हिंद महासागर में चीन की चालों को मात देने का मास्टरप्लान: भारत-अमेरिका की रणनीति से श्रीलंका
हिंद महासागर के सामरिक और रणनीतिक गलियारों में भू-राजनीति का पारा एक बार फिर सातवें आसमान पर पहुंच चुका है, क्योंकि भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका ने मिलकर चीन की बढ़ती आक्रामकता को रोकने के लिए एक बहुत बड़ा और अचूक चक्रव्यूह तैयार कर लिया है। वैश्विक व्यापार और सैन्य आवाजाही के लिहाज से दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण माने जाने वाले इस महासागर क्षेत्र में चीन लगातार अपने नौसैनिक अड्डों और कर्ज के जाल के जरिए अपने पैर पसारने की फिराक में लगा हुआ था, जिसे नेस्तनाबूद करने के लिए अब एक नया और बेहद प्रभावी खाका खींचा गया है। भारत और अमेरिका की संयुक्त कूटनीतिक और रणनीतिक पहल के तहत श्रीलंका, मालदीव और मॉरीशस जैसे सामरिक रूप से बेहद संवेदनशील द्वीप देशों में 'IOSV' यानी इंडियन ओशन सर्विलांस एंड सिक्योरिटी प्लान को जमीन पर उतारने का काम तेजी से शुरू हो चुका है। ड्रैगन की हर एक चाल पर पैनी नजर रखने और उसकी विस्तारवादी नीतियों को हिंद महासागर की सीमाओं के भीतर ही रोकने के लिए बनाए गए इस आधुनिक प्रोजेक्ट ने बीजिंग के हुक्मरों की नींद उड़ा कर रख दी है, क्योंकि यह भारत और उसके सहयोगियों के लिए एक बहुत बड़ी कूटनीतिक जीत साबित होने जा रहा है।
क्या है IOSV प्लान और कैसे यह हिंद महासागर में ड्रैगन की हरकतों पर कसेगा लगाम
हिंद महासागर की सुरक्षा वास्तुकला को पूरी तरह से नया रूप देने वाला यह 'IOSV' प्रोजेक्ट असल में एक अत्याधुनिक निगरानी, रडार नेटवर्क, खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान और समुद्री सुरक्षा तंत्र का एक समन्वित ढांचा है। पिछले कुछ वर्षों से चीन अपनी 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' यानी मोतियों की माला नीति के तहत हिंद महासागर के तटवर्ती देशों और द्वीपों पर अपने बंदरगाहों के विकास के नाम पर सैन्य दखल बढ़ाने की लगातार साजिश रच रहा था, जिससे इस क्षेत्र के अन्य देशों की संप्रभुता पर भी बड़ा खतरा मंडराने लगा था। इस गंभीर चुनौती का तोड़ निकालते हुए भारत और अमेरिका ने इन रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण द्वीपीय देशों को उन्नत तकनीकी सहायता, तटरक्षक जहाजों, आधुनिक सर्विलांस रडार सिस्टम और मैरीटाइम डोमेन अवेयरनेस की मजबूत ताकत मुहैया कराना शुरू कर दिया है। इस योजना के तहत अब श्रीलंका, मालदीव और मॉरीशस के समुद्री तटों और अहम ठिकानों पर ऐसे हाई-टेक सेंसर और निगरानी केंद्र स्थापित किए जा रहे हैं जो किसी भी संदिग्ध चीनी पनडुब्बी या युद्धपोत की हर गतिविधि को उसके उद्गम स्थल से ही ट्रैक करने में पूरी तरह सक्षम होंगे।
श्रीलंका, मालदीव और मॉरीशस में इस सुरक्षा चक्र के जरिए कैसे बदलेंगे क्षेत्रीय समीकरण
क्षेत्रीय और भौगोलिक रूप से बेहद अहम माने जाने वाले श्रीलंका, मालदीव और मॉरीशस कभी अपनी कमजोर अर्थव्यवस्था के कारण विदेशी ताकतों के प्रभाव में आ जाया करते थे, जिसका फायदा उठाकर चीन वहां अपनी पैठ मजबूत करने की कोशिश करता था। लेकिन अब इस नए 'IOSV' प्लान के जरिए इन तीनों देशों को न केवल अपनी समुद्री सीमाओं की सुरक्षा करने के लिए आत्मनिर्भर बनाया जा रहा है, बल्कि भारत और अमेरिका उनके सबसे भरोसेमंद और मजबूत सुरक्षा साझीदार के रूप में उभरकर सामने आ रहे हैं। श्रीलंका के रणनीतिक बंदरगाहों के आसपास सुरक्षा का यह घेरा मजबूत होने से भारत की दक्षिणी समुद्री सीमाएं पूरी तरह सुरक्षित हो गई हैं, वहीं मालदीव और मॉरीशस के साथ रक्षा सहयोग बढ़ने से हिंद महासागर के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में ड्रैगन की किसी भी नापाक हरकत के लिए कोई जगह नहीं बची है। इन देशों की सरकारों ने भी अब यह अच्छी तरह समझ लिया है कि चीन का कर्ज का जाल उनकी संप्रभुता के लिए कितना घातक है, और इसीलिए वे भारत तथा अमेरिका के साथ मिलकर इस साझा सुरक्षा तंत्र को पूरी ईमानदारी से लागू कर रहे हैं, जिससे इस पूरे क्षेत्र में शक्ति संतुलन अब भारत के पक्ष में मजबूती से झुकता हुआ नजर आ रहा है।
हिंद महासागर में वर्चस्व की इस जंग का भविष्य और भारत की बढ़ती वैश्विक सैन्य ताकत
आधुनिक समय में वही देश और महाद्वीप सुरक्षित माने जाते हैं जिनकी समुद्री सीमाएं और नौसेना सबसे ताकतवर होती है, और इस मामले में भारत ने हिंद महासागर को अपना स्वाभाविक प्रभाव क्षेत्र साबित करते हुए एक नया इतिहास रच दिया है। चीन अपनी आर्थिक और नौसैनिक ताकत के दम पर इस क्षेत्र में एकछत्र राज करने का सपना देख रहा था, लेकिन भारत और अमेरिका की रणनीतिक धुरी ने उसके इस सपने को बीच में ही तोड़कर रख दिया है। 'IOSV' प्लान केवल कुछ रडार या जहाजों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इस बात का स्पष्ट संदेश है कि हिंद महासागर अब किसी भी बाहरी विस्तारवादी ताकत की मनमानी का अखाड़ा नहीं बनेगा, बल्कि यहां स्वतंत्र, खुला और नियम-आधारित समुद्री अनुशासन कायम रहेगा। आने वाले समय में इस सुरक्षा तंत्र के और अधिक विस्तार से चीन के लिए इस महासागर में टिक पाना लगभग असंभव हो जाएगा, और यह घटनाक्रम वैश्विक राजनीति में भारत की बढ़ती महाशक्ति वाली भूमिका को हमेशा के लिए स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज कर देगा।