हसीना के पतन से पहले पेरिस में रची गई थी तख्तापलट की गुप्त पटकथा
बांग्लादेश की राजनीति में अगस्त 2024 में हुआ सत्ता परिवर्तन कोई अचानक से हुई घटना नहीं थी, बल्कि इसके पीछे महीनों से तैयार की गई एक सोची-समझी सीक्रेट प्लानिंग और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बुना गया रणनीतिक ताना-बाना था। ढाका से लेकर यूरोप के प्रमुख शहरों तक इस पूरी साजिश की स्क्रिप्ट बहुत ही खामोशी से लिखी जा रही थी। जब पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना हिंसक छात्र आंदोलन और नागरिक विद्रोह के बीच भारी दबाव में देश छोड़कर भारत भागने पर मजबूर हुईं, उससे ठीक पहले अंतरिम सरकार की कमान किसे सौंपी जाएगी, इसका फैसला पर्दे के पीछे पूरा हो चुका था। विश्वसनीय सूत्रों और वैश्विक राजनयिक रिपोर्टों के अनुसार, नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ. मोहम्मद यूनुस को हसीना के पद छोड़ने से काफी पहले ही देश का नेतृत्व संभालने का सीक्रेट ऑफर दिया जा चुका था। जिस समय बांग्लादेश की सड़कों पर लाखों युवा और उपद्रवी सरकारी इमारतों पर धावा बोल रहे थे, उस समय 84 वर्षीय मोहम्मद यूनुस फ्रांस की राजधानी पेरिस में मौजूद थे और वहीं से एक गुप्त रणनीति के तहत लगातार आंदोलनकारी छात्र नेताओं और उनके पीछे खड़े मास्टरमाइंड्स के संपर्क में बने हुए थे।
आंदोलनकारी छात्र नेताओं और बैकस्टेज ताकतों की रणनीति का पर्दाफाश
शेख हसीना की आवामी लीग सरकार को सत्ता से उखाड़ फेंकने के लिए छात्र आंदोलन को केवल एक मुखौटे के रूप में इस्तेमाल किया गया था, जबकि इसके पीछे बैकस्टेज पर काम कर रही ताकतों ने पहले ही एक वैकल्पिक प्रशासनिक ढांचा तैयार कर लिया था। जमात-ए-इस्लामी, विपक्षी दलों और कुछ विदेशी थिंक-टैंकों के साथ मिलकर बैकचैनल बातचीत का दौर महीनों से जारी था। जब आंदोलन अपने चरम पर पहुंचा और शेख हसीना की सरकार के पैर उखड़ने लगे, तो आंदोलन के मुख्य रणनीतिकारों ने फ्रांस में रह रहे मोहम्मद यूनुस से गोपनीय संपर्क साधा। उन्हें स्पष्ट संदेश भेजा गया कि बांग्लादेश में हसीना युग का अंत अब बेहद करीब है और सेना की सहमति के साथ देश की कमान उन्हें सौंपी जानी तय है। यूनुस ने इस सीक्रेट ऑफर को तुरंत स्वीकार कर लिया और पेरिस से ही अपने आने वाले कार्यकाल की प्राथमिकताओं को रेखांकित करना शुरू कर दिया था। इस पूरी रणनीति का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि जैसे ही हसीना देश छोड़ें, बिना किसी संवैधानिक शून्यता या अराजकता के यूनुस के नाम का ऐलान कर दिया जाए, जैसा कि 8 अगस्त को उन्हें मुख्य सलाहकार के रूप में शपथ दिलाकर किया गया।
अंतरराष्ट्रीय शक्तियों और सीक्रेट एजेंसीज की भूमिका पर उठे गंभीर सवाल
ढाका की सत्ता में हुए इस अचानक और अप्रत्याशित बदलाव के पीछे केवल घरेलू गुस्सा ही वजह नहीं था, बल्कि पश्चिमी देशों और कुछ अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों का रणनीतिक हस्तक्षेप भी माना जा रहा है। मोहम्मद यूनुस के अमेरिका और यूरोपीय संघ की शक्तिशाली लॉबियों के साथ बेहद करीबी रिश्ते हमेशा से जगजाहिर रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शेख हसीना का भारत-समर्थक और स्वतंत्र विदेश नीति का रुख कई वैश्विक महाशक्तियों को रास नहीं आ रहा था। यही वजह थी कि हसीना को हटाने और यूनुस को सत्ता में लाने के लिए एक बेहद संगठित टूलकिट और नैरेटिव पर काम किया गया। बांग्लादेशी सुरक्षा एजेंसियों के भीतर मौजूद कुछ अधिकारियों और अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक नेटवर्क ने मिलकर एक ऐसा माहौल बनाया जिसने हसीना के पास इस्तीफा देने के अलावा कोई अन्य रास्ता नहीं छोड़ा। यूनुस को पहले ही इस बात का पूरा भरोसा दिला दिया गया था कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय उनकी अंतरिम सरकार को तुरंत मान्यता देगा और वित्तीय सहायता का प्रवाह भी जारी रखेगा।
'क्रांति' या पहले से तय 'तख्तापलट': दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक समीकरण बदले
मोहम्मद यूनुस के मुख्य सलाहकार का पद संभालने के बाद से बांग्लादेश का राजनीतिक नक्शा पूरी तरह बदल चुका है। जिस घटना को शुरुआत में आम छात्रों का एक सहज और स्वतःस्फूर्त कोटा-विरोधी प्रदर्शन बताया जा रहा था, अब उसके पीछे की सीक्रेट प्लानिंग की परतें धीरे-धीरे खुल रही हैं। हसीना के तख्तापलट से पहले ही यूनुस को ऑफर मिलना और उनका तैयार रहना इस बात का सीधा सबूत है कि यह केवल एक जनआंदोलन नहीं बल्कि एक उच्च-स्तरीय सत्ता परिवर्तन का पूर्व-नियोजित खेल था। इस घटनाक्रम ने न केवल बांग्लादेश की अंदरूनी राजनीति को अस्थिर किया है, बल्कि पूरे दक्षिण एशियाई क्षेत्र, विशेषकर भारत की सीमाओं पर भी गंभीर रणनीतिक और सुरक्षा चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या यूनुस की अंतरिम सरकार बांग्लादेश में निष्पक्ष चुनाव कराकर लोकतंत्र बहाल करेगी या फिर इस सीक्रेट प्लान के जरिए देश को लंबे समय के लिए एक खास विदेशी प्रभाव क्षेत्र में धकेल दिया जाएगा।