कनाडा में भारत की आपराधिक गतिविधियों की कोई गारंटी नहीं': मार्क कार्नी ने बदली ट्रूडो की लाइन
भारत और कनाडा के बीच लंबे समय से चल रहे कूटनीतिक तनाव के बीच अब एक नया और बड़ा राजनीतिक मोड़ सामने आया है। कनाडा के राजनीतिक गलियारों में अपनी पैठ रखने वाले और प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो के करीबी माने जाने वाले प्रभावशाली नेता मार्क कार्नी ने एक ऐसा बयान दिया है जिससे ओटावा से लेकर नई दिल्ली तक हलचल मच गई है। मार्क कार्नी ने कड़े शब्दों में यह बयान दिया है कि इस बात की कोई गारंटी नहीं दी जा सकती कि कनाडा की धरती पर भारत किसी भी प्रकार की आपराधिक या गुप्त गतिविधियों में शामिल नहीं है। जस्टिन ट्रूडो के कार्यकाल के दौरान भारत पर लगाए गए तमाम सनसनीखेज और बेबुनियाद आरोपों की लाइन को आगे बढ़ाते हुए कार्नी के इस बयान ने दोनों देशों के बीच पहले से ही ठप पड़े कूटनीतिक संबंधों को सुधारने की हर उम्मीद पर फिलहाल पानी फेर दिया है। एक तरफ जहां भारत सरकार लगातार इन आरोपों को सिरे से खारिज करती आई है, वहीं कनाडाई राजनीति में भारत विरोधी बयानों का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा है, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कूटनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं।
मार्क कार्नी का बयान और जस्टिन ट्रूडो की नीतियों का बढ़ता प्रभाव
कनाडा की राजनीति में पिछले कुछ महीनों से नेतृत्व परिवर्तन और आंतरिक राजनीतिक उठापटक का दौर चल रहा है, जिसमें जस्टिन ट्रूडो की लिबरल पार्टी के भीतर भविष्य की रणनीतियों पर मंथन जारी है। ऐसे में मार्क कार्नी द्वारा भारत पर निशाना साधना यह साबित करता है कि कनाडाई नेता घरेलू राजनीतिक नफा-नुकसान को ध्यान में रखते हुए भारत विरोधी कार्ड खेलने से बाज नहीं आ रहे हैं। बिना किसी ठोस और पुख्ता सबूत के सार्वजनिक मंचों से इस तरह के बयान देना न केवल अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के स्थापित नियमों के खिलाफ है, बल्कि यह दोनों देशों के बीच आपसी भरोसे को पूरी तरह नष्ट कर रहा है। नई दिल्ली ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि कनाडा अपनी घरेलू विफलताओं और राजनीतिक जमीन खिसकने के डर से भारत को बलि का बकरा बना रहा है। मार्क कार्नी का यह बयान ट्रूडो प्रशासन की उसी पुरानी और संकीर्ण सोच का विस्तार है जो खालिस्तानी चरमपंथियों के दबाव में आकर भारत के साथ संबंधों को लगातार रसातल में धकेल रही है।
भारत और कनाडा के कूटनीतिक संबंध: अविश्वास के दौर में गहराता संकट
भारत और कनाडा के रिश्ते कभी मजबूत लोकतांत्रिक साझेदारियों के प्रतीक माने जाते थे, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में खालिस्तानी अलगाववादियों को कनाडा की धरती पर मिलने वाले राजनीतिक संरक्षण और सरकारी शह के कारण दोनों देशों के बीच खाइयां चौड़ी होती चली गईं। जब भी भारत ने कनाडा की धरती से संचालित होने वाली भारत विरोधी और देश की संप्रभुता को चुनौती देने वाली गतिविधियों पर आपत्ति जताई, तब ओटावा ने हमेशा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का बहाना बनाकर अपराधियों को पनाह दी। मार्क कार्नी द्वारा दिल्ली की मंशा पर सवाल उठाना और यह दावा करना कि भारत कनाडा की सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है, पूरी तरह से राजनीति से प्रेरित और पूर्वाग्रह से ग्रसित है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने हमेशा यह बात जोर देकर कही है कि कनाडा को अपने आंतरिक मामलों में कानून-व्यवस्था की नाकामी का ठीकरा भारत के सिर फोड़ने की आदत छोड़नी होगी, क्योंकि इस तरह के गैर-जिम्मेदाराना बयानों से केवल भारत-विरोधी ताकतों को बढ़ावा मिलता है।
वैश्विक भू-राजनीति और कनाडाई कूटनीति की आंतरिक विडंबना
आज के वैश्विक परिवेश में जब भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी आर्थिक महाशक्ति और कूटनीतिक रूप से एक बेहद मजबूत देश के रूप में उभर रहा है, तब कनाडा जैसे देशों द्वारा इस तरह का रणनीतिक मुर्खतापूर्ण रवैया अपनाना उनकी अपनी विदेश नीति की नाकामी को दर्शाता है। पश्चिमी देश चीन के बढ़ते प्रभाव और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला के संकटों से निपटने के लिए भारत जैसे साझीदार की अहमियत अच्छी तरह समझते हैं, लेकिन कनाडाई राजनेता अपनी घरेलू वोट बैंक की राजनीति के चलते इन बड़े भू-राजनीतिक हितों की बलि चढ़ाने पर तुले हुए हैं। मार्क कार्नी का यह बयान कनाडा की जनता को यह भ्रमित करने का प्रयास है कि देश की आंतरिक सुरक्षा संबंधी चिंताएं किसी बाहरी देश के कारण हैं, जबकि सच्चाई यह है कि कनाडाई सरकार अपनी सरजमीं पर पल रहे संगठित अपराधों और चरमपंथियों पर लगाम लगाने में बुरी तरह विफल साबित हो चुकी है।
भविष्य के कूटनीतिक हालात और भारत का कड़ा रुख
नई दिल्ली ने हमेशा से इस बात को प्राथमिकता दी है कि आपसी संवाद और सम्मान के आधार पर ही अंतरराष्ट्रीय संबंधों को आगे बढ़ाया जा सकता है, लेकिन जब तक कनाडा की राजनीतिक पार्टियां भारत के खिलाफ निराधार बयानबाजी और भारत विरोधी तत्वों को संरक्षण देना बंद नहीं करतीं, तब तक सामान्य रिश्तों की बहाली असंभव है। मार्क कार्नी के इस बयान के बाद यह साफ हो गया है कि कनाडा के आगामी राजनीतिक बदलावों में भी भारत को लेकर दृष्टिकोण में कोई सकारात्मक परिवर्तन आने की उम्मीद कम ही है। भारत सरकार अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में पूरी तरह अडिग है और वह किसी भी देश के ऐसे दबाव या अविश्वास के आगे झुकने वाली नहीं है। कनाडा के नेताओं को यह समझना होगा कि बिना सबूत के इस तरह के बयान देकर वे केवल अपनी अंतरराष्ट्रीय साख को ही दांव पर लगा रहे हैं, जिसका खमियाजा आने वाले समय में उनकी अर्थव्यवस्था और कूटनीति दोनों को भुगतना पड़ेगा।