सिंधु जल संधि से लेकर कश्मीर और 'ऑपरेशन सिंदूर' तक पर गिड़गिड़ाया पाकिस्तान

सिंधु जल संधि से लेकर कश्मीर और 'ऑपरेशन सिंदूर' तक पर गिड़गिड़ाया पाकिस्तान

संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) का वार्षिक उच्चस्तरीय सत्र हमेशा से वैश्विक कूटनीति का सबसे बड़ा केंद्र रहा है, जहां दुनिया भर के नेता अपने देशों का पक्ष रखते हैं। लेकिन इस बार भी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इस प्रतिष्ठित वैश्विक मंच का इस्तेमाल अपनी घरेलू विफलताओं को छिपाने और भारत के खिलाफ अनर्गल प्रलाप करने के लिए किया। आर्थिक बदहाली, आसमान छूती महंगाई, भुखमरी और सेना के शिकंजे में फंसे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में एक बार फिर वही पुराना और घिसा-پिटा राग अलापा, जिसे दुनिया भर के देशों ने पहले ही सिरे से खारिज कर दिया है। शहबाज शरीफ के इस भाषण में सिंधु जल संधि, कश्मीर विवाद, और हालिया सैन्य कार्रवाइयों जैसे तमाम संवेदनशील मुद्दों पर पाकिस्तान की कुंठा साफ तौर पर झलक रही थी। आइए जानते हैं संयुक्त राष्ट्र के मंच से दिए गए शहबाज शरीफ के उस भाषण की 5 सबसे बड़ी और अहम बातें, जिन्होंने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज आने वाला नहीं है।

1. कश्मीर का पुराना और बेदम राग अलापना

हर साल की तरह इस बार भी शहबाज शरीफ ने अपने भाषण की शुरुआत भारत के आंतरिक मामलों में दखل देने के साथ की। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के मंच से एक बार फिर कश्मीर मुद्दे को जबरन घसीटने की कोशिश की और आत्मनिर्णय के अधिकारों जैसी पुरानी और खारिज हो चुकी बातों को दोहराया। हालांकि, दुनिया अब पाकिस्तान के इस दोहरे चरित्र को अच्छी तरह समझ चुकी है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस बात से भली-भांति परिचित है कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत का अभिन्न अंग हैं और इस पर पाकिस्तान के किसी भी प्रोपेगेंडा का अब कोई असर नहीं पड़ता है, बल्कि यह केवल पाकिस्तान की हताशा को दर्शाता है।

2. सिंधु जल संधि को लेकर भारत पर दबाव बनाने का असफल प्रयास

शहबाज शरीफ ने अपने संबोधन के दौरान ऐतिहासिक 'सिंधु जल संधि' (Indus Waters Treaty) का मुद्दा भी जोर-शोर से उठाया। उन्होंने दावा किया कि भारत द्वारा इस संधि में किए जा रहे बदलावों या पानी के प्रवाह को रोकने से पाकिस्तान में जल संकट पैदा हो सकता है। जानकारों का मानना है कि पाकिस्तान अपनी कृषि और अर्थव्यवस्था की बदहाली का ठीकरा भारत के सिर फोड़ना चाहता है, जबकि सच्चाई यह है कि भारत हमेशा से अंतरराष्ट्रीय संधियों का सम्मान करता आया है, लेकिन आतंकवाद और जल एक साथ नहीं बह सकते, इस नीति के तहत नई दिल्ली अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार कड़े फैसले लेने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है।

3. 'ऑपरेशन सिंदूर' और सैन्य तनाव का परोक्ष जिक्र

अपने भाषण के दौरान पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के चेहरे पर हालिया सैन्य ऑपरेशनों और रणनीतिक तनाव का खौफ साफ नजर आया। हालांकि उन्होंने सीधे तौर पर किसी विशिष्ट ऑपरेशन का नाम लेने से बचने की कोशिश की, लेकिन उनके बयानों में भारत की ओर से मिलने वाले कड़े सैन्य और सामरिक जवाब का डर साफ झलक रहा था। पाकिस्तान अच्छी तरह जानता है कि अब यदि उसकी तरफ से कोई भी दुस्साहस किया गया, तो भारतीय सेना उसका ऐसा मुंहतोड़ जवाब देगी जिससे पूरा पाकिस्तान हिल जाएगा। इसी डर के कारण उन्होंने यूएन के मंच से शांति की दुहाई देने का नाटक किया।

4. वैश्विक मंच पर एक बार फिर रोया आर्थिक बदहाली का रोना और मांगी मदद

शहबाज शरीफ के भाषण का एक बड़ा हिस्सा दुनिया भर के देशों और वित्तीय संस्थानों से आर्थिक मदद की भीख मांगने में बीता। एक तरफ जहां पाकिस्तान परमाणु हथियार होने का दम भरता है, वहीं दूसरी तरफ उसके प्रधानमंत्री को हर साल यूएन के मंच पर जाकर कटोरा लेकर खड़े होना पड़ता है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय दानदाताओं और अमीर देशों से जलवायु परिवर्तन, बाढ़ और आर्थिक संकट के नाम पर भारी-भरकम राहत पैकेजों की गुहार लगाई। उनके इस रवैये पर उनके अपने देश की अवाम और सोशल मीडिया पर उन्हें 'अंतरराष्ट्रीय भिखारी' कहकर जमकर खिंचाई की जा रही है।

5. आतंकवाद के प्रायोजन को छिपाने के लिए भारत पर मढ़ा झूठा आरोप

हर बार की तरह इस बार भी पाकिस्तान ने अपनी प्राचीन रणनीति अपनाते हुए दुनिया का ध्यान अपनी धरती पर पलने वाले आतंकवाद से हटाने के लिए भारत पर ही झूठे और बेबुनियाद आरोप मढ़ दिए। शहबाज शरीफ ने भारत पर प्रॉक्सी वॉर और मानवाधिकार उल्लंघन के मनगढ़ंत आरोप लगाए, जबकि दुनिया जानती है कि पाकिस्तान लंबे समय से आतंकवाद का ग्लोबल हेडक्वार्टर रहा है। भारत ने उनके इन सभी झूठे दावों का संयुक्त राष्ट्र में 'राइट टू रिप्लाई' के तहत बेहद कड़ा और करारा जवाब देते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि जो देश खुद आतंकवाद की फैक्ट्री चलाता है, उसे दुनिया के सामने उपदेश देने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।