केदारनाथ आपदा से उबरने में 10 साल लगे थे,नेपाल को उबरने में कितना वक्त लगेगा?

केदारनाथ आपदा से उबरने में 10 साल लगे थे,नेपाल को उबरने में कितना वक्त लगेगा?

पड़ोसी देश नेपाल में हाल ही में आई मूसलाधार मानसूनी बारिश, भयंकर बाढ़ और पहाड़ी इलाकों में हुए सिलसिलेवार भूस्खलन ने जो तबाही मचाई है, उसने पूरे देश को सदमे में डाल दिया है। इस दिल दहला देने वाली प्राकृतिक आपदा में सैकड़ों लोगों की जान जा चुकी है, हजारों लोग लापता हैं और देश का पूरा बुनियादी ढांचा मलबे के ढेर में तब्दील हो चुका है। इस बीच अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और आपदा प्रबंधन विशेषज्ञों के बीच एक बहुत बड़ा और गंभीर सवाल यह उठने लगा है कि क्या नेपाल इस महाआपदा के गहरे जख्मों से कभी उबर पाएगा? यदि हम अपने ही देश के इतिहास पर नजर डालें, तो साल 2013 में उत्तराखंड में आई भयानक केदारनाथ आपदा से उबरने और वहां के बुनियादी ढांचे, सड़कों तथा धार्मिक पर्यटन को दोबारा पटरी पर लाने में भारत को पूरे 10 साल का लंबा वक्त लग गया था। ऐसे में, केदारनाथ से भी कई गुना अधिक भौगोलिक विभीषिका झेल रहे नेपाल को इस भयंकर बाढ़ और बर्बादी के कुचक्र से बाहर निकलने में आखिर कितना वक्त लगेगा, यह एक बहुत बड़ा विचारणीय प्रश्न बन गया है।

केदारनाथ आपदा 2013 और नेपाल की वर्तमान तबाही में क्या है समानता?

वर्ष 2013 के जून महीने में उत्तराखंड के केदारनाथ घाटी में जो जलप्रलय आया था, उसने अचानक से सब कुछ नेस्तनाबूद कर दिया था। बादलों के फटने और चोराबाड़ी झील के टूटने के कारण आई अचानक बाढ़ ने हजारों जिंदगियों को लील लिया था और पूरे यात्रा मार्ग, होटलों और सड़कों का नामोनिशान मिटा दिया था। नेपाल में हाल ही में जो आपदा आई है, उसकी प्रकृति और भयावहता काफी हद तक केदारनाथ त्रासदी से मेल खाती है। नेपाल में भी लगातार बारिश के बाद नदियों के उफान और ग्लेशियल झीलों के खतरे के कारण पहाड़ी बस्तियां चंद मिनटों में मलबे में दब गईं। दोनों ही आपदाओं में सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि पर्वतीय इलाके होने के कारण राहत दल समय पर घटनास्थल तक नहीं पहुंच पाए थे। केदारनाथ के मामले में भारत सरकार ने मजबूत वित्तीय स्थिति, आधुनिक तकनीक और देश के बड़े संसाधनों का उपयोग करते हुए एक दशक के लंबे संघर्ष के बाद उस इलाके को फिर से संवारा है, लेकिन नेपाल की आर्थिक स्थिति और संसाधन भारत की तुलना में बेहद सीमित हैं।

नेपाल की कमजोर अर्थव्यवस्था और बुनियादी ढांचे की लाचारी

किसी भी देश को किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा से उबरने के लिए उसकी आर्थिक ताकत (Economic Strength) और प्रशासनिक क्षमता सबसे बड़ा आधार होती है। नेपाल एक विकासशील देश है और उसकी अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से पर्यटन, कृषि और विदेशों से आने वाले प्रेषण (Remittances) पर निर्भर करती है। ऐसे में, जब देश के पावर प्लांट्स पूरी तरह तबाह हो चुके हों, राष्ट्रीय राजमार्ग और पुल बह चुके हों, और हजारों एकड़ उपजाऊ जमीन गाद के नीचे दब चुकी हो, तो सरकार के सामने सबसे बड़ा संकट वित्तीय संसाधनों का खड़ा हो जाता है। नेपाल सरकार के पास इतना बड़ा बजट नहीं है कि वह अपने दम पर युद्ध स्तर पर पुनर्निर्माण कार्य तुरंत शुरू कर सके। देश के हाइड्रो सेक्टर को जो अरबों रुपयों का नुकसान हुआ है, उसने नेपाल की रीढ़ की हड्डी तोड़ दी है। ऐसी स्थिति में केवल विदेशी सहायता और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के कर्ज पर निर्भर रहकर देश को दोबारा खड़ा करना एक बेहद धीमी और कठिन प्रक्रिया साबित होगी।

