दक्षिण कोरिया को किन देशों से सता रहा डर,  65 फीसदी लोग आए सपोर्ट में

दक्षिण कोरिया को किन देशों से सता रहा डर, 65 फीसदी लोग आए सपोर्ट में

परमाणु हथियारों की होड़ में कूदेगा दक्षिण कोरिया? 65% जनता ने किया सपोर्ट, जानें किन 3 देशों के खौफ से उठा रहा यह कदम

वैश्विक भू-राजनीति (Geo-Politics) में इन दिनों एक बड़ा और चौंकाने वाला बदलाव देखने को मिल रहा है। शांति और तकनीकी विकास के लिए पहचाने जाने वाले दक्षिण कोरिया (South Korea) में अब एक नई और खतरनाक बहस छिड़ गई है। यह बहस है अपने खुद के परमाणु हथियार (Nuclear Weapons) बनाने की। हाल ही में सामने आए एक सर्वे ने पूरी दुनिया के कूटनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है, जिसमें खुलासा हुआ है कि दक्षिण कोरिया की लगभग 65 फीसदी जनता अब चाहती है कि उनका देश अपना खुद का परमाणु बम बनाए। एक ऐसा देश जिसने दशकों से अमेरिका के 'न्यूक्लियर अम्ब्रेला' (Nuclear Umbrella) यानी अमेरिकी परमाणु सुरक्षा छतरी पर भरोसा किया है, वह अचानक इतना खौफजदा क्यों है? आखिर किन देशों का डर सियोल की रातों की नींद उड़ा रहा है? आइए एक रिपोर्टर की नजर से इस पूरी इनसाइड स्टोरी और इसके पीछे के भौगोलिक एवं रणनीतिक कारणों को विस्तार से समझते हैं।

उत्तर कोरिया का सनकी तानाशाह और बढ़ता परमाणु खौफ

दक्षिण कोरिया की इस बढ़ती घबराहट का सबसे पहला और मुख्य कारण कोई और नहीं बल्कि उसका अपना पड़ोसी देश उत्तर कोरिया (North Korea) है। किम जोंग उन के नेतृत्व में प्योंगयांग लगातार अपने परमाणु शस्त्रागार का विस्तार कर रहा है। आए दिन बैलिस्टिक मिसाइलों का परीक्षण और परमाणु हमलों की खुली धमकियों ने दक्षिण कोरियाई नागरिकों के मन में एक गहरा मनोवैज्ञानिक डर पैदा कर दिया है। सियोल (दक्षिण कोरिया की राजधानी) सीमा से महज कुछ ही दूरी पर स्थित है, जो उसे किसी भी हमले की स्थिति में सबसे ज्यादा संवेदनशील बनाता है। जनता को अब यह महसूस होने लगा है कि केवल पारंपरिक हथियारों (Conventional Weapons) और रक्षा प्रणालियों के दम पर उत्तर कोरिया के परमाणु पागलपन का मुकाबला नहीं किया जा सकता है। इसी अस्तित्व के संकट ने दक्षिण कोरियाई अवाम को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि 'लोहे को लोहा ही काटता है' और उत्तर कोरिया को उसी की भाषा में जवाब देने के लिए खुद का परमाणु संपन्न होना बेहद जरूरी है।

चीन की आक्रामक विस्तारवादी नीतियां और ताइवान का संकट

दक्षिण कोरिया के डर का दूसरा सबसे बड़ा कारण ड्रैगन यानी चीन (China) है। इंडो-पैसिफिक रीजन (Indo-Pacific Region) में चीन की बढ़ती सैन्य ताकत और उसकी विस्तारवादी नीतियां पूरे एशिया के लिए चिंता का सबब बनी हुई हैं। जिस तरह से चीन दक्षिण चीन सागर (South China Sea) और ताइवान (Taiwan) को लेकर अपना आक्रामक रुख दिखा रहा है, उसने दक्षिण कोरिया को भी अलर्ट मोड पर ला दिया है। सियोल को डर है कि अगर भविष्य में ताइवान पर चीन का हमला होता है, तो पूरा ईस्ट एशिया युद्ध की आग में झुलस जाएगा। ऐसे में अगर चीन ने उत्तर कोरिया का साथ दिया, तो दक्षिण कोरिया को दोतरफा मार झेलनी पड़ सकती है। स्थानीय (Geographical) और रणनीतिक दृष्टि से चीन का यह बढ़ता दबदबा दक्षिण कोरिया की संप्रभुता के लिए एक मूक लेकिन बहुत बड़ा खतरा है, जिससे निपटने के लिए अब जनता परमाणु शक्ति को ही एकमात्र ढाल मान रही है।

