नोबेल पीस प्राइज के ऐलान से ठीक पहले डोनाल्ड ट्रंप ने ठोकी अपनी जोरदार दावेदारी
अंतरराष्ट्रीय राजनीति और कूटनीति के गलियारों में एक बार फिर अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने बयानों के जरिए वैश्विक पटल पर छाए हुए हैं। प्रतिष्ठित नोबेल शांति पुरस्कार के आधिकारिक ऐलान से ठीक पहले डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचते हुए यह बड़ा और चौंकाने वाला दावा किया है कि उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान दुनिया भर में आठ बड़े और खूनी युद्धों को सफलतापूर्वक समाप्त कराया है, जो काम आज तक दुनिया का कोई भी दूसरा नेता नहीं कर सका। उनके इस तीखे और आत्मविश्वास से भरे बयान के बाद से वैश्विक राजनीति में एक नया भूचाल आ गया है और पश्चिमी मीडिया से लेकर संयुक्त राष्ट्र तक हर जगह उनके इस दावे की चर्चा जोरों पर हो रही है। अपनी इस धमाकेदार दावेदारी के जरिए ट्रंप ने एक बार फिर नोबेल शांति समिति और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर वैश्विक शांति के लिए उनके द्वारा किए गए ऐतिहासिक प्रयासों को नजरअंदाज क्यों किया जा रहा है।
डोनाल्ड ट्रंप का वह ऐतिहासिक दावा जिसमें उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान शांति स्थापित करने का दिया हवाला
डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में अपने समर्थकों और मीडिया के सामने एक विशेष संबोधन के दौरान अपनी विदेश नीति की सफलताओं का खुलकर बखान किया और दुनिया को याद दिलाया कि कैसे उनके राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान दुनिया के कई सबसे अशांत और युद्धग्रस्त क्षेत्रों में शांति समझौता कराने में सफलता मिली थी। ट्रंप का कहना है कि मध्य क्षेत्र से लेकर विभिन्न देशों के बीच चल रहे दशकों पुराने और खूनी संघर्षों को रोकने के लिए उन्होंने जिस प्रकार की साहसी कूटनीति का परिचय दिया, वैसा इतिहास में शायद ही कभी देखने को मिला हो। उन्होंने जोर देकर कहा कि पारंपरिक राजनीतिज्ञों और वर्षों से कूटनीति के दांवपेंच खेलने वाले नेताओं के विपरीत, उन्होंने सीधे तौर पर बातचीत और आर्थिक दबाव की नीति अपनाकर उन युद्धों को रुकवाया जो आने वाले समय में पूरी मानवता के लिए एक बहुत बड़ा खतरा बन सकते थे। उनके इस दावे ने उनके कट्टर समर्थकों के बीच एक बार फिर यह उम्मीद जगा दी है कि इस बार नोबेल शांति पुरस्कार के लिए उनका नाम सबसे ऊपर होना चाहिए, क्योंकि उन्होंने जमीन पर उतरकर युद्धों को थामा है।
नोबेल पीस प्राइज के ऐलान से पहले क्यों तेज हुई दावेदारी और वैश्विक राजनीति पर इसके पड़ने वाले प्रभाव
हर साल अक्टूबर के महीने में जब नोबेल शांति पुरस्कार की घोषणा की घड़ी नजदीक आती है, तब दुनिया भर के नेताओं और उनके समर्थकों के बीच अपने पसंदीदा उम्मीदवार के नाम की पैरवी करने का दौर शुरू हो जाता है। डोनाल्ड ट्रंप और उनके प्रशासनिक सहयोगियों का यह मानना रहा है कि उन्होंने पश्चिम एशिया में ऐतिहासिक अब्राहम समझौते की शुरुआत करके और कई देशों के बीच पारंपरिक दुश्رمती को खत्म कराकर जो शांति स्थापित की, उसके मुकाबले आज तक किसी भी अन्य नेता को यह सम्मान मिलना चाहिए था। हालांकि, ट्रंप के आलोचकों का यह भी तर्क रहा है कि उनकी कई नीतियां आक्रामक और अप्रत्याशित थीं, लेकिन उनके समर्थकों का दावा है कि नतीजे हमेशा शांति के पक्ष में ही आए। नोबेल समिति के फैसलों पर हमेशा से पूरी दुनिया की नजरें टिकी रहती हैं, और ऐसे में ठीक पुरस्कार के ऐलान से पहले ट्रंप द्वारा इस प्रकार खुलकर अपनी दावेदारी ठोकना इस बात का संकेत है कि वे इस वैश्विक सम्मान को पाने की अपनी इच्छा को छिपाना नहीं चाहते हैं, जिससे पूरी चयन प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक बहस और अधिक तेज हो गई है।
पारंपरिक कूटनीति के नियमों को तोड़ने वाले ट्रंप के शांति अभियानों का भविष्य और उनकी वैश्विक लोकप्रियता का सच
डोनाल्ड ट्रंप की शैली हमेशा से स्थापित और पारंपरिक राजनीतिक मानदंडों से बिल्कुल अलग रही है, जिसे वे अपनी सबसे बड़ी ताकत मानते हैं और उनके विरोधी इसे उनकी कमजोरी बताते हैं। चाहे उन्होंने उत्तर कोरिया के साथ तनाव को कम करने की पहल की हो या फिर मध्य पूर्व में दशकों से चले आ रहे गतिरोध को तोड़ने का ऐतिहासिक प्रयास किया हो, उनके हर कदम ने दुनिया को सोचने पर मजबूर कर दिया है। आज जब दुनिया एक बार फिर से कई मोर्चों पर नए युद्धों और भू-राजनीतिक संघर्षों की आग में झुलस रही है, तब लोग ट्रंप के उस कार्यकाल को याद करते हैं जब उनके दौर में दुनिया अपेक्षाकृत शांत थी और कोई नया बड़ा युद्ध शुरू नहीं हुआ था। चाहे उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार मिले या न मिले, लेकिन इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि उन्होंने वैश्विक कूटनीति के इतिहास में अपनी एक ऐसी अमिट छाप छोड़ी है जिसकी गूंज आने वाले कई दशकों तक सुनाई देती रहेगी।