फारूक अब्दुल्ला के बयान पर पाकिस्तानी एक्सपर्ट का बड़ा तंज
भारतीय राजनीति के गलियारों में नेशनल कॉन्फ्रेंस के प्रमुख और जम्मू-कश्मीर के दिग्गज नेता फारूक अब्दुल्ला का एक बयान इन दिनों भूचाल की तरह छाया हुआ है। उनके इस बयान ने जहां एक तरफ देश की राष्ट्रीय राजनीति में तीखी प्रतिक्रियाओं और विवादों का बाजार गर्म कर दिया है, वहीं दूसरी ओर पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में भी इस पर खुलकर चर्चाएं शुरू हो चुकी हैं। इस बीच, पाकिस्तान के जाने-माने रणनीतिकार और अंतरराष्ट्रीय मामलों के एक्सपर्ट कमर चीमा ने फारूक अब्दुल्ला के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए एक बड़ा और चौंकाने वाला बयान दिया है। पाकिस्तानी एक्सपर्ट का साफ तौर पर कहना है कि भले ही भारत में इस बयान को लेकर राजनीतिक तापमान बढ़ गया हो, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि पाकिस्तान कभी भी कश्मीर मुद्दे पर भारत के खिलाफ किसी सैन्य युद्ध या जंग के रास्ते पर नहीं जाने वाला है। उनके इस बयान के सामने आने के बाद कूटनीतिक हलकों में नए सिरे से कयासों का दौर शुरू हो गया है।
फारूक अब्दुल्ला के विवादित बयान से देश में मचा सियासी घमासान
पूरा मामला तब शुरू हुआ जब श्रीनगर के पास बारामूला में एक पार्टी कार्यकर्ताओं के सम्मेलन को संबोधित करते हुए नेशनल कॉन्फ्रेंस अध्यक्ष डॉ. फारूक अब्दुल्ला ने एक विवादित टिप्पणी कर दी। अपने संबोधन के दौरान उन्होंने पड़ोसी देश पाकिस्तान की वकालत करते हुए यहाँ तक कह डाला कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान द्वारा बार-बार कश्मीर मुद्दे को उठाए जाने की वजह से ही आज जम्मू-कश्मीर के लोग सुरक्षित हैं। उन्होंने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि यदि पड़ोसी देश इस मुद्दे को वैश्विक स्तर पर जिंदा नहीं रखता, तो यहाँ के हालात और अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकते थे। उनके इस बयान के सामने आते ही भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) समेत अन्य दलों ने इसे देश की एकता और अखंडता पर सीधा प्रहार करार दिया। भाजपा नेताओं ने इसे देशद्रोह की श्रेणी में रखते हुए फारूक अब्दुल्ला से सार्वजनिक माफी की मांग की और तीखा हमला बोला कि जो नेता खुद भारत के संविधान के तहत तमाम बड़े पदों पर रहे हैं, वे इस तरह की भाषा कैसे बोल सकते हैं।
पाकिस्तानी एक्सपर्ट कमर चीमा ने खोले कूटनीति के पन्ने और बताई असली सच्चाई
जब फारूक अब्दुल्ला के इस बयान की गूंज सीमा पार पाकिस्तान तक पहुँची, तो वहाँ के मीडिया और राजनीतिक विश्लेषकों ने इस पर अपनी पैनी नजर गड़ाई। पाकिस्तानी मामलों के जानकार कमर चीमा ने एक चर्चा के दौरान इस पूरे घटनाक्रम का विश्लेषण करते हुए कहा कि एक ऐसे वरिष्ठ राजनेता का इस तरह का बयान देना जो तीन बार मुख्यमंत्री और केंद्र में मंत्री रह चुके हों, बेहद हैरान करने वाला है। चीमा ने साफ शब्दों में स्पष्ट किया कि पाकिस्तान की नीति कश्मीर को लेकर केवल कूटनीतिक बयानों और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक ही सीमित है। पाकिस्तान के पास ऐसी कोई क्षमता या मंशा नहीं है कि वह इस भू-राजनीतिक मुद्दे के लिए भारत के साथ किसी बड़े सैन्य संघर्ष या सीधी जंग में उलझे। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान केवल संयुक्त राष्ट्र के चार्टर और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के दायरे में रहकर अपनी बात रखता आया है और आगे भी यही प्रक्रिया जारी रहेगी, इससे ज्यादा जमीन पर कुछ होने वाला नहीं है।
भारत की घरेलू राजनीति और क्षेत्रीय संप्रभुता का कड़ा यथार्थ
पाकिस्तानी एक्सपर्ट ने इस बात को भी पूरी तरह स्वीकार किया है कि भारत जैसे विशाल और लोकतांत्रिक देश के लिए कश्मीर उसकी आंतरिक और बाहरी सियासत का एक बेहद संवेदनशील और गहरा हिस्सा है। नई दिल्ली कभी भी अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय अखंडता से समझौता करते हुए कश्मीर पर अपने रुख से पीछे नहीं हटने वाली है। पाकिस्तान के भीतर भले ही बयानों की राजनीति चलती हो, लेकिन यह भी एक कड़वा सच है कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) और अन्य इलाकों के लोग खुद पाकिस्तान सरकार की नीतियों से त्रस्त होकर लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। ऐसे में किसी भी भारतीय राजनेता द्वारा यह उम्मीद करना कि पड़ोसी देश कश्मीर की रक्षा कर रहा है, पूरी तरह से जमीनी हकीकत से परे और भ्रामक है। भारत की मजबूत सुरक्षा व्यवस्था और कड़े प्रशासनिक रुख के आगे इस तरह के बयानों की प्रासंगिकता केवल राजनीतिक बयानबाजी तक ही सिमट कर रह जाती है।
भविष्य के राजनीतिक संकेत और नेताओं के बयानों के नफे-नुकसान
फारूक अब्दुल्ला के इस बयान और उसके बाद आए पाकिस्तानी एक्सपर्ट के तंज ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि कश्मीर का मुद्दा दोनों देशों की घरेलू और कूटनीतिक राजनीति में कितना बड़ा टूल बन चुका है। एक तरफ जहां भारत में ऐसे बयानों पर सख्त कानूनी कार्रवाई और सार्वजनिक माफी की मांग उठ रही है, वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तानी विश्लेषक भी यह स्वीकार करने लगे हैं कि भारत के खिलाफ किसी भी प्रकार के सैन्य दुस्साहस की उनकी औकात नहीं बची है। कुल मिलाकर, यह पूरा घटनाक्रम न केवल राष्ट्रीय राजनीति में एक नया भूचाल लेकर आया है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि क्षेत्रीय स्थिरता और भारत की बढ़ती सामरिक ताकत के सामने इस तरह के बयान केवल कूटनीतिक शोरगुल से ज्यादा कुछ नहीं हैं, जिनका वास्तविक जमीन पर कोई प्रभाव पड़ने वाला नहीं है।