भारतीय रसोई और कृषि बाजार पर मंडरा रहा है महंगाई का बड़ा खतरा
देश में आम आदमी के रोजमर्रा के खानपान से लेकर वस्त्र उद्योग तक एक बार फिर से भारी महंगाई का संकट गहराता नजर आ रहा है। दाल, खाद्य तेल, मक्का और कपास जैसी प्रमुख कृषि जिंसों के घरेलू उत्पादन और मांग के बीच पैदा हुए भारी अंतर ने नीति निर्माताओं की नींद उड़ा दी है। स्थिति यह बन गई है कि देश की बढ़ती जरूरतों को पूरा करने और बाजार में कीमतों को काबू में रखने के लिए सरकार को एक बार फिर भारी मात्रा में आयात (Import) का सहारा लेना पड़ रहा है। कृषि बाजार के जानकारों और आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि समय रहते घरेलू उत्पादन को बढ़ावा नहीं दिया गया, तो आयातित वस्तुओं पर बढ़ती निर्भरता आने वाले दिनों में देश के आम नागरिकों की जेब पर भारी पड़ सकती है और खुदरा महंगाई दर फिर से बेकाबू हो सकती है।
दाल और खाद्य तेलों की किल्लत से रसोई का बजट बिगड़ने के पूरे आसार
भारतीय रसोई की रीढ़ माने जाने वाली दालों और खाने के तेलों के दाम पिछले कुछ समय से लगातार दबाव में बने हुए हैं। घरेलू स्तर पर दालों का उत्पादन मांग के मुकाबले कम रहने के कारण सरकार को लगातार विदेशों से तुअर, मसूर और उड़द दाल का आयात करना पड़ रहा है। इसके अलावा, भारत अपनी जरूरत का 50 से 60 फीसदी से अधिक खाद्य तेल विदेशों (जैसे इंडोनेशिया, मलेशिया, ब्राजील और अर्जेंटीना) से आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में पाम ऑयल, सोयाबीन और सनफ्लॉवर ऑयल की कीमतों में उतार-चढ़ाव तथा डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी के कारण आयात बिल लगातार भारी होता जा रहा है। जब-जब वैश्विक बाजार में इन खाद्य पदार्थों के दाम बढ़ते हैं, उसका सीधा असर भारत के खुदरा बाजारों और आम आदमी की थाली पर पड़ता है।
मक्का और कपास के मोर्चे पर भी खड़ी हुई गंभीर चुनौतियां
केवल खानपान ही नहीं, बल्कि उद्योग और पशु饲 (Animal Feed) के क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाले मक्का (Maize) तथा कपड़ा उद्योग की जान कहे जाने वाले कपास (Cotton) के उत्पादन में भी इस बार चिंताजनक रुझान देखने को मिले हैं। मौसम की अनिश्चितता, मानसूनी झटकों और कीटों के प्रकोप के चलते घरेलू बाजार में कपास का उत्पादन मांग के मुकाबले कम रहने का अनुमान लगाया गया है। स्थिति यह है कि घरेलू बाजार में कपास की कीमतें न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के आसपास या उससे ऊपर चल रही हैं, जिससे कपड़ा मिलों और निर्माताओं के लिए उत्पादन लागत काफी बढ़ गई है। इस कमी को पाटने के लिए सरकार को शुल्क-मुक्त आयात की अवधि बढ़ाने जैसे कदम उठाने पड़ रहे हैं, लेकिन महंगी माल ढुलाई और वैश्विक दामों के कारण आयातित कपास भी सस्ता नहीं पड़ रहा है।
आयात पर बढ़ती निर्भरता और आत्मनिर्भरता के लक्ष्य के बीच बड़ी पशोपेश
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि किसी भी विकासशील अर्थव्यवस्था के लिए कृषि उत्पादों के मामले में अत्यधिक आयात पर निर्भर रहना दीर्घकालिक रूप से सुरक्षित नहीं माना जाता है। जब देश को अपनी बुनियादी जरूरतों—जैसे दाल, तेल और कपास—के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ता है, तो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Global Supply Chain) में थोड़ी सी भी बाधा देश के भीतर महंगाई को आसमान पर पहुंचा देती है। सरकार हालांकि किसानों को मक्का, दाल और तिलहन की खेती के लिए प्रेरित करने और एमएसपी पर खरीद की गारंटी जैसी योजनाएं चला रही है, लेकिन भू-जल स्तर में गिरावट और जलवायु परिवर्तन के चलते पारंपरिक फसलों से इतर नई फसलों की तरफ किसानों का रुझान धीमी गति से बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक देश कृषि उत्पादन में पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं बनता, तब तक अंतरराष्ट्रीय बाजार के झटकों से भारतीय अर्थव्यवस्था को बचाना चुनौतीपूर्ण बना रहेगा।