कंगाली के दलदल में फंसे पाकिस्तान का आईएमएफ के सामने फिर आत्मसमर्पण

कंगाली के दलदल में फंसे पाकिस्तान का आईएमएफ के सामने फिर आत्मसमर्पण

अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजार और भू-राजनीतिक गलियारों से एक बार फिर पाकिस्तान की बदहाली और उसकी आर्थिक लाचारी की सबसे बड़ी दास्तान सामने आ रही है। भारी-भरकम विदेशी कर्जों के बोझ तले बुरी तरह दब चुका कंगाल पाकिस्तान एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ के सामने घुटने टेकने को मजबूर हो गया है। आर्थिक दिवालियापन के कगार पर खड़े पाकिस्तान ने अपनी अर्थव्यवस्था को किसी तरह सांसें देने के लिए आईएमएफ के अधिकारियों के सामने गिड़गिड़ाकर एक नए बेलआउट पैकेज की भीख मांगी है, जिस पर दोनों पक्षों के बीच आखिरकार एक नई डील पक्की हो गई है। इस ताज़ा समझौते के तहत पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से 1.21 अरब डॉलर की आपातकालीन वित्तीय सहायता मिलने का रास्ता साफ हो गया है। हालांकि, यह भारी-भरकम कर्ज पाकिस्तान को मुफ्त में नहीं मिल रहा है, बल्कि इसके बदले आईएमएफ ने देश की आम जनता पर महंगाई और टैक्स का ऐसा कोड़ा बरसाने की शर्त रखी है, जिससे पाकिस्तान के नागरिकों की जिंदगी पूरी तरह नर्क बनने वाली है।

पाकिस्तान के आर्थिक पतन की भयावह सच्चाई और आईएमएफ के सामने बार-बार हाथ फैलाने की मजबूरी

पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पिछले कई वर्षों से एक ऐसे दुष्चक्र में फंस चुकी है जहां से निकलने का उसका हर प्रयास पूरी तरह विफल साबित हो रहा है। देश का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग पूरी तरह खाली हो चुका है, आयात के लिए पैसे नहीं बचे हैं और देश चलाने के लिए उसे हर महीने दूसरे देशों या अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से कर्ज मांगना पड़ रहा है। अपनी इस फटेहाल स्थिति को छिपाने के लिए पाकिस्तानी हुक्मरान दुनिया भर में डींगें हांकते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि आईएमएफ के दरवाजे पर कटोरा लेकर खड़े होना उनकी पुरानी आदत बन चुकी है। इस बार भी जब देश की तिजोरी पूरी तरह खाली हो गई और भुगतान संतुलन का संकट अपने चरम पर पहुंच गया, तब मजबूर होकर पाकिस्तानी वित्त मंत्रालय के अधिकारियों को वाशिंगटन स्थित आईएमएफ मुख्यालय के सामने गिड़गिड़ाना पड़ा। आईएमएफ ने पाकिस्तान की इस लाचारी का पूरा फायदा उठाते हुए उसे बेहद कड़ी शर्तों और कड़े आर्थिक सुधारों के दायरे में बांध दिया है, जिसके बिना एक भी ढेला मिलने की कोई उम्मीद नहीं थी।

1.21 अरब डॉलर की इस नई डील से पाकिस्तान की जनता पर टूटेगा महंगाई का नया और भयंकर पहाड़

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और पाकिस्तानी सरकार के बीच तय हुई इस 1.21 अरब डॉलर की नई डील से भले ही देश के प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री राहत की सांस ले रहे हों, लेकिन इस कर्ज का असली और भयानक बोझ देश की आम जनता को चुकाना होगा। आईएमएफ ने अपनी हर किस्त जारी करने से पहले यह सख्त शर्त रखी है कि पाकिस्तान सरकार देश में टैक्स का दायरा और तेजी से बढ़ाए। इसके तहत बिजली, गैस, पेट्रोलियम पदार्थों और रोजमर्रा की जरूरत की हर वस्तु पर भारी-भरकम टैक्स और जीएसटी की दरें आसमान छूने वाली हैं। पहले से ही भुखमरी और बेहाली का सामना कर रहे आम पाकिस्तानी नागरिकों के लिए दो वक्त की रोटी जुटाना अब और अधिक असंभव होता जा रहा है। सरकार के पास अपनी फिजूलखर्ची और रक्षा बजट पर लगाम लगाने का कोई इरादा नहीं है, इसलिए वे सारी कसर जनता पर नए-नए कर थोपकर पूरी कर रहे हैं, जिससे पूरे देश में भयंकर असंतोष और आक्रोश उबल रहा है।

विदेशी कर्ज और बेलआउट पैकेजों के सहारे कब तक टिक पाएगा पाकिस्तान, भविष्य पर मंडरा रहे गहरे संकट

किसी भी संप्रभु राष्ट्र के लिए यह बेहद शर्मनाक स्थिति होती है कि वह अपने देश के कर्मचारियों को वेतन देने और बुनियादी जरूरतें पूरी करने के लिए भी अंतरराष्ट्रीय कर्जदाताओं की दया पर निर्भर रहे। पाकिस्तान के इतिहास में यह कोई पहला मौका नहीं है जब उसे इस तरह आईएमएफ के सामने गिरगिड़ाना पड़ा हो, बल्कि पिछले कुछ दशकों में वह दर्जनों बार ऐसे बेलआउट पैकेज ले चुका है और हर बार देश की अर्थव्यवस्था और अधिक गर्त में चली गई है। विश्लेषकों का मानना है कि इस प्रकार के अस्थायी कर्जों से केवल कुछ महीनों के लिए दिवालिया होने से बचा जा सकता है, लेकिन यह किसी भी समस्या का स्थाई समाधान नहीं है। जब तक पाकिस्तान अपनी आंतरिक नीतियों में बुनियादी बदलाव नहीं लाता, आतंकवाद को पनाह देना बंद नहीं करता और अनुत्पादक खर्चों में कटौती नहीं करता, तब तक वह हमेशा के लिए आर्थिक गुलामी के दलदल में धंसता चला जाएगा। आईएमएफ का यह 1.21 अरब डॉलर का पैकेज पाकिस्तान की डूबती हुई नैया को कुछ समय के लिए भले ही सहारा दे दे, लेकिन यह इस बात की भी गारंटी है कि आने वाले दिनों में वहां की जनता का आर्थिक शोषण और अधिक बढ़ जाएगा।