सामाजिक और मानवीय संकट: अपनों को खोने का दर्द और मानसिक आघात

भौतिक और आर्थिक नुकसान की भरपाई तो समय के साथ किसी तरह की जा सकती है, लेकिन किसी आपदा में अपने प्रियजनों को खो देने का जो मानसिक आघात होता है, उससे उबरने में पीढ़ियां बीत जाती हैं। नेपाल के अस्पतालों के बाहर अपनों की तस्वीरें लेकर भटक रहे परिजनों का दर्द इस बात की गवाही दे रहा है कि यह आपदा केवल ईंट-पत्थरों की नहीं, बल्कि इंसानी जिंदगियों की सबसे बड़ी त्रासदी है। हजारों बच्चे अनाथ हो चुके हैं, कई परिवार बेघर हो चुके हैं और उनके पास अपनी आजीविका चलाने के लिए एक फूटी कौड़ी भी नहीं बची है। जब तक इन प्रभावित लोगों का सही ढंग से पुनर्वास नहीं किया जाता और उन्हें मानसिक तथा आर्थिक संबल नहीं मिलता, तब तक केवल सड़कों और पुलों के बन जाने से देश सामान्य स्थिति में नहीं आ सकता। सामाजिक ताने-बाने के इस बिखराव को समेटने में नेपाल को दशकों का समय लग सकता है।

क्या अंतरराष्ट्रीय मदद से नेपाल इस संकट से जल्दी निकल पाएगा?

केदारनाथ आपदा के समय भारत के पास अपने देश के भीतर से ही वित्तीय और प्रशासनिक संसाधन उपलब्ध थे, जिससे केंद्र और राज्य सरकार ने मिलकर धीरे-धीरे ही सही, लेकिन एक मजबूत रिकवरी मॉडल तैयार किया था। नेपाल के मामले में अंतरराष्ट्रीय समुदाय, भारत, चीन और संयुक्त राष्ट्र जैसी एजेंसियों ने राहत सामग्री और वित्तीय मदद के हाथ बढ़ाने शुरू जरूर किए हैं, लेकिन यह मदद कितनी पारदर्शी तरीके से और कितनी जल्दी धरातल पर पहुंचती है, यह देखने वाली बात होगी। पुनर्निर्माण कार्यों में भ्रष्टाचार, राजनीतिक अस्थिरता और लालफीताशाही नेपाल की पुरानी बीमारियां रही हैं, जो अक्सर विकास कार्यों में बाधा डालती हैं। यदि नेपाल के राजनीतिक दल अपनी आपसी कलह को छोड़कर एकजुट होकर इस आपदा से निपटने के लिए दीर्घकालिक मास्टरप्लान तैयार नहीं करते हैं, तो केदारनाथ को लगे 10 साल से भी कहीं अधिक समय नेपाल को इस तबाही से उबरने में लग सकता है।

भविष्य के लिए सबक और जलवायु परिवर्तन की चेतावनी

यह त्रासदी केवल नेपाल के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए एक गंभीर चेतावनी है। जिस तरह से ग्लोबल वार्मिंग के कारण पहाड़ कमजोर हो रहे हैं और नदियां उग्र रूप ले रही हैं, आने वाले समय में इस तरह के संकट और अधिक频 (frequent) हो सकते हैं। नेपाल को अब अपनी आपदा प्रबंधन नीति को पूरी तरह से बदलना होगा और भविष्य के निर्माण कार्यों में इको-फ्रेंडली तथा मजबूत इंजीनियरिंग का उपयोग करना होगा। केदारनाथ के अनुभव से सीख लेते हुए भारत ने भी पहाड़ी विकास के मॉडल में कई बदलाव किए हैं। नेपाल के लिए भी यह समय केवल आंसू बहाने का नहीं, बल्कि एक नए और सुरक्षित नेपाल के निर्माण के लिए कड़े फैसले लेने का है, भले ही इस पूरी प्रक्रिया में लंबा वक्त क्यों न लग जाए।