रूस-यूक्रेन युद्ध से मिला कड़वा सबक और बदलता समीकरण

रूस (Russia) और उत्तर कोरिया के बीच हालिया दिनों में बढ़ी रणनीतिक और सैन्य साझेदारी ने दक्षिण कोरिया के इस डर को और भी पुख्ता कर दिया है। यूक्रेन युद्ध ने दुनिया के कई देशों की आंखें खोल दी हैं। दक्षिण कोरियाई नीति निर्माताओं और आम जनता ने इस युद्ध से एक बड़ा सबक यह सीखा है कि अगर आपके पास परमाणु हथियार नहीं हैं, तो कोई भी परमाणु संपन्न देश आप पर आसानी से हावी हो सकता है। जिस तरह से रूस ने खुलेआम परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की धमकियां दी हैं और अब वह उत्तर कोरिया को एडवांस सैन्य तकनीक मुहैया करा रहा है, उससे दक्षिण कोरियाई सुरक्षा एजेंसियां बेहद चिंतित हैं। रूस, चीन और उत्तर कोरिया का यह नया 'त्रिकोण' दक्षिण कोरिया के लिए एक भयानक दुःस्वप्न बनता जा रहा है।

अमेरिका के 'न्यूक्लियर अम्ब्रेला' पर गहराता अविश्वास

दक्षिण कोरियाई जनता के बीच परमाणु हथियारों के समर्थन का एक और बहुत बड़ा कारण अमेरिका (United States) की सुरक्षा गारंटी पर बढ़ता अविश्वास है। दशकों से अमेरिका ने दक्षिण कोरिया को यह भरोसा दिलाया है कि अगर उस पर कोई परमाणु हमला होता है, तो अमेरिका अपनी पूरी ताकत से उसकी रक्षा करेगा। लेकिन अमेरिकी राजनीति में हो रहे बदलावों और 'अमेरिका फर्स्ट' (America First) जैसी नीतियों ने सियोल के मन में शंका के बीज बो दिए हैं। वहां की जनता और रणनीतिकार अब यह सवाल पूछने लगे हैं कि "क्या वाशिंगटन, सियोल को बचाने के लिए सैन फ्रांसिस्को या न्यूयॉर्क को खतरे में डालेगा?" यह सवाल उस डर को दर्शाता है कि संकट की घड़ी में शायद अमेरिका पीछे हट जाए। इसी अविश्वास के कारण 65% दक्षिण कोरियाई नागरिक अब मानते हैं कि अपनी सुरक्षा की गारंटी किसी दूसरे देश के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती, बल्कि आत्मनिर्भर होना (Self-reliance in Defense) ही समय की मांग है।

65 फीसदी जनता का समर्थन: क्या हैं इसके वैश्विक मायने?

सर्वेक्षण में 65% जनता का परमाणु हथियारों के पक्ष में आना कोई सामान्य बात नहीं है। यह आंकड़े दर्शाते हैं कि देश के भीतर राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर एक अभूतपूर्व लहर चल रही है। अगर दक्षिण कोरिया सच में परमाणु हथियार बनाने की दिशा में कदम बढ़ाता है, तो इसके परिणाम वैश्विक स्तर पर बहुत गंभीर होंगे। इससे न केवल एनपीटी (Non-Proliferation Treaty - परमाणु अप्रसार संधि) का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा, बल्कि एशिया में एक नई हथियारों की होड़ (Arms Race) शुरू हो जाएगी। जापान और ताइवान जैसे देश भी अपनी सुरक्षा के लिए इसी रास्ते पर चलने का दबाव महसूस करेंगे। यह स्थिति एशियन जियो-पॉलिटिक्स को हमेशा के लिए बदलकर रख देगी और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र को दुनिया का सबसे खतरनाक फ्लैशप्वाइंट बना देगी।

निष्कर्ष: क्या वाकई परमाणु शक्ति बनेगा सियोल?

फिलहाल दक्षिण कोरियाई सरकार आधिकारिक तौर पर अपनी गैर-परमाणु नीति पर कायम है और अमेरिका के साथ 'वाशिंगटन डिक्लेरेशन' (Washington Declaration) के तहत काम कर रही है। लेकिन जनता का यह भारी दबाव और 65 फीसदी समर्थन सरकार के लिए एक बड़ा संकेत है कि सुरक्षा नीतियां अब केवल कूटनीतिक वादों पर नहीं टिक सकतीं। बदलती वैश्विक व्यवस्था, पड़ोसियों की आक्रामकता और खुद की सुरक्षा की गारंटी की चाहत ने दक्षिण कोरिया को एक ऐसे दोराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां आने वाले समय में उसे कोई बड़ा और कड़ा फैसला लेना ही पड़ सकता है। यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या सियोल शांति का रास्ता चुनता है या फिर अपनी सुरक्षा के लिए उस परमाणु क्लब का हिस्सा बनता है, जो पूरी दुनिया की कूटनीति को हिला कर रख देगा।