अंतरिम सरकार के सलाहकार नाहिद इस्लाम ने गंगा और तीस्ता संधि पर उगला जहर
पड़ोसी देश बांग्लादेश में मचे सियासी उठापटक और सत्ता परिवर्तन के बाद से भारत के खिलाफ लगातार उगले जा रहे जहर का एक और नया और तीखा अध्याय सामने आ गया है। बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के बेहद प्रभावशाली और प्रमुख सलाहकार नाहिद इस्लाम ने एक बार फिर भारत के खिलाफ आक्रामक तेवर दिखाते हुए तीखा बयान दिया है। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा है कि यदि भारत वास्तव में बांग्लादेश के साथ दोस्ताना और मजबूत रिश्ते बनाए रखना चाहता है, तो उसे सबसे पहले गंगा और तीस्ता नदी के पानी के बंटवारे पर अपना रुख साफ करना होगा और बांग्लादेश को उसके हिस्से का पूरा पानी देना होगा। अपने इस बयान के जरिए नाहिद इस्लाम ने द्विपक्षीय संबंधों को पानी के विवाद से जोड़कर एक नया कूटनीतिक दबाव बनाने की कोशिश की है, जिससे दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे नदी जल कूटनीति के मुद्दों पर एक बार फिर भूचाल आ गया है।
गंगा और तीस्ता जल संधि पर बांग्लादेश की अंतरिम सरकार की आक्रामक मांग और पुराना राजनीतिक दांव
बांग्लादेश और भारत के बीच साझा नदियों के पानी का मुद्दा हमेशा से एक संवेदनशील विषय रहा है, जिस पर दोनों देशों के बीच कई दौर की वार्ताएं हो चुकी हैं। तीस्ता नदी के पानी के बंटवारे को लेकर पश्चिम बंगाल की भौगोलिक और राजनीतिक स्थिति के कारण भारत के भीतर भी लंबे समय से पेचीदगियां बनी हुई हैं, जिसका राजनीतिक फायदा उठाने के लिए बांग्लादेश के नेता अक्सर इस मुद्दे को तूल देते रहते हैं। नाहिद इस्लाम ने अपने ताजा बयान में इसी संवेदनशील मुद्दे को एक बार फिर हवा देते हुए आरोप लगाया है कि भारत upstream यानी ऊपरी हिस्से में होने का फायदा उठाकर बांग्लादेश के किसानों और आम जनता के अधिकारों का हनन कर रहा है। अंतरिम सरकार के आने के बाद से ढाका के रुख में आए इस कड़े बदलाव से यह साफ हो गया है कि वे द्विपक्षीय रिश्तों को सुधारने के लिए कूटनीतिक संवाद का रास्ता अपनाने के बजाय अब खुलेआम बयानबाजी और दबाव की राजनीति का सहारा ले रहे हैं, ताकि देश के भीतर अपनी राजनीतिक जमीन को मजबूत किया जा सके।
पानी की राजनीति के पीछे छिपा घरेलू राजनीतिक दबाव और सत्ता बचाने का पुराना हथकंडा
विशेषज्ञों का मानना है कि नाहिद इस्लाम और बांग्लादेश की मौजूदा अंतरिम सरकार इस समय भारी आंतरिक राजनीतिक दबाव और जनता के गुस्से का सामना कर रही है। देश में बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी और प्रशासनिक अस्थिरता से जनता का ध्यान भटकाने के लिए अक्सर भारत विरोधी बयानों को एक ढाल के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। तीस्ता और गंगा के पानी के नाम पर भारत को घेरने की यह रणनीति नई नहीं है, क्योंकि वहां की हर सरकार अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए इस राष्ट्रीय भावना से जुड़े मुद्दे को भुनाती आई है। भारत ने हमेशा से यह स्पष्ट किया है कि वह अपने पड़ोसियों के साथ पारदर्शी और न्यायसंगत संबंधों में विश्वास रखता है, लेकिन इस तरह की एकतरफा धमकियों और दबाव की भाषा से किसी भी समस्या का समाधान नहीं निकाला जा सकता है। भारत की जल नीतियां हमेशा से अपने राष्ट्रीय हितों और वैज्ञानिक आंकड़ों पर आधारित रही हैं, और किसी भी बाहरी दबाव के आगे झुककर देश के हितों से समझौता करने का सवाल ही पैदा नहीं होता है।
क्षेत्रीय स्थिरता के लिए द्विपक्षीय संवाद की अनिवार्यता और दोनों देशों के रिश्तों का भविष्य
भारत और बांग्लादेश के बीच सदियों पुराने सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और आर्थिक संबंध रहे हैं, जो किसी एक सरकार या कुछ नेताओं के बयानों से तय नहीं होते हैं। बांग्लादेश की भू-राजनीतिक स्थिति ऐसी है कि उसे अपनी सुरक्षा, व्यापार और आर्थिक प्रगति के लिए भारत के साथ सहयोग बनाए रखना ही होगा, क्योंकि अकेले अलगाव की नीति से वहां की अर्थव्यवस्था को और अधिक नुकसान उठाना पड़ेगा। नाहिद इस्लाम जैसे नेताओं की बयानबाजी से भले ही कुछ समय के लिए मीडिया की सुर्खियां बटोरी जा सकती हैं, लेकिन लंबे समय में दोनों देशों को बातचीत की मेज पर बैठकर ही तकनीकी और व्यावहारिक समाधान निकालने होंगे। भारत ने हमेशा से एक अच्छे पड़ोसी की भूमिका निभाते हुए बांग्लादेश के विकास में हरसंभव मदद की है, और अगर ढाका के नए हुक्मरान कूटनीति के बजाय उकसावे का रास्ता चुनेंगे, तो इससे अंततः दोनों देशों के आपसी हितों को ही गहरी चोट पहुंचेगी।