क्या मध्य पूर्व में बन रहा नया इस्लामिक महाशक्ति ब्लॉक

क्या मध्य पूर्व में बन रहा नया इस्लामिक महाशक्ति ब्लॉक

पश्चिम एशिया की कूटनीतिक बिसात पर एक ऐसा अभूतपूर्व और बड़ा रणनीतिक मोड़ देखने को मिल रहा है, जिसने वाशिंगटन और तेल अवीव की नींद उड़ा दी है। सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की द्वारा हस्ताक्षरित ऐतिहासिक 'मक्का रक्षा समझौते' (Mecca Joint Defense Agreement) में अब ईरान के शामिल होने या इस समूह के साथ एक मजबूत सुरक्षा समन्वय बनाने के स्पष्ट संकेत तेहरान की ओर से मिले हैं। हाल ही में तेहरान में आयोजित एक उच्चस्तरीय गोपनीय और बहुपक्षीय बैठक के दौरान क्षेत्रीय सुरक्षा ढाँचे को बाहरी हस्तक्षेप से मुक्त करने पर सहमति बनी है। एक समय पश्चिमी देशों के दबाव में ईरान को अलग-थलग करने की कोशिश करने वाले खाड़ी देश अब खुद तेहरान के साथ रक्षा और सामरिक संवाद की मेज पर हैं। यदि ईरान इस सामूहिक सुरक्षा गठबंधन के साथ औपचारिक या व्यावहारिक रूप से जुड़ता है, तो यह मध्य पूर्व में अमेरिकी सैन्य आधिपत्य और इजरायल के सुरक्षा तंत्र के लिए अब तक की सबसे बड़ी चुनौती साबित होगा।

तेहरान से आया बड़ा कूटनीतिक संकेत और मक्का समझौते का विस्तार

मक्का रक्षा समझौता, जो मूल रूप से सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच सामूहिक रक्षा (Collective Security) की शर्त पर आधारित है, मध्य पूर्व में किसी भी बाहरी हमले का मिलकर मुकाबला करने का प्रावधान रखता है। शुरुआत में इस समझौते को लेकर ईरान के रुख में सतर्कता देखी गई थी, लेकिन तेहरान में सऊदी, तुर्की और पाकिस्तानी प्रतिनिधियों के साथ हुई सकारात्मक वार्ता के बाद ईरानी विदेश मंत्रालय और सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद ने सकारात्मक संकेत दिए हैं। ईरान का कहना है कि मुस्लिम देशों का कोई भी क्षेत्रीय रक्षा ढांचा तभी पूरी तरह प्रभावी हो सकता है जब उसमें क्षेत्र की सभी प्रमुख सामरिक शक्तियों की भागीदारी हो। तेहरान ने पश्चिमी शक्तियों पर अपनी निर्भरता को खत्म करते हुए स्वदेशी और क्षेत्रीय सुरक्षा मॉडल अपनाने की पुरजोर वकालत की है। तेहरान से आए इन बयानों को विशेषज्ञ एक बड़ा बदलाव मान रहे हैं, जो यह दर्शाता है कि शिया-सुन्नी विभाजन को पाटकर क्षेत्रीय देश एक साझा सुरक्षा छतरी बनाने के करीब आ रहे हैं।

इजरायल और वाशिंगटन की टेंशन क्यों बढ़ी?

वाशिंगटन और इजरायल के सामरिक विश्लेषकों के लिए मक्का समझौते में ईरान की संभावित साझेदारी या सहयोग किसी दुःस्वप्न से कम नहीं है। लंबे समय से अमेरिका की मध्य पूर्व नीति 'इब्राहिम अकॉर्ड्स' के जरिये अरब देशों और इजरायल को एकजुट करके ईरान को एक साझा दुश्मन के रूप में पेश करने की रही है। लेकिन तेहरान का यह ताजा कूटनीतिक दांव अमेरिकी रणनीति को पूरी तरह ध्वस्त कर देता है। पाकिस्तान जैसे परमाणु संपन्न देश, तुर्की जैसी नाटो (NATO) की प्रमुख सैन्य शक्ति, सऊदी अरब की अपार आर्थिक ताकत और ईरान के मिसाइल व ड्रोन नेटवर्क का एक साथ आना इजरायल के लिए बेहद घातक सैन्य संतुलन पैदा कर सकता है। व्हाइट हाउस और पेंटागन में इस बात को लेकर गहरी चिंता है कि यदि खाड़ी देश अमेरिकी सुरक्षा छाते के बजाय ईरान और क्षेत्रीय देशों के साथ रक्षा तालमेल बिठाते हैं, तो मध्य पूर्व में अमेरिका का दशक पुराना सैन्य प्रभुत्व और उसके सैन्य अड्डों की प्रासंगिकता खत्म होने की कगार पर पहुँच जाएगी।

हूती संकट, सुरक्षा गारंटी और बहुध्रुवीय क्षेत्रीय व्यवस्था का उदय

इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में यमन के हूती विद्रोहियों द्वारा लाल सागर में जारी जहाजरानी हमले और सऊदी अरब की सीमा सुरक्षा की चिंताएं भी शामिल हैं। सऊदी अरब और उसके सहयोगियों ने यह भली-भांति भांप लिया है कि पश्चिमी देशों की सैन्य कार्रवाइयां लाल सागर और खाड़ी क्षेत्र में स्थायी शांति लाने में विफल रही हैं। इसके विपरीत, ईरान के साथ सीधा कूटनीतिक संवाद ही हूती हमलों को रोकने और मध्य पूर्व में जारी संघर्ष को शांत करने का एकमात्र व्यावहारिक रास्ता है। तेहरान में हुई वार्ताओं के दौरान यह स्पष्ट किया गया कि क्षेत्रीय विवादों का समाधान आपसी विचार-विमर्श से निकाला जाएगा, न कि बाहरी ताकतों के सैन्य हस्तक्षेप से। यदि मक्का समझौता ईरान को एक रणनीतिक साझेदार या गैर-आक्रामक मित्र के रूप में जोड़ पाता है, तो यह मध्य पूर्व में एक नए 'बहुध्रुवीय सुरक्षा युग' (Multipolar Security Era) का सूत्रपात करेगा, जहाँ क्षेत्र के फैसले वाशिंगटन के बजाय तेहरान, रियाद, इस्लामाबाद और अंकारा में तय होंगे।