इजरायल ने फिलिस्तीनियों पर ढाए जुल्म, किए युद्ध अपराध
संयुक्त राष्ट्र (United Nations) द्वारा गठित एक उच्चस्तरीय स्वतंत्र जांच आयोग ने अपनी नवीनतम और विस्तृत रिपोर्ट जारी करते हुए इजराइली सैन्य कार्रवाइयों पर अब तक का सबसे बड़ा और कड़ा प्रहार किया है। जांच आयोग ने अपनी विस्तृत केस स्टडीज और प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों के आधार पर निष्कर्ष निकाला है कि इजरायल ने फिलिस्तीनी क्षेत्रों में अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानूनों का घोर उल्लंघन करते हुए युद्ध अपराध (War Crimes) और मानवता के खिलाफ अपराधों को अंजाम दिया है। इस विस्तृत रिपोर्ट के सार्वजनिक होते ही वैश्विक कूटनीतिक हलकों, संयुक्त राष्ट्र महासभा और मानवाधिकार संगठनों में भारी खलबली मच गई है। रिपोर्ट में गाजा पट्टी और वेस्ट बैंक में नागरिक बुनियादी ढांचों, अस्पतालों, शरणार्थी शिविरों और भोजन आपूर्ति लाइनों पर लक्षित हमलों को रेखांकित किया गया है, जिसने लाखों फिलिस्तीनी नागरिकों के अस्तित्व पर ही सवालिया निशान खड़ा कर दिया है।
संयुक्त राष्ट्र जांच आयोग की रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और युद्ध अपराधों के पुख्ता प्रमाण
संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार परिषद द्वारा अधिकृत इस जांच आयोग ने महीनों तक जमीनी स्तर पर साक्ष्य जुटाए, सैटेलाइट तस्वीरों का विश्लेषण किया और प्रभावित फिलिस्तीनी परिवारों व स्वास्थ्य कर्मियों से साक्षात्कार किए। रिपोर्ट के मुख्य अध्यायों में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि गाजा में की गई सैन्य कार्रवाइयों के दौरान नागरिकों और लड़ाकों के बीच अंतर करने के अंतरराष्ट्रीय सिद्धांतों की पूरी तरह अनदेखी की गई। अस्पतालों, संयुक्त राष्ट्र संचालित स्कूलों, पेयजल सुविधाओं और राहत शिविरों को सीधे बमबारी का निशाना बनाया गया, जिससे सामूहिक तबाही हुई। आयोग ने यह भी कहा कि गाजा पट्टी की पूर्ण नाकाबंदी करके भोजन, पानी, दवाओं और बिजली की आपूर्ति को हथियार के रूप में इस्तेमाल करना 'सामूहिक दंड' (Collective Punishment) की श्रेणी में आता है, जो जेनेवा कन्वेंशन (Geneva Convention) के तहत एक स्थापित युद्ध अपराध है।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया और अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय (ICC) की संभावित कार्रवाई
संयुक्त राष्ट्र की इस रिपोर्ट के आने के बाद अंतरराष्ट्रीय समुदाय की ओर से तीखी प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हो गई हैं। वैश्विक मानवाधिकार संगठनों जैसे एम्नेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वॉच ने इस रिपोर्ट का स्वागत करते हुए अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय (ICC) से तुरंत संज्ञान लेने की मांग की है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस रिपोर्ट के बाद इजराइली राजनीतिक नेतृत्व और शीर्ष सैन्य कमांडरों के खिलाफ वारंट जारी करने की प्रक्रिया तेज हो सकती है। यूरोपीय संघ के कई सदस्य देशों और मध्य पूर्व के अरब राष्ट्रों ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से इजरायल पर कड़े प्रतिबंध लगाने और तत्काल स्थायी युद्धविराम लागू करने की मांग उठाई है। इस रिपोर्ट ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक मंचों पर इजरायल के समर्थकों के लिए भी बचाव करना बेहद मुश्किल बना दिया है, क्योंकि इसमें दिए गए तथ्य और साक्ष्य पूरी तरह से वैज्ञानिक और निष्पक्ष जांच पर आधारित हैं।
इजरायल का खंडन और वाशिंगटन का रुख
दूसरी तरफ, इजरायल की सरकार और विदेश मंत्रालय ने संयुक्त राष्ट्र जांच आयोग की इस रिपोर्ट को पूरी तरह से एकतरफा, पक्षपातपूर्ण और दुर्भावनापूर्ण करार देकर खारिज कर दिया है। तेल अवीव का तर्क है कि संयुक्त राष्ट्र का यह आयोग हमेशा से इजरायल विरोधी एजेंडे के तहत काम करता आया है और रिपोर्ट में आतंकवाद विरोधी अभियानों के मूल कारणों को नजरअंदाज किया गया है। इजरायली अधिकारियों ने दावा किया कि उनकी सेना केवल हमास के ढांचों को निशाना बनाती है, जबकि हमास नागरिकों को 'मानव ढाल' (Human Shields) के रूप में इस्तेमाल करता है। वाशिंगटन ने भी इजरायल के इस रुख का समर्थन करते हुए आयोग की स्वतंत्रता पर सवाल उठाए हैं, हालांकि अमेरिका के भीतर भी मानवाधिकार समूह और संसद सदस्य अपनी ही सरकार पर इजरायल को दी जाने वाली सैन्य सहायता पर रोक लगाने का दबाव बना रहे हैं।
गाजा का मानवीय संकट और वैश्विक व्यवस्था के लिए आगे की राह
संयुक्त राष्ट्र की इस रिपोर्ट ने केवल कानूनी उल्लंघन ही नहीं, बल्कि गाजा और वेस्ट बैंक में पैदा हुए अकल्पनीय मानवीय संकट की भयावह तस्वीर पेश की है। रिपोर्ट के अनुसार, 80 प्रतिशत से अधिक आबादी विस्थापित हो चुकी है और भुखमरी व महामारियों का खतरा चरम पर है। इस जांच रिपोर्ट के सामने आने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं इन दावों के आधार पर प्रभावी कार्रवाई कर पाएंगी या यह रिपोर्ट भी अतीत की फाइलों की तरह कागजों तक सीमित रह जाएगी। अगर वैश्विक शक्तियां और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद अंतरराष्ट्रीय नियमों को निष्पक्ष रूप से लागू करने में विफल रहते हैं, तो इससे वैश्विक न्याय व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय कानून की विश्वसनीयता पर हमेशा के लिए गहरा दाग लग जाएगा।