरकार (PiS) के वफादार थे और वह वर्तमान संसद द्वारा चुने गए नए न्यायाधीशों को कार्यभार संभालने से लगातार रोक रहे थे। दूसरी ओर, कोर्ट के आधिकारिक बयान में निलंबन की वैधता को खारिज करते हुए कहा गया कि न्यायपालिका पर पुलिस बल और सरकार के माध्यम से दबाव बनाना लोकतंत्र का हनन और सीधे तौर पर तख्तापलट है।

तुस्क सरकार और राष्ट्रपति के बीच चरम पर पहुंचा लंबे समय से चला आ रहा शक्ति संघर्ष

पोलैंड में यह न्यायपालिकीय गतिरोध प्रधानमंत्री डोनाल्ड तुस्क की मध्यमार्गी, यूरोपीय संघ-समर्थक सरकार और राष्ट्रपति करोल नाव्रोस्की के नेतृत्व वाले कंजर्वेटिव गुट के बीच जारी कड़े संघर्ष का परिणाम है। 2023 में सत्ता में आने के बाद प्रधानमंत्री तुस्क ने न्याय व्यवस्था में सुधार और यूरोपीय मानकों के अनुरूप स्वतंत्रता बहाल करने की कसम खाई थी। हालांकि, राष्ट्रपति नाव्रोस्की ने संसद द्वारा पारित कई सुधारों और जजों की शपथ पर वीटो का इस्तेमाल करके सरकार के प्रयासों को रोक दिया। इस निलंबन के बाद पीएम तुस्क ने सरकार के फैसले का बचाव करते हुए कहा कि कानून का शासन बहाल करने के लिए कठोर और कभी-कभी दर्दनाक फैसले लेना अनिवार्य हो जाता है।

वारसॉ की सड़कों पर विरोध प्रदर्शन और 'पुलिस स्टेट' का आरोप

जैसे ही मुख्य न्यायाधीश के निलंबन और कोर्ट परिसर के घेराव की खबर सार्वजनिक हुई, सैकड़ों विपक्षी समर्थक और नागरिक कोर्ट बिल्डिंग के बाहर एकत्र हो गए। प्रदर्शनकारियों ने प्रधानमंत्री तुस्क के खिलाफ नारेबाजी की और सरकार पर तानाशाही स्थापित करने का आरोप लगाया। विपक्षी दलों के नेताओं ने मीडिया से बात करते हुए चेतावनी दी कि न्यायपालिका पर नियंत्रण हासिल करने का यह असंवैधानिक तरीका पोलैंड को एक 'पुलिस स्टेट' (Police State) की ओर धकेल रहा है। रात भर चले इस प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पें भी देखी गईं, जिसके बाद कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया।

यूरोपीय संघ और वैश्विक बिरादरी की निगाहें पोलैंड के भावी हालात पर टिकीं

पोलैंड का यह गहराता संवैधानिक संकट केवल घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर यूरोपीय संघ (EU) के साथ उसके कूटनीतिक रिश्तों पर भी पड़ना तय है। सालों से चले आ रहे इस विवाद में ईयू की शीर्ष अदालतों ने पहले ही पोलैंड के ट्रिब्यूनल की स्वायत्तता पर सवाल उठाए थे। अब जबकि राष्ट्रपति अपने दौरे से वापस लौटकर इस लड़ाई में सीधे कूद पड़े हैं, अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि पोलैंड आने वाले दिनों में और गंभीर राजनीतिक और प्रशासनिक अनिश्चितता की चपेट में आ सकता है। 2027 के आम चुनावों से पहले सरकार और राष्ट्रपति के बीच छिड़ी यह जंग देश के संवैधानिक ढांचे की नींव हिला रही है।